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परिस्थितियों से लड़ते-लड़ते आदिवासी परिवार की बेटियों ने खेल के मैदान में जीतना सीख लिया

Sat, 11 Jun 2022 01:15 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Sat, 11 Jun 2022 01:15 AM IST
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Fighting with the circumstances, the daughters of the tribal family learned to win in the playground
पंचकूला। हम आर्थिक रूप से कमजोर, गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली नासिक से सैकड़ों किलोमीटर दूर बसे आदिवासी ग्रामीण परिवार की बेटियां हैं। खेतों में घास तो काटते ही हैं, पानी, बिजली, सड़क, परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं से जूझना हमारा रोज का काम है। हमने परेशानियों से निजात पाने का हुनर सीखते सीखते खेल के मैदान में जीतना सीख लिया है। ये कहना है पंचकूला सेक्टर-3 स्थिथ ताऊ देवी लाल स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में खो-खो गेम्स में महाराष्ट्र के नासिक से 150 से 170 किलोमीटर दूर बसे ग्रामीण आदिवासी परिवार की बेटी दुसाली भोये और कौशल्या रमेश पवार का।
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इन बेटियों के प्रदर्शन से महाराष्ट्र ने खो-खो में तमिलनाडु को 6 प्वाइंट और दूसरे पुल मैच में हरियाणा को 1 प्वाइंट से हराया। बता दें कि शुक्रवार संपन्न हुए खो-खो के मुकाबले में दोनों बेटियों ने महज एक मिनट में हरियाणा के दो-दो खिलाड़ियों को आउट कर, पंजाब के साथ शनिवार को होने वाले अपने अगले पारी में टक्कर देने के लिए तैयार हैं।
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भीषण गर्मी में पानी के लिए सुबह से शाम तक जद्दोजहद
महाराष्ट्र नासिक स्थित गांव घराड़ीपारा की झुग्गियों में रहने वाली दुसाली भोये ने बताया कि सुबह से दोपहर तक पानी के लिए जद्दोजहद करते हैं। तब जाकर दो वक्त रोटी के साथ पीने का पानी मिलता है। मई और जून के महीने में कुएं का पानी सूख जाता है। थोड़े से पेयजल के लिए रोजाना भीषण गर्मी में दो से तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। यहां पहले आओ और पहले पाओ का नियम लागू होता है। जो सुबह पहले पहुंच जाता है, उसे पानी मिल जाता है। गांव में सड़कें भी नहीं हैं। आजीविका के लिए मात्र कृषि जरिया है। पूरा दिन खेतों में पसीना बहाते हैं।
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सड़कें नहीं, परिवहन सुविधा के लिए 50 किलोमीटर की दौड़
नासिक से 150 किलोमीटर दूर सुरगाना की रहने वाली कौशल्या रमेश पवार ने बताया कि हमारे गांव में सड़कें नहीं बनी। बिजली की सुविधा हम ग्रामीणों को महज दो से तीन घंटे मिलती है। नासिक तक पहुंचने के लिए गांव से रोडवेज बस की सुविधा तक नहीं है। किसी तरह गांव से करीब 50 किलोमीटर दूर अरसूल जाना पड़ता है, तब परिवहन की सुविधा मिलती है। हरियाणा के पंचकूला शहर में आकर पता चला कि हमलोग इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर बुनियादी सुविधाओं के मामले में कितने पीछे हैं।
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