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पौधे ही हैं हमारा परिवार

Fri, 22 Feb 2019 02:04 AM IST
Panchkula bureau Panchkula bureau
Updated Fri, 22 Feb 2019 02:04 AM IST
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पौधे ही हैं हमारा परिवार

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रूपन देओल बजाज ने ‘बॉनसाई’ में जीते 24 प्राइज

बोलीं - पौधे ही है हमारा परिवार

मोनिका नागर
चंडीगढ़। सेक्टर-16 स्थित रोज गार्डन में शुक्रवार से शुरू होने वाले 47वें रोज फेस्टिवल से पहले वीरवार को ‘फ्लावर एंड प्लांट इन ट्रे’ प्रतियोगिता के परिणाम घोषित किए गए। इस प्रतियोगिता में सेक्टर-2 के मकान नंबर-31 की रहने वाली रूपन देओल बजाज ने 12 कैटेगरी में हिस्सा लिया, जिसमें उन्होंने पहला स्थान प्राप्त किया। रूपन बजाज को कुल 24 प्राइज मिले। अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि पौधे ही हमारा परिवार हैं।
ऐसे करते हैं पौधों की देखभाल
रूपन बजाज ने बताया कि उन्होंने किताबों और फोटो देखकर पौधों को मेनटेन रखना सीखा। उनके सारे पौधे चंडीगढ़ के ही हैं। इन पौधों को ढूंढने में काफी मेहनत लगी। इन पौधों को वह अपने बच्चों की तरह पालती हैं। वह पूरे दिन इनके देखभाल में लगी रहती हैं। उन्होंने बताया कि किसी तरह की कोई कमी न हो इसके लिए उन्होंने एक माली भी रखा हुआ है। वह इन पेड़ों को बखूबी समझती हैं।
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इन पेड़ों की दी जानकारी

पिलखन का पेड़
यह पेड़ 50 साल पुराना है। यह सेक्टर- 3 से लाया गया था। नेक चंद ने जब रोज गार्डन बनाना शुरू किया था तब यह पेड़ हमारे पास आया था। जमीन में गाड़कर इसको जिंदा किया गया। इसकी हालत काफी खराब थी। इसको पहले मिट्टी में रहने की आदत डाली और अच्छे से देखभाल की। आज यह पेड़ काफी सुंदर है।
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पीपल का पेड़
यह पेड लगभग 100 साल पुराना है। यह सबसे पुराना पेड़ है। यह पेड़ सेक्टर- 44 से लाया गया था। रूपन ने बताया कि जब यह पेड़ मैं लेकर आई थी तब इसके तने निकले हुए थे। इसका बीच का हिस्सा बिलकुल मरा हुआ था। फिर इसकी देखभाल की गई। इस पर मैंने बहुत मेहनत की है। आज यह काफी हरा भरा है।

बरगद का पेड़
यह पेड़ सेक्टर- 16 के रोज क्लब के सामने वाले पेड़ से लाए थे। पेड़ के ऊपर से इसको लाया गया था। इसकी हालत ऐसी थी कि इसे मिट्टी में रहने की आदत नहीं थी। इसको देखकर लगता था कि यह शायद ही बचेगा। आज यह 45 साल का है। इसकी अच्छी बात यह है कि इसे पहली बार प्रतियोगिता में लाया गया है।

मुराया का पेड़
यह पेड़ नर्सरी से लाया गया था। यह 30 साल का है। रूपन ने बताया कि जब यह लाई थी तो इसका न सिर था और न ही पैर। इंटो से पानी पीकर पेड़ जिंदा रहते हैं। बड़ी मेहनत से इसकी देखभाल की। उस समय इसके तने निकले हुए थे। धीरे धीरे इसको पाला और इसकी कटिंग की।

जूनिपर का पेड़
रूपन देओल ने इस पेड़ के बारे में बताया कि यह शिमला से लाया गया था। यह एक ड्रम में लगा हुआ था। इसका पूरा वातावरण, मिट्टी और पानी बदल जाता है। इस कारण शिमला से लाए पौधों को बचाना मुश्किल होता है। इसको गमले में रखने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। क्योंकि यह पहले ही ड्रम में रहता था।


क्या है ‘बॉनसाई’
रूपन देओल के घर में 260 पेड़ 12 स्टाइल में हैं। बॉनसाई एक जैपनीज टर्म है। एक पेड़ की जड़ जमीन में होती है। बॉनसाई का मतलब है ट्रे में पेड़ का होना। बॉनसाई पेड़ गमले में होते हैं। इनको आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर शिफ्ट किया जा सकता है। चाहे इनको घर के अंदर रखो और चाहे घर से बाहर। रूपन बजाज ने कहा कि उनका स्टाइल यामादूरी है। यामादूरी का अर्थ है कि जापानी लोग पहाड़ों और पत्थरों में लगे पेड़ को जिंदा रखते थे।
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