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जहां चुनाव में भी नहीं टूटता भाईचारा वो गांव है धुराला
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कुरुक्षेत्र गांव धुराला में पंचायत चुनाव पर चर्चा करते ग्रामीण।
- फोटो : Kurukshetra
पंचायती चुनाव के मद्देनजर एक ओर जहां जिला प्रशासन संवेदनशील और अतिसंवेदनशील रहे बूथों के पुराने रिकार्ड खंगाल रहा है। वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय से करीब आठ किलोमीटर दूरी पर स्थित गांव धुराला लोकतंत्र की मिसाल रहा रहा है। चुनाव में जीत-हार के बावजूद यहां भाईचारे में कभी कमी नहीं आई। न ही चुनाव को लेकर कभी विवाद हुआ है। गांव में बने इस भाईचारे की चर्चा आसपास के क्षेत्रों में भी आम है।
पंचायती चुनाव में मारपीट और हिंसक घटनाएं दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। स्थिति यह है कि चौधर का चुनाव जीतने के लिए प्रत्याशी मरने और मारने को भी तैयार रहते हैं। वहीं चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाते हैं। इससे अलग करीब चार हजार की आबादी वाले धुराला गांव में पिछले 50 वर्षों में कोई चुनावी हिंसा नहीं हुई है। यहां तक कि गांव में विजेता रहने वाले किसी सरपंच ने अपनी जीत का जश्न भी ऐसा नहीं मनाया कि उससे हारने वाले पक्ष के बीच दूरी बने। चुनाव के बावजूद गांव में दिखाई देने वाला भाईचारा किसी सर्वसम्मति से कम नहीं है। विजेता हर किसी का आभार जताता है तो हर कोई उसे बधाई भी देता है। फिर भले ही हारने वाला पक्ष ही क्यों न हो।
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खासियत के कारण ही गांव को पहले
राज्यमंत्री फिर सांसद ने लिया गोद
गांव के लोग जिस अमन और भाईचारे के साथ रहते हैं। शायद यह उसी का परिणाम है कि सरकार ने भी इसे पूरी तव्ज्जो दी है। इस गांव को पहले तत्कालीन राज्यमंत्री कृष्ण बेदी ने गोद लिया और उस दौरान ग्राम पंचायत के सहयोग से भरपूर विकास हुआ तो फिर वर्तमान सांसद नायब सिंह सैनी ने इसे गोद लिया। इसके बाद विकास कार्यों की रही कसर भी पूरी हो गई। गांव के लोगों की मानें तो आज गांव हर सुविधा से संपन्न है। गांव सीनियर सेकेंडरी स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी, हर समाज की चौपाल के अलावा अधिकतर गलियां व नालियां तक पक्की है तो गांव शहर जैसी सुविधाओं से युक्त है।
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यहां कभी नहीं देखी राजनीतिक रंजिश : राजकुमार
गांव में ही करियाणा की दुकान चलाने वाले राजकुमार बताते हैं कि यहां अलग-अलग जाति व धर्म के लोग रहते हैं, लेकिन सभी में भाईचारा हमेशा बना रहा है। यहां कभी न जातिगत और न ही धर्म के आधार पर आपसी विवाद हुआ है। न ही कभी राजनीतिक रंजिश देखी गई। लोगों में इस कदर भाईचारा है कि हर कार्यक्रम साझा दिखाई देने लगता है।
चुनाव में झगड़ा होता है, यह पता भी नहीं : छलकू राम
ग्रामीण छलकू राम बताते हैं कि गांव में चुनाव पंच का हो या सरपंच के लिए, ब्लॉक समिति का हो या जिला परिषद का, कभी भी झगड़ा नहीं होता। ऐसे सामान्य हालात रहते हैं, जैसे किसी को पता ही न हो कि चुनाव में झगड़ा भी हो जाता है। कोई चुनाव जीतता भी है तो वह विजयी जुलूस नहीं निकालता। यहां तक कि पता भी नहीं चल पाता कि विजेता रहा उम्मीदवार कब अपने घर चला गया।
इस बार भी पहले की तरह ही होगा चुनाव : दीवान
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ग्रामीण दीवान चंद का कहना है कि भाईचारे की जो मिसाल पहले के चुनावों में देखने को मिली थी, वही इस चुनाव में भी दिखाई देगी। गांव के हर व्यक्ति को यही उम्मीद है और शायद यही कारण है कि चुनाव मैदान में उतरने वाले किसी भी व्यक्ति ने खुलकर प्रचार तक करना शुरू नहीं किया।
