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यूक्रेन पर हमला : बम की आवाज सुनते ही बचाव के लिए जाते थे बंकरों में
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कालका। यूक्रेन में फंसे कालका निवासी सिद्धार्थ के घर पहुंचते ही परिवार के लोग शुक्रवार देर रात खुशी से झूम उठे। अभिभावकों ने बेटे का मुंह मिठा करवाकर उसका स्वागत किया। कालका सत्यनारायण मंदिर वाली गली में रहने वाले गर्ग परिवार का बेटा सिद्धार्थ यूक्रेन के सूमी शहर में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है। उन्होंने बताया कि 24 फरवरी को युद्ध स्टार्ट हो गया था। इसके बाद एयर स्पेस बंद हो गया था। इसके बाद वहां के हालात और खराब होते चले गए। उन्होंने बताया कि बम धमाकों की आवाज से स्थानीय लोगों और विद्यार्थियों के जेहन में डर बैठा हुआ है।
उन्होंने बताया कि जब भी सायरन बजता था, तो उनको बंकर में जाना पड़ता था। एक दिन में दो से तीन बार बंकर्स में जाने को मजबूर थे। रूस और यूक्रेन में चल रहे युद्ध के कारण सिद्धार्थ और उसके साथ पढ़ रहे कई विद्यार्थी वहां फंस गए थे। सरकार ने आपरेशन गंगा के तहत सबको वहां से निकाला। सिद्धार्थ ने बताया कि वह यूक्रेन के सूमी शहर में स्थित एक यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस के अंतिम वर्ष का छात्र है। यूक्रेन में इस समय भयावह माहौल बना हुआ है। जब युद्ध के आसार बने थे, तभी लोगों ने फ्लाइट बुक करवानी शुरू कर दी थी। उन्होंने भी इस दौरान फ्लाइट बुक करवाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे। यूनिवर्सिटी में 700 के लगभग भारतीय विद्यार्थी थे, जोकि आसपास फ्लैटों में रह रहे थे। सभी को हिदायत दी गई थी, कि सब एक जगह हॉस्टल में रहें तभी सुरक्षित रह सकेंगे।
8 मार्च को शुरू हुआ निकासी अभियान
सिद्धार्थ ने बताया कि उनके ग्रुप ने पहले खुद आने की कोशिश की। ट्रांसपोर्ट उपलब्ध नहीं होने, रेल ट्रैक टूटने के कारण कोई हल नही निकल पा रहा था। इसके बाद भारत सरकार से गुहार लगाई गई। 8 मार्च को कोशिश शुरू हुई। इसके बाद आर्मी के कार्गो प्लेन में वह और अन्य साथी गाजियाबाद पहुंचे। वहां से वे सड़क के माध्यम से दिल्ली-अंबाला होकर कालका पहुंचे हैं। घर लौटने पर सिद्धार्थ सहित उनके पिता अनिल गर्ग, माता मीनू गर्ग और भाई जतिन गर्ग ने भारत सरकार का आभार व्यक्त कर आपरेशन गंगा की सराहना की है।
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उन्होंने बताया कि जब भी सायरन बजता था, तो उनको बंकर में जाना पड़ता था। एक दिन में दो से तीन बार बंकर्स में जाने को मजबूर थे। रूस और यूक्रेन में चल रहे युद्ध के कारण सिद्धार्थ और उसके साथ पढ़ रहे कई विद्यार्थी वहां फंस गए थे। सरकार ने आपरेशन गंगा के तहत सबको वहां से निकाला। सिद्धार्थ ने बताया कि वह यूक्रेन के सूमी शहर में स्थित एक यूनिवर्सिटी में एमबीबीएस के अंतिम वर्ष का छात्र है। यूक्रेन में इस समय भयावह माहौल बना हुआ है। जब युद्ध के आसार बने थे, तभी लोगों ने फ्लाइट बुक करवानी शुरू कर दी थी। उन्होंने भी इस दौरान फ्लाइट बुक करवाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रहे। यूनिवर्सिटी में 700 के लगभग भारतीय विद्यार्थी थे, जोकि आसपास फ्लैटों में रह रहे थे। सभी को हिदायत दी गई थी, कि सब एक जगह हॉस्टल में रहें तभी सुरक्षित रह सकेंगे।
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8 मार्च को शुरू हुआ निकासी अभियान
सिद्धार्थ ने बताया कि उनके ग्रुप ने पहले खुद आने की कोशिश की। ट्रांसपोर्ट उपलब्ध नहीं होने, रेल ट्रैक टूटने के कारण कोई हल नही निकल पा रहा था। इसके बाद भारत सरकार से गुहार लगाई गई। 8 मार्च को कोशिश शुरू हुई। इसके बाद आर्मी के कार्गो प्लेन में वह और अन्य साथी गाजियाबाद पहुंचे। वहां से वे सड़क के माध्यम से दिल्ली-अंबाला होकर कालका पहुंचे हैं। घर लौटने पर सिद्धार्थ सहित उनके पिता अनिल गर्ग, माता मीनू गर्ग और भाई जतिन गर्ग ने भारत सरकार का आभार व्यक्त कर आपरेशन गंगा की सराहना की है।
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