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धरमपुर के गामित परिवार ने तीन अनजानों को दी नई जिंदगी, ग्रीन कॉरिडोर से हॉस्पिटल पहुंचा दिल

Thu, 15 Oct 2026 11:50 PM IST
Heera अमर उजाला नेटवर्क, रोहतक
अमर उजाला नेटवर्क, रोहतक Published by: Heera Updated Thu, 15 Oct 2026 11:50 PM IST
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family from Dharampur gave a new life to three strangers heart reached hospital via a green corridor
अस्पताल प्रशासन ने अतुलभाई को गार्ड ऑफ ऑनर देकर अंतिम विदाई दी - फोटो : अमर उजाला
इस साल 13 मई की रात दक्षिण गुजरात के एक परिवार ने अपनी जिंदगी के सबसे बड़े दुख के बीच ऐसा फैसला लिया, जिससे तीन अनजान लोगों की जान बच गई। वांसदा तालुका के महुवास गांव के 40 साल के अतुलभाई गामित को बेहद गंभीर हालत में धरमपुर के श्रीमद् राजचंद्र हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर की इमरजेंसी में लाया गया। सीटी स्कैन में पता चला कि उनके दिमाग में गंभीर ब्लीडिंग (ब्रेन हेमरेज) हुई है। आईसीयू की टीम ने तुरंत इलाज शुरू किया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। तय मेडिकल और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया। किसी भी परिवार के लिए यह सबसे मुश्किल घड़ी होती है। लेकिन इसी घड़ी में गामित परिवार ने अतुलभाई के सभी अंग दान करने के लिए हां कह दी।
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अंगदान की प्रक्रिया में समय सबसे अहम होता है, खासकर दिल के मामले में। अस्पताल की टीम ने तुरंत मोर्चा संभाला। ग्रीन कॉरिडोर तैयार कर अतुलभाई का दिल सड़क मार्ग से दमन एयरपोर्ट पहुंचाया गया, जहां से विशेष फ्लाइट के जरिए उसे अहमदाबाद भेजा गया। वहीं, दोनों किडनी एम्बुलेंस से अहमदाबाद के किडनी इंस्टीट्यूट पहुंचाई गईं। एक परिवार के इस साहसी फैसले से तीन गंभीर मरीजों को नई सांसें मिल गईं।
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दक्षिण गुजरात के ग्रामीण अंचल और श्रीमद् राजचंद्र हॉस्पिटल के इतिहास में यह पहला ऑर्गन डोनेशन था। आमतौर पर ब्रेन डेड की पहचान, कानूनी औपचारिकताएं और अंगों को सुरक्षित एयरलिफ्ट करने जैसी जटिल प्रक्रियाएं महानगरों के बड़े अस्पतालों तक सीमित रहती हैं। अस्पताल प्रशासन ने अतुलभाई को गार्ड ऑफ ऑनर देकर अंतिम विदाई दी और उनके परिवार का आभार जताया।
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पूज्य गुरुदेवश्री राकेशजी की प्रेरणा से संचालित 250 बेड का यह चैरिटेबल अस्पताल 500 से ज्यादा गांवों के लिए जीवनरेखा है। संस्था 2016 से अंगदान जागरूकता अभियान चला रही है, लेकिन ग्रामीण परिवेश में पारंपरिक मान्यताओं को पीछे छोड़कर किसी अपने के अंगदान का फैसला लेना वाकई असाधारण है। अतुलभाई अब दुनिया में नहीं हैं, पर उनका दिल किसी और के सीने में धड़क रहा है और दोनों किडनियां दो जिंदगियों को सहारा दे रही हैं।
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