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होलिका दहन की परंपरा में काट दिए जाते हैं सैकड़ों पेड़
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पलवल। दुल्हैंडी से एक दिन पूर्व होलिका दहन की परंपरा बेहद प्राचीन है। जो अन्याय पर न्याय की प्रतीक मानी जाती है। होलिका दहन के नाम पर जगह-जगह होने वाले कार्यक्रमों के कारण हर वर्ष जिले में ही सैकड़ों पेड़ काट दिए जाते हैं। अनुमानित करीब डेढ़ हजार क्विंटल लकड़ी जला दी जाती है। लोगों की मांग है कि कार्यक्रमों की संख्या कम करने से परंपरा का निर्वहन भी हो जाएगा और वृक्ष बचाओ अभियान को भी बढ़ावा मिलेगा।
जिले के लगभग सभी गांवों में होलिका दहन होता है। एक कार्यक्रम में अनुमानित दो पेड़ों जितनी चार-पांच क्विंटल लकड़ियां इस्तेमाल होती हैं। पलवल, हथीन, होडल व हसनपुर के शहरी क्षेत्रों में करील की झाड़ियां न मिलने पर करीब 25 से अधिक स्थानों पर 150 क्विंटल के करीब लकड़ी इस्तेमाल होती है। ईंधन के प्रमुख स्त्रोत गोबर से बनी बुरकलियां भी बड़ी मात्रा में जलाई जाती हैं।
एक या दो स्थान पर होलिका दहन की मांग
लोगों का कहना है कि दशहरा पर रावण के पुतले का दहन कुछ चुनिंदा जगहों पर किया जाता है। इसी प्रकार होलिका दहन भी शहर में एक या दो स्थानों पर या कई गांवों का एक ही जगह हो तो काफी लकड़ियां बचाई जा सकती है। इससे सैकड़ों पेड़ कटने से बच जाएंगे। वहीं पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। वहीं कई स्थानों पर होलिका दहन के कार्यक्रम भी बीच सड़क पर होते हैं। इससे तारकोल वाली सड़क का तारकोल जल जाता है और रोड़ी रह जाती है। इससे लोगों को भी असुविधा होती है। लोगों को खुद ही आगे आकर ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि ऐसे स्थान पर होलिका दहन कार्यक्रम रखें, जिसमें सभी को सुविधा हो।
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वर्जन
होलिका दहन एक गांव में एक स्थान पर किया जाना चाहिए। इससे जहां आपसी भाईचारा बढे़गा, वहीं पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। अनेक पेड़ कटने से बच जाएंगे। ईंधन भी बचेगा। - लाल सिंह तेवतिया, सदस्य पंचायत समिति पृथला
होलिका दहन कार्यक्रम एक ही स्थान पर होने चाहिए। इससे लकड़ियां बचेंगी, तभी पेड़ बचेंगे। क्योंकि कई स्थानों पर लोग होलिका दहन के लिए पेड़ों को भी काट देते हैं। खर्च भी घटेगा। - नमिता तायल, अध्यक्षा स्मार्ट एंड क्लीन इंडिया
वृक्षों के बिना जीवन की कल्पना व्यर्थ है। होलिका दहन के नाम पर अनेक वृक्षों की बलि चढ़ जाती है। एक ही स्थान पर होलिका दहन करने से धार्मिक रस्म भी पूरी हो जाएगी और पर्यावरण संतुलन भी बना रहेगा। - रेणु छाबड़ा, समाज सेविका
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जिले के लगभग सभी गांवों में होलिका दहन होता है। एक कार्यक्रम में अनुमानित दो पेड़ों जितनी चार-पांच क्विंटल लकड़ियां इस्तेमाल होती हैं। पलवल, हथीन, होडल व हसनपुर के शहरी क्षेत्रों में करील की झाड़ियां न मिलने पर करीब 25 से अधिक स्थानों पर 150 क्विंटल के करीब लकड़ी इस्तेमाल होती है। ईंधन के प्रमुख स्त्रोत गोबर से बनी बुरकलियां भी बड़ी मात्रा में जलाई जाती हैं।
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एक या दो स्थान पर होलिका दहन की मांग
लोगों का कहना है कि दशहरा पर रावण के पुतले का दहन कुछ चुनिंदा जगहों पर किया जाता है। इसी प्रकार होलिका दहन भी शहर में एक या दो स्थानों पर या कई गांवों का एक ही जगह हो तो काफी लकड़ियां बचाई जा सकती है। इससे सैकड़ों पेड़ कटने से बच जाएंगे। वहीं पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। वहीं कई स्थानों पर होलिका दहन के कार्यक्रम भी बीच सड़क पर होते हैं। इससे तारकोल वाली सड़क का तारकोल जल जाता है और रोड़ी रह जाती है। इससे लोगों को भी असुविधा होती है। लोगों को खुद ही आगे आकर ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि ऐसे स्थान पर होलिका दहन कार्यक्रम रखें, जिसमें सभी को सुविधा हो।
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होलिका दहन एक गांव में एक स्थान पर किया जाना चाहिए। इससे जहां आपसी भाईचारा बढे़गा, वहीं पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। अनेक पेड़ कटने से बच जाएंगे। ईंधन भी बचेगा। - लाल सिंह तेवतिया, सदस्य पंचायत समिति पृथला
होलिका दहन कार्यक्रम एक ही स्थान पर होने चाहिए। इससे लकड़ियां बचेंगी, तभी पेड़ बचेंगे। क्योंकि कई स्थानों पर लोग होलिका दहन के लिए पेड़ों को भी काट देते हैं। खर्च भी घटेगा। - नमिता तायल, अध्यक्षा स्मार्ट एंड क्लीन इंडिया
वृक्षों के बिना जीवन की कल्पना व्यर्थ है। होलिका दहन के नाम पर अनेक वृक्षों की बलि चढ़ जाती है। एक ही स्थान पर होलिका दहन करने से धार्मिक रस्म भी पूरी हो जाएगी और पर्यावरण संतुलन भी बना रहेगा। - रेणु छाबड़ा, समाज सेविका