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ये हैं मेयर के पॉवर और चुनौतियां
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मेयर के अधिकार और चुनौती
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अधिकार : चंडीगढ़ में मेयर खुद कोई फैसला नहीं ले सकते। सभी निर्णय सदन से पारित होते हैं।
. वर्किंग में क्या बदलाव-निगम के सभी बड़े निर्णय और काम जनता की सहमति और सहयोग से करने की कोशिश।
चुनौती : नगर निगम को वित्तीय रूप से मजबूत बनाना।
. बड़े काम जो करना चाहते हैं- शहर में 24 घंटे वॉटर सप्लाई। गीले और सूखे कचरे को अलग करने के लिए अभियान चलाएंगे।
संगठन मंत्री देते रहे हाईकमान को रिपोर्ट
मेयर चुनाव की काउंटिंग होते ही दर्शक दीर्घा में बैठे प्रदेश संगठन मंत्री दिनेश कुमार ने फोन से सूचना हाईकमान को दी। उनके संपर्क में प्रभारी प्रभात झा और राष्ट्रीय संगठन महामंत्री राम लाल थे।
मेयर को मिलती हैं ये सुविधाएं
मेयर को सेक्टर-24 में सरकारी आलीशान घर के अलावा सरकारी गाड़ी मिलती है। मेयर को दो सुरक्षाकर्मी के अलावा कार का सरकारी चालक मिलता है। घर पर काम करने के लिए दो सेवादार भी मिलते हैं। मेयर का अधिकारियों में दबदबा भी रहता है।
मेयर के पास हैं विशेष अधिकार
नगर निगम में जो भी वित्त एवं अनुबंध कमेटी और सदन में प्रस्ताव पास होने के लिए आता है, वह मेयर के माध्यम से ही आता है। मेयर किसी प्रस्ताव को रोक भी सकता है। मेयर को हर साल दो करोड़ रुपये का फंड मिलता है, जो वह पूरे शहर के विकास में खर्च कर सकता है।
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20 लाख मिलता है फंड
सीनियर डिप्टी मेयर को 20 लाख और डिप्टी मेयर को 10 लाख रुपये का फंड मिलता है। इसके अलावा हर माह 25 हजार रुपये का मानदेय मिलता है। सांसद के बाद मेयर का पद ही शहर में अहम है। मेयर का कार्यकाल एक साल का होता है।
इनके पास नहीं है कोई अधिकार
सीनियर डिप्टी और डिप्टी मेयर के पास कोई अधिकार नहीं होता है। सुविधा के नाम पर सिर्फ उन्हें नगर निगम में कमरा मिलता है, लेकिन उनके पास कोई फाइल नहीं आती है। पार्षद कई बार सीनियर डिप्टी और डिप्टी मेयर के लिए सरकारी गाड़ी की मांग कर चुके हैं, लेकिन प्रशासन यह मांग खारिज कर चुका है।
निगम हाउस में कुल वोट-
भाजपा-अकाली-21
कांग्रेस- 4
आजाद-1
स्थानीय सांसद-1
--मनोनीत पार्षद फिर नहीं डाल पाए वोट
नगर निगम के इतिहास में पहली बार नौ मनोनीत पार्षद मेयर मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाए। पिछले साल अगस्त में हाईकोर्ट ने मनोनीत पार्षदों के मताधिकार को समाप्त कर दिया था। मनोनीत पार्षदों के समर्थन में प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, लेकिन वहां से भी कोई राहत नहीं मिली है। मनोनीत पार्षदों को आशा थी कि उन्हें इस बार मताधिकार मिल जाएगा, लेकिन इस बार भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी है।
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अधिकार : चंडीगढ़ में मेयर खुद कोई फैसला नहीं ले सकते। सभी निर्णय सदन से पारित होते हैं।
. वर्किंग में क्या बदलाव-निगम के सभी बड़े निर्णय और काम जनता की सहमति और सहयोग से करने की कोशिश।
चुनौती : नगर निगम को वित्तीय रूप से मजबूत बनाना।
. बड़े काम जो करना चाहते हैं- शहर में 24 घंटे वॉटर सप्लाई। गीले और सूखे कचरे को अलग करने के लिए अभियान चलाएंगे।
संगठन मंत्री देते रहे हाईकमान को रिपोर्ट
मेयर चुनाव की काउंटिंग होते ही दर्शक दीर्घा में बैठे प्रदेश संगठन मंत्री दिनेश कुमार ने फोन से सूचना हाईकमान को दी। उनके संपर्क में प्रभारी प्रभात झा और राष्ट्रीय संगठन महामंत्री राम लाल थे।
मेयर को मिलती हैं ये सुविधाएं
मेयर को सेक्टर-24 में सरकारी आलीशान घर के अलावा सरकारी गाड़ी मिलती है। मेयर को दो सुरक्षाकर्मी के अलावा कार का सरकारी चालक मिलता है। घर पर काम करने के लिए दो सेवादार भी मिलते हैं। मेयर का अधिकारियों में दबदबा भी रहता है।
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मेयर के पास हैं विशेष अधिकार
नगर निगम में जो भी वित्त एवं अनुबंध कमेटी और सदन में प्रस्ताव पास होने के लिए आता है, वह मेयर के माध्यम से ही आता है। मेयर किसी प्रस्ताव को रोक भी सकता है। मेयर को हर साल दो करोड़ रुपये का फंड मिलता है, जो वह पूरे शहर के विकास में खर्च कर सकता है।
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20 लाख मिलता है फंड
सीनियर डिप्टी मेयर को 20 लाख और डिप्टी मेयर को 10 लाख रुपये का फंड मिलता है। इसके अलावा हर माह 25 हजार रुपये का मानदेय मिलता है। सांसद के बाद मेयर का पद ही शहर में अहम है। मेयर का कार्यकाल एक साल का होता है।
इनके पास नहीं है कोई अधिकार
सीनियर डिप्टी और डिप्टी मेयर के पास कोई अधिकार नहीं होता है। सुविधा के नाम पर सिर्फ उन्हें नगर निगम में कमरा मिलता है, लेकिन उनके पास कोई फाइल नहीं आती है। पार्षद कई बार सीनियर डिप्टी और डिप्टी मेयर के लिए सरकारी गाड़ी की मांग कर चुके हैं, लेकिन प्रशासन यह मांग खारिज कर चुका है।
निगम हाउस में कुल वोट-
भाजपा-अकाली-21
कांग्रेस- 4
आजाद-1
स्थानीय सांसद-1
--मनोनीत पार्षद फिर नहीं डाल पाए वोट
नगर निगम के इतिहास में पहली बार नौ मनोनीत पार्षद मेयर मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाए। पिछले साल अगस्त में हाईकोर्ट ने मनोनीत पार्षदों के मताधिकार को समाप्त कर दिया था। मनोनीत पार्षदों के समर्थन में प्रशासन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है, लेकिन वहां से भी कोई राहत नहीं मिली है। मनोनीत पार्षदों को आशा थी कि उन्हें इस बार मताधिकार मिल जाएगा, लेकिन इस बार भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी है।