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Mahendragarh-Narnaul News: राजा परीक्षित के जन्म व सुखदेव के आगमन की कथा सुनाई
Fri, 21 Jun 2024 12:18 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Fri, 21 Jun 2024 12:18 AM IST
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फोटो संख्या:62-कनीना- अटेली मार्ग पर भारद्वाज कुटीर में श्रीमद्भागवत कथा में कथा सुनाते आचार्य
कनीना। कनीना से अटेली मार्ग भारद्वाज कुटीर कथा स्थल पर श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन सुखदेव जन्मोत्सव व परीक्षित जन्म की कथा का श्रवण करवाया गया।
श्रीमद्भागवत कथा में मुख्य यजमान रूपेश शर्मा जिला न्यायाधीश रहे। कथा व्यास आचार्य निमेश के जोशी परीक्षित जन्म, सुखदेव आगमन की कथा सुनाई। उन्होंने युद्ध में गुरु द्रोण के मारे जाने से क्रोधित होकर उनके पुत्र अश्वत्थामा ने क्रोधित होकर पांडवों को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया। ब्रह्मास्त्र से लगने से अभिमन्यु की गर्भवती पत्नी उत्तरा के गर्भ से परीक्षित का जन्म हुआ। परीक्षित जब बड़े हुए नाती पोतों से भरा पूरा परिवार था। सुख वैभव से समृद्ध राज्य था। एक दिन वह क्रमिक मुनि से मिलने उनके आश्रम गए।
उन्होंने आवाज लगाई, लेकिन तप में लीन होने के कारण मुनि ने कोई उत्तर नहीं दिया। राजा परीक्षित स्वयं का अपमान मानकर निकट मृत पड़े सर्प को क्रमिक मुनि के गले में डाल कर चले गए। अपने पिता के गले में मृत सर्प को देख मुनि के पुत्र ने श्राप दे दिया कि जिस किसी ने भी मेरे पिता के गले में मृत सर्प डाला है। उसकी मृत्यु सात दिनों के अंदर सांप के डसने से हो जाएगी। ऐसा ज्ञात होने पर राजा परीक्षित ने विद्वानों को अपने दरबार में बुलाया और उनसे राय मांगी। उस समय विद्वानों ने उन्हें सुखदेव का नाम सुझाया और इस प्रकार सुखदेव का आगमन हुआ। इस मौके पर रामेश्वर दास महाराज चित्रावली, आयोजक राजेश शर्मा, कमलेश शर्मा, रमेश शर्मा, नरेंद्र शर्मा, सूरजभान शर्मा, श्यामलाल शर्मा, प्रो. देशराज शर्मा, जयवीर आदि मौजूद रहे।
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श्रीमद्भागवत कथा में मुख्य यजमान रूपेश शर्मा जिला न्यायाधीश रहे। कथा व्यास आचार्य निमेश के जोशी परीक्षित जन्म, सुखदेव आगमन की कथा सुनाई। उन्होंने युद्ध में गुरु द्रोण के मारे जाने से क्रोधित होकर उनके पुत्र अश्वत्थामा ने क्रोधित होकर पांडवों को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया। ब्रह्मास्त्र से लगने से अभिमन्यु की गर्भवती पत्नी उत्तरा के गर्भ से परीक्षित का जन्म हुआ। परीक्षित जब बड़े हुए नाती पोतों से भरा पूरा परिवार था। सुख वैभव से समृद्ध राज्य था। एक दिन वह क्रमिक मुनि से मिलने उनके आश्रम गए।
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उन्होंने आवाज लगाई, लेकिन तप में लीन होने के कारण मुनि ने कोई उत्तर नहीं दिया। राजा परीक्षित स्वयं का अपमान मानकर निकट मृत पड़े सर्प को क्रमिक मुनि के गले में डाल कर चले गए। अपने पिता के गले में मृत सर्प को देख मुनि के पुत्र ने श्राप दे दिया कि जिस किसी ने भी मेरे पिता के गले में मृत सर्प डाला है। उसकी मृत्यु सात दिनों के अंदर सांप के डसने से हो जाएगी। ऐसा ज्ञात होने पर राजा परीक्षित ने विद्वानों को अपने दरबार में बुलाया और उनसे राय मांगी। उस समय विद्वानों ने उन्हें सुखदेव का नाम सुझाया और इस प्रकार सुखदेव का आगमन हुआ। इस मौके पर रामेश्वर दास महाराज चित्रावली, आयोजक राजेश शर्मा, कमलेश शर्मा, रमेश शर्मा, नरेंद्र शर्मा, सूरजभान शर्मा, श्यामलाल शर्मा, प्रो. देशराज शर्मा, जयवीर आदि मौजूद रहे।
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