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श्रीमद् भागवत कथा ने लिया विराम
Updated Tue, 25 Jul 2017 01:11 AM IST
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अमर उजाला ब्यूरो
सतनाली मंडी। संतो के बिना भगवान को भी नहीं पाया जा सकता और बिना भगवान की अनुकंपा के बिना संतों के दर्शन नहीं हो पाते। शास्त्रों में संतों की बहुत महिमा मिलती है। स्वयं भगवान ने भी अपने भक्त संतों की महिमा गाई है। यह बात खंड के गांव जड़वा में चल रही श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह के अंतिम दिन चित्रकूट से पधारे कथाचार्य दिनेश मिश्रा ने उपस्थित श्रोताओं के समक्ष व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहकर इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना ही सबसे बड़ी तपस्या है। जिस प्रकार ठहरा हुआ पानी दूषित हो जाता है उसी प्रकार एक ही जगह पर रुके हुए संत के मन में भी विकार पनपने लगते हैं। इसलिए संतों को लगातार प्रभु भक्ति के साथ-साथ इसके प्रचार-प्रसार के लिए सदैव विचरण करते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि संत या भक्त किसी वेशभूषा का नाम नहीं है बल्कि भीतर के भाव का नाम है। संत भाव रखने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, क्षुद्र, माता-बहन कोई भी हो सकते हैं।
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सतनाली मंडी। संतो के बिना भगवान को भी नहीं पाया जा सकता और बिना भगवान की अनुकंपा के बिना संतों के दर्शन नहीं हो पाते। शास्त्रों में संतों की बहुत महिमा मिलती है। स्वयं भगवान ने भी अपने भक्त संतों की महिमा गाई है। यह बात खंड के गांव जड़वा में चल रही श्रीमद् भागवत कथा सप्ताह के अंतिम दिन चित्रकूट से पधारे कथाचार्य दिनेश मिश्रा ने उपस्थित श्रोताओं के समक्ष व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहकर इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना ही सबसे बड़ी तपस्या है। जिस प्रकार ठहरा हुआ पानी दूषित हो जाता है उसी प्रकार एक ही जगह पर रुके हुए संत के मन में भी विकार पनपने लगते हैं। इसलिए संतों को लगातार प्रभु भक्ति के साथ-साथ इसके प्रचार-प्रसार के लिए सदैव विचरण करते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि संत या भक्त किसी वेशभूषा का नाम नहीं है बल्कि भीतर के भाव का नाम है। संत भाव रखने वाले ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, क्षुद्र, माता-बहन कोई भी हो सकते हैं।