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Mahendragarh-Narnaul News: राजावास पहुंची सुप्रीम कोर्ट की उच्चस्तरीय कमेटी, ग्रामीणों ने उठाई खनन बंद करने की मांग
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फोटो संख्या:73- गांव राजावास में ग्रामीणों से बातचीत करते एसडीएम योगेश सैनी--स्रोत- एपीआरओ
महेंद्रगढ़। अरावली पर्वत शृंखला को खनन क्षेत्र से बाहर रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाई गई चार सदस्यीय उच्चस्तरीय कमेटी ने बुधवार को गांव राजावास के खनन क्षेत्र का निरीक्षण किया। कमेटी ने खनन क्षेत्र का स्थलीय निरीक्षण किया और ग्रामीणों से सुझाव लिए। ग्रामीणों ने खनन बंद कराने की मांग रखी।
कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के दो रिटायर्ड जज, गुरुग्राम डीएफओ सुभाष यादव और वन संरक्षक राजकुमार शामिल रहे। इनके साथ महेंद्रगढ़ डीएफओ ऋषिपाल बिश्नोई, वन संरक्षक विक्रम सिंह और एसडीएम योगेश सैनी भी अरावली क्षेत्र में पहुंचे।
खनन से परेशान ग्रामीणों ने कई बार शिकायत की थी। कई बार अधिकारियों के आगे उनकी स्थिति के देखने की गुहार लगाई थी। मंगलवार को भी ग्रामीणों की कमेटी से बात हुई थी और उन्होंने उनके गांव आकर उनकी स्थिति का जायजा लेने की मांग की थी।
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ग्रामीणों ने सोहला से नांगल माला तक करीब 15 किलोमीटर क्षेत्र को खनन से बाहर रखने की मांग की। उनका कहना था कि अरावली की सुरक्षा सिर्फ पहाड़ियों तक सीमित न रखकर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के आधार पर देखी जाए।
पूर्व सरपंच सूरजभान, पंचायत के 10 सदस्यों, धर्मपाल सिंह, डॉ. रोहताश शर्मा, हनुमान शर्मा, प्रकाश नंबरदार, सत्यनारायण नंबरदार समेत 350 ग्रामीणों ने करीब 506.33 हेक्टेयर वन क्षेत्र के संरक्षण का मुद्दा उठाया।
ग्रामीणों ने वन भूमि से जुड़े नियमों के पालन पर सवाल उठाए। उन्होंने सीएफआर और डीएमएस फंड का मुद्दा भी रखा। उनका कहना था कि इन निधियों का उपयोग पंचायत के विकास कार्यों में हो सकता है लेकिन अपेक्षित राशि न मिलने से काम प्रभावित होते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार खसरा नंबर 91 से 120 तक का क्षेत्र संरक्षित वन क्षेत्र घोषित है। उन्होंने वहां खनन की स्थिति और लागू प्रतिबंध स्पष्ट करने की भी मांग की।
पहाड़ियों के बीच के मैदान भी हों संरक्षित
ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि अगर दो पहाड़ियों के बीच मैदानी हिस्सा है, तो क्या उसका पर्यावरणीय महत्व खत्म हो जाता है। उनका कहना था कि ये हिस्से वन्यजीवों की आवाजाही और प्राकृतिक पारिस्थितिकी के लिए अहम हो सकते हैं। इसलिए सीमाएं तय करते समय इन्हें भी वैज्ञानिक आधार पर जांचा जाए, ताकि वहां अंधाधुंध ब्लास्टिंग और खनन रोकने की संभावना परखी जा सके।
खनन से वन्यजीवों पर खतरे की आशंका
सरपंच मोहित कुमार ने बताया कि कुछ दिन पहले वन्य प्राणी विभाग की रिसर्च रिपोर्ट जारी हुई थी। इसमें खुडाना क्षेत्र में चीते की मौजूदगी और राजावास क्षेत्र में जंगली बिल्ली, गीदड़ व जरख की मौजूदगी पाई गई। उन्होंने औषधीय पौधों का भी जिक्र किया और कहा कि खनन से इस प्राकृतिक संपदा पर असर पड़ सकता है।
जमीनी सर्वेक्षण के बाद तय होंगी सीमाएं
