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पीजीआई में पहली बार ब्लू बेबी के मरीजों की दूरबीर विधि से हुई सर्जरी
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चंडीगढ़। पीजीआई के डॉक्टरों ने पहली बार ब्लू बेबी बीमारी से ग्रस्त दो वयस्क मरीजों की दूरबीन विधि से एंजियोग्राफी तकनीक का प्रयोग कर ट्रांसकैथेटर पल्मोनरी वॉल्व रीप्लेसमेंट सर्जरी करने में सफलता हासिल की है। दोनों ही मरीजों की इस बीमारी से बचाव केलिए बचपन में ओपेन हार्ट सर्जरी हो चुकी थी। इसके बावजूद हार्ट के वॉल्व में लीकेज आने पर उनमें से एक को तीसरी बार और दूसरे को दूसरी बार सर्जरी करवाने की सलाह दी गई थी, लेकिन पीजीआई कार्डियोलॉजी विभाग केविशेषज्ञों ने उनकी ओपेन हार्ट सर्जरी क रने की बजाय दूरबीन के जरिए वॉल्व केलीकेज को बंद करने का निर्णय लिया और उसमें सफलता हासिल की। सर्जरी करने वाली टीम में पीजीआई कार्डियोलॉजी विभाग केप्रो. मनोज कुमार रोहित, एनेस्थीसिया विभाग के प्रमुख प्रो. जीडी पुरी, कार्डियोथोरेसिक सर्जरी की प्रमुख डॉ. श्याम टी और एनेस्थीसिया विभाग केकंसल्टेंट डॉ. सुंदर नेगी शामिल रहे।
इन मरीजों की सर्जरी करने वाले एडवांस कॉर्डियक सेंटर यूनिट-2 केप्रभारी डॉ. मनोज कुमार रोहित ने बताया कि इस तरह के मरीजों के इलाज की यह आधुनिक तकनीक है। देश में अब तक इस तकनीक से ऐसे 15 मरीजों की सर्जरी की गई है। पीजीआई में जून माह में रोपड़ के एक 25 साल के युवक और जालंधर निवासी 56 साल की महिला की सर्जरी की गई, जो अब बिल्कु ल ठीक हैं और घर जा चुके हैं। डॉ. मनोज ने बताया कि युवक की सबसे पहले 11 माह कीउम्र में ओपेन हार्ट सर्जरी की गई थी। इसके 10 साल बाद दोबारा सर्जरी की गई। दूसरी सर्जरी के बाद भी उसका वॉल्व लीकेज करने लगा तो डॉक्टरों ने तीसरी बार सर्जरी कराने को कहा। इसकेबाद वह पीजीआई आया। ऐसी स्थिति में तीसरी बार सर्जरी करना घातक हो सकता है। इसे ध्यान में रखते हुए उस मरीज की दूरबीन विधि से सर्जरी की गई। वहीं, 56 साल की महिला की भी इसी तकनीक से सर्जरी की गई।
वॉल्व में लीकेज से बढ़ती है परेशानी
डॉ. मनोज ने बताया कि ब्लू बेबी बीमारी में एक बार की सर्जरी के बाद 20 से 25 साल बाद वॉल्व के लीकेज का खतरा रहता है। ऐसा 15 से 20 प्रतिशत मामलों में होता है। इस वजह से मरीज को किडनी खराब होने केसाथ ही हृदय में सूजन, हाथ-पैर में सूजन और तमाम जटिल समस्याएं होने लगती हैं, जिससे वॉल्व का लीकेज बंद करना बेहद जरूरी हो जाता है।
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इन मरीजों की सर्जरी करने वाले एडवांस कॉर्डियक सेंटर यूनिट-2 केप्रभारी डॉ. मनोज कुमार रोहित ने बताया कि इस तरह के मरीजों के इलाज की यह आधुनिक तकनीक है। देश में अब तक इस तकनीक से ऐसे 15 मरीजों की सर्जरी की गई है। पीजीआई में जून माह में रोपड़ के एक 25 साल के युवक और जालंधर निवासी 56 साल की महिला की सर्जरी की गई, जो अब बिल्कु ल ठीक हैं और घर जा चुके हैं। डॉ. मनोज ने बताया कि युवक की सबसे पहले 11 माह कीउम्र में ओपेन हार्ट सर्जरी की गई थी। इसके 10 साल बाद दोबारा सर्जरी की गई। दूसरी सर्जरी के बाद भी उसका वॉल्व लीकेज करने लगा तो डॉक्टरों ने तीसरी बार सर्जरी कराने को कहा। इसकेबाद वह पीजीआई आया। ऐसी स्थिति में तीसरी बार सर्जरी करना घातक हो सकता है। इसे ध्यान में रखते हुए उस मरीज की दूरबीन विधि से सर्जरी की गई। वहीं, 56 साल की महिला की भी इसी तकनीक से सर्जरी की गई।
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वॉल्व में लीकेज से बढ़ती है परेशानी
डॉ. मनोज ने बताया कि ब्लू बेबी बीमारी में एक बार की सर्जरी के बाद 20 से 25 साल बाद वॉल्व के लीकेज का खतरा रहता है। ऐसा 15 से 20 प्रतिशत मामलों में होता है। इस वजह से मरीज को किडनी खराब होने केसाथ ही हृदय में सूजन, हाथ-पैर में सूजन और तमाम जटिल समस्याएं होने लगती हैं, जिससे वॉल्व का लीकेज बंद करना बेहद जरूरी हो जाता है।
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