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26 मई को घरों और धरनास्थल पर काले झंडे लगाकर किसान मनाएंगे काला दिवस

Sun, 23 May 2021 10:43 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sun, 23 May 2021 10:43 PM IST
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On May 26, farmers will celebrate Black Day by placing black flags on houses and pickets
पलवल। केएमपी-केजीपी इंटरचेंज पर कृषि कानूनों के विरोध में चल रहा किसानों का धरना जारी है। धरनास्थल में 26 मई को काला दिवस मानाया जाएगा। इसे लेकर रविवार को चर्चा की गई। इस दौरान निर्णय लिया कि 26 मई को किसान आंदोलन और प्रदेश सरकार के छह माह पूरे होने पर किसान अपने घरों व धरनास्थल पर काले झंडे लगाकर विरोध जताएंगे।
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इस दौरान पृथला विधायक नयनपाल रावत पर किसान जमकर बरसे। किसानों ने कहा कि नयनपाल रावत आज जो कुछ भी हैं, किसानों की बदौलत हैं। आज सरकार में शामिल होकर किसानों के खिलाफ बयानबाजी करने का खामियाजा उन्हें अगले चुनाव में भुगतना पड़ेगा। किसान संघर्ष समिति के तत्वावधान में चल रहे धरने को संबोधित करते हुए किसान नेता रतन सिंह सौरौत, स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती व अखिल भारतीय किसान सभा के जिला प्रधान धर्मचंद घुघेरा ने कहा कि किसान तीन कृषि कानूनों की वापसी तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी की मांग को लेकर पिछले छह महीने से सड़कों पर आंदोलन कर रहे हैं। सरकार अपने अहंकार में इतनी डूबी हुई है कि किसानों की बात सुनना तो दूर उल्टे किसानों को लगातार बदनाम करने पर लगी हुई है।
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मास्टर महेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि पृथला के विधायक नयनपाल रावत ने बयान दिया है कि हिसार में किसानों द्वारा मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में जाना उचित नहीं था, जिससे पुलिस को सख्ती दिखानी पड़ी। उन्होंने कहा कि नयनपाल रावत को इसी भाजपा सरकार ने टिकट नहीं दिया था। किसानों ने इनका आर्थिक व सामाजिक सहयोग करते हुए निर्दलीय जीत हासिल कराई और आज वे सरकार के भ्रम में किसानों को खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं, जिससे बर्दास्त नहीं किया जाएगा। धरने में किसान नेता रमेशचंद, इंदर रावत, अच्छेलाल, रोशनलाल, ताराचंद, राजेंद्र घर्रौट, करतार, बुद्धि, हुकम, सोहनपाल चौहान, नरेंद्र सहरावत, हरि नंबरदार व रूप राम तेवतिया ने अपने विचार व्यक्त किए।
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22 जनवरी से बंद है बातचीत
22 जनवरी के बाद किसानों से बातचीत बंद कर दी है। उन्होंने बताया कि संयुक्त किसान मोर्चा ने देश के प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर यह मांग की है कि कोरोना महामारी को देखते हुए किसानों की मांगों को मान लिया जाए, जिससे किसान आंदोलन समाप्त करके अपनी खेती के काम में लग जाएं।
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