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बदहाल व्यवस्था : बरसात में बंद हो जाता है दो गांवों का रास्ता, बेटियां नहीं पढ़ पाईं 8वीं से ज्यादा

Sun, 06 Mar 2022 01:23 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Sun, 06 Mar 2022 01:23 AM IST
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Bad system: The way of two villages gets closed in the rain, daughters could not study more than 8th
पंचकूला। प्रदेश की राजधानी चंडीगढ़ और जिला मुख्यालय पंचकूला से करीब 45 से 50 किलोमीटर दूर सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ और सर्व शिक्षा अभियान सिसक रही है। धरमपुरबीड़ और माधोवाला गांव की करीब 750 जनसंख्या में 80 से अधिक बेटियां प्राइमरी से ज्यादा की शिक्षा ग्रहण नहीं कर पा रही हैं। इन गांवों में 150 घर हैं, जो बारिश में जिला मुख्यालय से पूरी तरह कट जाता है। गांव में स्कूल नहीं होने के कारण दोनों गांवों के बच्चों को पांच किलोमीटर दूर जंगल, पथरीले-कच्चे रास्ते, टांगरी नदी के अलावा अन्य बाधाएं पार कर प्राइमरी तक की शिक्षा के लिए गोविंदपुर या ठाठर जाना पड़ता है।
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‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अभियान बेशक 22 जनवरी 2015 में पानीपत में हुई थी, लेकिन प्रदेश के पंचकूला जिले के कई ऐसे गांव हैं, जहां की बेटियों को आज भी आठवीं से ज्यादा शिक्षा नसीब नहीं हो पाती है। यही नहीं, इन गांवों में आठवीं तक पढ़ने वाली बेटियों की संख्या भी बेहद सीमित है। कुछ ऐसी ही तस्वीर है कालका विधानसभा क्षेत्र के सुदूरवर्ती दो गांवों धरमपुरबीड़ और माधोवाला की। इन गांवों के बसने के 71 साल बाद गोविंदपुर से ठाठर तक पांच किलोमीटर सड़क निर्माण के लिए साल 2018 में करीब 4.89 करोड़ का बजट पीडब्ल्यूडी ने पास कर दिया, लेकिन बीच में वन विभाग की 3.70 हेक्टेयर जमीन को लेकर पेंच फंस गया।
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हालांकि निशानदेही के बाद वन विभाग ने इसके बदले में जमीन मांगा था, जिस पर राज्य सरकार ने बतौड़ गांव में जमीन देने की सहमति जताई थी। इसके बाद प्रोजेक्ट की फाइल 9 मार्च 2021 से डीडीपीओ ब्रांच के पास करीब डेढ़ साल तक पेंडिंग पड़ी है। जब गांव के लोग बच्चों और ग्रामीणों की परेशानी लेकर पंचकूला उपायुक्त से मिले उनके निर्देश पर डीडीपीओ ब्रांच से फाइल डीआरओ ब्रांच के पास 17 जनवरी 2022 को भेज दी गई थी। अब करीब डेढ़ माह से डीआरओ ब्रांच के पास फाइल पेंडिंग पड़ी है।
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गर्भवती महिलाओं के लिए खाट ही एंबुलेंस
धरमपुरबीड़ और माधोवाला की गर्भवती महिलाओं को एंबुलेंस की सुविधा लेने के लिए जंगलों के रास्ते करीब पांच किलोमीटर पथरीले, कच्चे व संकरी रास्तों पर चलना पड़ता है। बरसात हो गई तो टांगरी नदी में पानी भर जाता है, ऐसी स्थिति में महिलाओं के लिए खाट ही एंबुलेंस है। इसी के सहारे उन्हें रायपुररानी के अस्पताल पहुंचाया जाता है। पांच माह की गर्भवती रजनी ने बताया कि उन्हें रायपुररानी जाने के लिए भी दस बार सोचना पड़ता है, ऐसी कंडिशन में चलना मुश्किल है। बड़ी मुश्किल से धीरे-धीरे तीन से चार किलोमीटर गोविंदपुर तक पैदल चलती हूं, उसके बाद रायपुररानी के लिए साधन मिलता है। वहीं पंचकूला नागरिक अस्पताल गांव से करीब 37 किलोमीटर दूर है, यहां उपचार कराने जाने के लिए सुबह 6 बजे घर से निकलना पड़ता है। रात को 8 बजे तक घर लौट पाते हैं। इस दौरान इतनी थकान हो जाती है कि तीन से चार दिनों तक शरीर सीधा नहीं हो पाता।