पांच प्लान तक राम सिंह रहे सरपंच : शीशराम
ग्रामीण शीशराम बताते हैं कि गांव में भाईचारे की मिसाल इससे बड़ी नहीं हो सकती कि गांववासी रामसिंह ही पांच प्लान तक सर्वसम्मति से सरपंच बनते रहे। इससे पहले और बाद में होने वाले चुनावों में भी कोई आपसी खींचतान नहीं हुई। एक-दूसरे के समर्थक सभी का पूरा सम्मान करते रहे हैं।
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पंचायती चुनाव में मारपीट और हिंसक घटनाएं दिनोंदिन बढ़ती जा रही हैं। स्थिति यह है कि चौधर का चुनाव जीतने के लिए प्रत्याशी मरने और मारने को भी तैयार रहते हैं। वहीं चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाते हैं। इससे अलग करीब चार हजार की आबादी वाले धुराला गांव में पिछले 50 वर्षों में कोई चुनावी हिंसा नहीं हुई है। यहां तक कि गांव में विजेता रहने वाले किसी सरपंच ने अपनी जीत का जश्न भी ऐसा नहीं मनाया कि उससे हारने वाले पक्ष के बीच दूरी बने। चुनाव के बावजूद गांव में दिखाई देने वाला भाईचारा किसी सर्वसम्मति से कम नहीं है। विजेता हर किसी का आभार जताता है तो हर कोई उसे बधाई भी देता है। फिर भले ही हारने वाला पक्ष ही क्यों न हो।
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खासियत के कारण ही गांव को पहले
राज्यमंत्री फिर सांसद ने लिया गोद
गांव के लोग जिस अमन और भाईचारे के साथ रहते हैं। शायद यह उसी का परिणाम है कि सरकार ने भी इसे पूरी तव्ज्जो दी है। इस गांव को पहले तत्कालीन राज्यमंत्री कृष्ण बेदी ने गोद लिया और उस दौरान ग्राम पंचायत के सहयोग से भरपूर विकास हुआ तो फिर वर्तमान सांसद नायब सिंह सैनी ने इसे गोद लिया। इसके बाद विकास कार्यों की रही कसर भी पूरी हो गई। गांव के लोगों की मानें तो आज गांव हर सुविधा से संपन्न है। गांव सीनियर सेकेंडरी स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी, हर समाज की चौपाल के अलावा अधिकतर गलियां व नालियां तक पक्की है तो गांव शहर जैसी सुविधाओं से युक्त है।
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यहां कभी नहीं देखी राजनीतिक रंजिश : राजकुमार
गांव में ही करियाणा की दुकान चलाने वाले राजकुमार बताते हैं कि यहां अलग-अलग जाति व धर्म के लोग रहते हैं, लेकिन सभी में भाईचारा हमेशा बना रहा है। यहां कभी न जातिगत और न ही धर्म के आधार पर आपसी विवाद हुआ है। न ही कभी राजनीतिक रंजिश देखी गई। लोगों में इस कदर भाईचारा है कि हर कार्यक्रम साझा दिखाई देने लगता है।
चुनाव में झगड़ा होता है, यह पता भी नहीं : छलकू राम
ग्रामीण छलकू राम बताते हैं कि गांव में चुनाव पंच का हो या सरपंच के लिए, ब्लॉक समिति का हो या जिला परिषद का, कभी भी झगड़ा नहीं होता। ऐसे सामान्य हालात रहते हैं, जैसे किसी को पता ही न हो कि चुनाव में झगड़ा भी हो जाता है। कोई चुनाव जीतता भी है तो वह विजयी जुलूस नहीं निकालता। यहां तक कि पता भी नहीं चल पाता कि विजेता रहा उम्मीदवार कब अपने घर चला गया।
इस बार भी पहले की तरह ही होगा चुनाव : दीवान
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ग्रामीण दीवान चंद का कहना है कि भाईचारे की जो मिसाल पहले के चुनावों में देखने को मिली थी, वही इस चुनाव में भी दिखाई देगी। गांव के हर व्यक्ति को यही उम्मीद है और शायद यही कारण है कि चुनाव मैदान में उतरने वाले किसी भी व्यक्ति ने खुलकर प्रचार तक करना शुरू नहीं किया।
पांच प्लान तक राम सिंह रहे सरपंच : शीशराम
ग्रामीण शीशराम बताते हैं कि गांव में भाईचारे की मिसाल इससे बड़ी नहीं हो सकती कि गांववासी रामसिंह ही पांच प्लान तक सर्वसम्मति से सरपंच बनते रहे। इससे पहले और बाद में होने वाले चुनावों में भी कोई आपसी खींचतान नहीं हुई। एक-दूसरे के समर्थक सभी का पूरा सम्मान करते रहे हैं।