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अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र, कहा-पीयू के क्षेत्रीय अधिकारों में न हो कटौती, उच्च स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट वापस ली जाए

Sat, 17 Jul 2021 07:48 PM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Sat, 17 Jul 2021 07:48 PM IST
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Akali Dal chief Sukhbir Badal sent a letter to the President
चंडीगढ़। पंजाब विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय अधिकारों में कटौती न की जाए। साथ ही गवर्नेंस रिफार्म पर कुलपति की उच्च स्तरीय कमेटी की रिपोर्ट को भी वापस लिया जाए। शिरोमणि अकाली दल के प्रधान सुखबीर बादल ने रविवार को इस आशय का एक पत्र राष्ट्रपति को भेजा है। जिसमें उन्होंने पीयू में पंजाब के राज्यपाल को पदेन कुलपति के रूप में फिर से बहाल करने की भी मांग उठाई है।
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राष्ट्रपति को लिखे पत्र में सुखबीर बादल ने उनसे आग्रह किया कि वे पंजाबियों की आहत भावनाओं को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करें, क्योंकि पीयू की संस्कृति प्रशासनिक हस्तक्षेप से बुरी तरह प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि पंजाबी सांस्कृतिक लोकाचार को नष्ट करने की साजिशों से काफी परेशान हैं। अकाली दल के अध्यक्ष ने कहा कि विश्वविद्यालय के संस्थापकों की इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता के अनुसार पंजाब के लोगों ने यह संस्था बनाई थी, ताकि उनकी अकादमिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित किया जा सके। उन्होंने कहा कि हालांकि राज्य के पुनर्गठन के समय विश्वविद्यालय को अंतरराज्य निकाय कारपोरेट के रूप में वर्गीकृत किया गया और अधिनियम में ‘सरकार’ शब्द को ‘पंजाब सरकार’ में बदला गया, फिर इस शब्द को ‘भारत सरकार’ के रूप में प्रभावी ढंग से लागू कर दिया गया। बाद में एक और संशोधन से पंजाब के राज्यपाल के बजाय उपराष्ट्रपति को विश्वविद्यालय का चांसलर बनाया गया। सुखबीर ने कहा कि कमेटी की सिफारिशों में यह स्पष्ट किया गया है कि अब सभी शक्तियां पूर्व छात्रों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास नहीं, बल्कि आटोक्रेटिक वाइस चांसलर के पास होंगी। विश्वविद्यालय से पंजाबियों का यह उन्मूलन एचएलसी के जरिये तीसरी सिफारिश के साथ सीलबद्ध किया गया, जिसके अनुसार सिंडिकेट में निर्वाचित प्रतिनिधियों के बजाय केवल मनोनीत सदस्य होंगे। सिफारिशों ने अपने निर्वाचित सदस्यों के माध्यम से पंजाब के लोगों के प्रति अविश्वास प्रकट किया है। इससे उन्हें अपनी आवाज को अपमानजनक तरीके से राष्ट्रीय मुख्यधारा से बाहर निकालने के प्रयास दिखाई देते हैं। पंजाबियों को इस बात का बेहद दुख है कि मध्यमार्गी पार्टियां कांग्रेस और भाजपा दोनों ही इस तरह के पंजाब विरोधी और संघीय विरोधी हैं, इसलिए राष्ट्र विरोधी कदमों के साथ मिलीभगत है। यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि पंजाब में कांग्रेस सरकार ने इस मुद्दे पर चुप्पी बनाए रखी तथा मामले में मौन सहमति है।
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