अनोखा गांव, जहां कुंवारों की फौज
धरमपुरबीड़ और माधोवाला गांव जहां कुंवारों की फौज है। इन गांवों में कोई भी अपनी बेटी ब्याहने को तैयार नहीं है। इसके चलते यहां के युवा परेशान हैं। इसका मुख्य कारण है, गांव तक जाने के लिए सड़कों का नहीं होना। यह कहना है स्थानीय निवासी अजीत सिंह का। उन्होंने बताया कि बारिश के बाद टांगरी नंदी में पानी भर जाता है, लोगों का यहां आनाजाना बिल्कुल ही बंद हो जाता है। स्थानीय ग्रामीण शहर से बिल्कुल कट जाते हैं। इतना ही नहीं बरसात के दिनों में तो यहां के लोग बेटियों की दूसरी जगह शादी करने से भी कतराते हैं, क्योंकि रास्ता बंद होने की वजह से बेटियों को खाट पर विदा करना पड़ता है।
गांव से बाहर निकली तो बारहवीं में 87 फीसदी अंक हासिल किए
माधोवाला गांव की अकेली बेटी कविता है, जो घर से बाहर अपने मामा के गांव गणेशपुर में रह कर 10वीं में 78 फीसदी और 12वीं में 85 फीसदी अंक हासिक किए हैं। कविता ने प्रदेश के मुख्यमंत्री मनोहर लाल से अपील कर कहा है कि हमारे गांव की सड़कों का निर्माण हो जाता तो गांव की लड़कियां भी हर क्षेत्र में आगे निकल सकती हैं, लेकिन रास्ते की वजह से उनके सपने अधूरे रह जाते हैं, अब आप ही हम बेटियों का सपना पूरा कर सकते हैं।
नर्सिंग करने का सपना दिल में दबा का दबा रहा गया। किसी तरह तीन से चार किलोमीटर कच्चे जंगली रास्तों से होकर ठाठर के सरकारी स्कूल में प्राइमरी तक पढ़ाई की। अब आगे की पढ़ाई के लिए रायपुररानी जाना पड़ता है, जो हम ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों के लिए संभव नहीं है। रायपुररानी हमारे गांव से करीब 12 किलोमीटर दूर है, जहां टांगरी नदी पार करके जाना पड़ेगा। तीन साल पहले आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी। - नेहा, निवासी माधोवाला।
टीचर बनना चाहती थी, लेकिन छह साल पहले आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी, क्योंकि शहर तक जाने के लिए हमारे पास सुरक्षित रास्ता तक नहीं है। हम लोगों का पूरे बरसात भर शहर से बिल्कुल संपर्क टूट जाता है। वहीं जंगलों का पथरीला रास्ता हम लोगों के लिए सुरक्षित नहीं है, इसलिए पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। - माफी।
हमारे गांव में रहकर आठवीं तक पढ़ाई करना भी बड़ी बात है। क्योंकि पथरीले और कच्चे व जंगलों के रास्ते स्कूल तक पहुंचना मुश्किल है। इतनी मशक्कत के बाद प्राइमरी स्कूल की पढ़ाई पूरी करते हैं, लेकिन रास्ते के अभाव के चलते आगे की पढ़ाई के लिए हिम्मत जवाब देने लगती है। सेजल, छात्रा।
गोबिंदपुर से ठाठर सड़क के बनने से रायपुररानी, बरवाला, नारायणगढ़ के सैकड़ों गांवों के लोगों को अतिरिक्त सफर करने से राहत मिल सकती है। वहीं धरमपुरबीड़ और माधोवाला गांव के लोगों को रास्ता मिल जाएगा। इस मसले को हरियाणा विधानसभा में बजट सत्र के दौरान उठाया था। - प्रदीप चौधरी, कालका विधायक

दो चार दिन पहले गोविंदपुर से ठाठर मार्ग के निर्माण को लेकर कुछ ग्रामीण मिले थे, ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को आश्वासन दिया है कि अगले सप्ताह धरमपुरबीड़ और माधोवाला सहित अन्य ग्रामीण क्षेत्रों का दौरा करूंगा। - महावीर कौशिक, उपायुक्त पंचकूला।
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