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Panchkula News: पुलिस हिरासत में फर्जी मुठभेड़ों का आरोप, जनहित याचिका से मामला पहुंचा हाईकोर्ट
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चंडीगढ़। पुलिस हिरासत के दौरान आरोपियों की कथित अतिरिक्त न्यायिक हत्याओं और गंभीर उत्पीड़न के मामलों को लेकर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पंजाब पुलिस द्वारा संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों और सर्वोच्च न्यायालय तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के दिशा-निर्देशों की अवहेलना की जा रही है।
याचिका अधिवक्ता निखिल सराफ द्वारा दायर की गई है जिसमें कार्यवाहक डीजीपी पंजाब सहित अन्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ पहले दी गई शिकायतों का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि पुलिस हिरासत में मौजूद आरोपियों को कथित रूप से मारने या गंभीर रूप से घायल करने की घटनाएं सामने आ रही हैं। ये कानून के शासन और मानवाधिकारों के लिए गंभीर चुनौती हैं।
याचिका में कहा गया है कि पुलिस का दायित्व कानून लागू करना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है लेकिन इसके विपरीत हिरासत में मौजूद व्यक्तियों के साथ हिंसक व्यवहार करने के आरोप आ रहे हैं। कुछ मामलों में आरोपियों के परिजनों से कथित रूप से धन उगाही की जाती है ताकि हिरासत में उन्हें नुकसान न पहुंचाया जाए।
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याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह भी मुद्दा उठाया कि जब पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर ही संगठित अपराधों में संलिप्तता के आरोप लगते हैं और उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तो कानून व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। याचिका में मांग की गई है कि हिरासत में हुई संदिग्ध मौतों और कथित फर्जी मुठभेड़ों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या विशेष निगरानी तंत्र के माध्यम से करवाई जाए ताकि जिम्मेदार अधिकारियों को कानून के दायरे में लाया जा सके।
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याचिका अधिवक्ता निखिल सराफ द्वारा दायर की गई है जिसमें कार्यवाहक डीजीपी पंजाब सहित अन्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ पहले दी गई शिकायतों का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि पुलिस हिरासत में मौजूद आरोपियों को कथित रूप से मारने या गंभीर रूप से घायल करने की घटनाएं सामने आ रही हैं। ये कानून के शासन और मानवाधिकारों के लिए गंभीर चुनौती हैं।
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याचिका में कहा गया है कि पुलिस का दायित्व कानून लागू करना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है लेकिन इसके विपरीत हिरासत में मौजूद व्यक्तियों के साथ हिंसक व्यवहार करने के आरोप आ रहे हैं। कुछ मामलों में आरोपियों के परिजनों से कथित रूप से धन उगाही की जाती है ताकि हिरासत में उन्हें नुकसान न पहुंचाया जाए।
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याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह भी मुद्दा उठाया कि जब पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर ही संगठित अपराधों में संलिप्तता के आरोप लगते हैं और उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं होती, तो कानून व्यवस्था की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। याचिका में मांग की गई है कि हिरासत में हुई संदिग्ध मौतों और कथित फर्जी मुठभेड़ों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या विशेष निगरानी तंत्र के माध्यम से करवाई जाए ताकि जिम्मेदार अधिकारियों को कानून के दायरे में लाया जा सके।