एसडीएम योगेश सैनी ने बताया कि कमेटी का उद्देश्य अरावली के संवेदनशील शिखरों, पारिस्थितिकी और जल स्रोतों की वैज्ञानिक पहचान कर उन्हें सुरक्षित करने के पहलुओं का आकलन करना है। भारतीय वानिकी अनुसंधान व शिक्षा परिषद के महानिदेशक की अध्यक्षता में बनी कमेटी जमीनी सर्वेक्षण के जरिये अरावली की वास्तविक सीमाएं तय करने की प्रक्रिया में जुटी है।
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कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के दो रिटायर्ड जज, गुरुग्राम डीएफओ सुभाष यादव और वन संरक्षक राजकुमार शामिल रहे। इनके साथ महेंद्रगढ़ डीएफओ ऋषिपाल बिश्नोई, वन संरक्षक विक्रम सिंह और एसडीएम योगेश सैनी भी अरावली क्षेत्र में पहुंचे।
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खनन से परेशान ग्रामीणों ने कई बार शिकायत की थी। कई बार अधिकारियों के आगे उनकी स्थिति के देखने की गुहार लगाई थी। मंगलवार को भी ग्रामीणों की कमेटी से बात हुई थी और उन्होंने उनके गांव आकर उनकी स्थिति का जायजा लेने की मांग की थी।
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ग्रामीणों ने सोहला से नांगल माला तक करीब 15 किलोमीटर क्षेत्र को खनन से बाहर रखने की मांग की। उनका कहना था कि अरावली की सुरक्षा सिर्फ पहाड़ियों तक सीमित न रखकर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के आधार पर देखी जाए।
पूर्व सरपंच सूरजभान, पंचायत के 10 सदस्यों, धर्मपाल सिंह, डॉ. रोहताश शर्मा, हनुमान शर्मा, प्रकाश नंबरदार, सत्यनारायण नंबरदार समेत 350 ग्रामीणों ने करीब 506.33 हेक्टेयर वन क्षेत्र के संरक्षण का मुद्दा उठाया।
ग्रामीणों ने वन भूमि से जुड़े नियमों के पालन पर सवाल उठाए। उन्होंने सीएफआर और डीएमएस फंड का मुद्दा भी रखा। उनका कहना था कि इन निधियों का उपयोग पंचायत के विकास कार्यों में हो सकता है लेकिन अपेक्षित राशि न मिलने से काम प्रभावित होते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार खसरा नंबर 91 से 120 तक का क्षेत्र संरक्षित वन क्षेत्र घोषित है। उन्होंने वहां खनन की स्थिति और लागू प्रतिबंध स्पष्ट करने की भी मांग की।
पहाड़ियों के बीच के मैदान भी हों संरक्षित
ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि अगर दो पहाड़ियों के बीच मैदानी हिस्सा है, तो क्या उसका पर्यावरणीय महत्व खत्म हो जाता है। उनका कहना था कि ये हिस्से वन्यजीवों की आवाजाही और प्राकृतिक पारिस्थितिकी के लिए अहम हो सकते हैं। इसलिए सीमाएं तय करते समय इन्हें भी वैज्ञानिक आधार पर जांचा जाए, ताकि वहां अंधाधुंध ब्लास्टिंग और खनन रोकने की संभावना परखी जा सके।
खनन से वन्यजीवों पर खतरे की आशंका
सरपंच मोहित कुमार ने बताया कि कुछ दिन पहले वन्य प्राणी विभाग की रिसर्च रिपोर्ट जारी हुई थी। इसमें खुडाना क्षेत्र में चीते की मौजूदगी और राजावास क्षेत्र में जंगली बिल्ली, गीदड़ व जरख की मौजूदगी पाई गई। उन्होंने औषधीय पौधों का भी जिक्र किया और कहा कि खनन से इस प्राकृतिक संपदा पर असर पड़ सकता है।
जमीनी सर्वेक्षण के बाद तय होंगी सीमाएं
एसडीएम योगेश सैनी ने बताया कि कमेटी का उद्देश्य अरावली के संवेदनशील शिखरों, पारिस्थितिकी और जल स्रोतों की वैज्ञानिक पहचान कर उन्हें सुरक्षित करने के पहलुओं का आकलन करना है। भारतीय वानिकी अनुसंधान व शिक्षा परिषद के महानिदेशक की अध्यक्षता में बनी कमेटी जमीनी सर्वेक्षण के जरिये अरावली की वास्तविक सीमाएं तय करने की प्रक्रिया में जुटी है।

फोटो संख्या:73- गांव राजावास में ग्रामीणों से बातचीत करते एसडीएम योगेश सैनी--स्रोत- एपीआरओ