{"_id":"6580ae5906311805fa0805b8","slug":"when-the-women-of-assam-decided-to-come-out-of-domestic-life-and-become-self-reliant-the-caravan-kept-joining-kurukshetra-news-c-45-1-kur1002-10462-2023-12-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kurukshetra News: घरेलू जिदंगी से बाहर निकल असम की महिलाओं ने आत्मनिर्भर बनने की ठानी तो जुड़ता गया कारवां","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kurukshetra News: घरेलू जिदंगी से बाहर निकल असम की महिलाओं ने आत्मनिर्भर बनने की ठानी तो जुड़ता गया कारवां
विज्ञापन
कुरुक्षेत्र। अमस पवेलियन में खरीदारी करते पयर्टक। संवाद
कुरुक्षेत्र। घरेलू जिंदगी से बाहर निकल आत्मनिर्भर बनने की ठानी तो हाथों की कारीगरी का हुनर भी खिलकर बाहर आने लगा। खुद का काम खड़ा हुआ तो घर की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होने लगी। देखते ही देखते कारवां बन गया। सफलता की यह कहानी है अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव के स्टेट पार्टनर असम के कामरूप मेट्रोपॉलिटन जिले के कलीतापारा गांव की महिलाओं की, जो आज इस मुकाम पर पहुंच चुकी हैं कि असम सरकार ने भी उन्हें गीता महोत्सव में अपनी कला दिखाने का मौका दिया है। अपनी कला को महिलाएं दिखाने लगी तो आज गांव में ही 10 से ज्यादा स्वयं सहायता समूह भी खड़े हो गए, जिनमें करीब 150 महिलाएं आत्मनिर्भर भारत की बानगी बन चुकी हैं।
ये महिलाएं महोत्सव में गमछे से लेकर लकड़ी व प्लास्टिक पर की गई कारीगरी लेकर पहुंची है। इनके जरिए असम की सभ्यता से लेकर संस्कृति व पर्यटन तक को लोगों के सामने प्रदर्शित कर रही है। यही नहीं असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में मुख्यत: दिखाई देने वाले गैंडा से लेकर अन्य पशुओं तक को अपनी कारीगरी में उतार रहे हैं, जो पवित्र ब्रह्मसरोवर तट पर लगाए असम पवेलियन में पर्यटकों को हैरान कर रही है।
असम से 80 फीसदी महिला शिल्पकार पहुंची
असम की महिलाएं किस स्तर तक आत्मनिर्भर हो चुकी हैं, इसकी बानगी पवेलियन में देखने को मिल रही है। यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ-साथ शिल्पकला को भी बखूबी दर्शाया गया है और इन शिल्पकारों में 80 फीसदी महिलाएं हैं, जिनके चेहरे पर स्टेट पार्टनर के तौर पर यहां पहुंचने और देशभर से आए पर्यटकों द्वारा कला की जमकर सराहना करने पर खुशी की लहर है।
विज्ञापन
सम्मान के साथ कमाने का जरिया भी मिला : अनामिका
शिल्पकार अनामिका दास कलिता व रूपाली कलिता बताती है कि उनके गांव की 150 से ज्यादा महिलाएं आज पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं। यह प्रधानमंत्री द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का ही परिणाम है। हालांकि वे अपने-अपने घरों में सही घरेलू जिंदगी जी रही थी, लेकिन उन्होंने कुछ करने की ठानी तो शिल्पकला को ही माध्यम बना लिया। आज उनके साथ-साथ उक्त सभी महिलाएं खुद के पांवों पर खड़ी हैं। उन्हें न केवल विशेष सम्मान मिला है बल्कि कमाई का जरिया भी मिल गया है। उनके इस जज्बे को असम सरकार ने भी खूब सम्मान दिया है और इसी के चलते उन्हें यहां कुरुक्षेत्र में अपनी कला दिखाने का पहली बार मौका मिला है। यहां के लोग उनकी हर कला को खूब पसंद कर रहे हैं।
केन व बंबू की कला को देख पर्यटक मुरीद
महोत्सव में शिल्पकार अली असम राज्य की प्रसिद्ध केन और बंबू की पारंपरिक शिल्पकला को लेकर पहुंचे हैं। असम के बरपेटा जिले के भालुकी गांव से ग्रीन गोल्ड केन एंड बंबू से बने फूलदान, ट्रे, पेन स्टैंड, इजी चेयर, मूढ़ा, पर्स, बाल्टी, मैगजीन होल्डर, मग जैसी लुभावनी चीजें लेकर प्रदर्शित कर रहे हैं। उनके हुनर को देख स्टॉल पर हर पर्यटक ठहर सा जाता है।
उनके उत्पादों को पर्यटकों की ओर से खूब पसंद किया जा रहा है। वे पिछले 15 सालों से महोत्सव में अपनी कला को प्रदर्शित कर रहे हैं। इसके अलावा चंडीगढ़ के कलाग्राम, दिल्ली के प्रगति मैदान सहित कई जगहों पर अपनी कला का जादू बिखेर चुके हैं।
विज्ञापन
ये महिलाएं महोत्सव में गमछे से लेकर लकड़ी व प्लास्टिक पर की गई कारीगरी लेकर पहुंची है। इनके जरिए असम की सभ्यता से लेकर संस्कृति व पर्यटन तक को लोगों के सामने प्रदर्शित कर रही है। यही नहीं असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में मुख्यत: दिखाई देने वाले गैंडा से लेकर अन्य पशुओं तक को अपनी कारीगरी में उतार रहे हैं, जो पवित्र ब्रह्मसरोवर तट पर लगाए असम पवेलियन में पर्यटकों को हैरान कर रही है।
विज्ञापन
असम से 80 फीसदी महिला शिल्पकार पहुंची
असम की महिलाएं किस स्तर तक आत्मनिर्भर हो चुकी हैं, इसकी बानगी पवेलियन में देखने को मिल रही है। यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ-साथ शिल्पकला को भी बखूबी दर्शाया गया है और इन शिल्पकारों में 80 फीसदी महिलाएं हैं, जिनके चेहरे पर स्टेट पार्टनर के तौर पर यहां पहुंचने और देशभर से आए पर्यटकों द्वारा कला की जमकर सराहना करने पर खुशी की लहर है।
विज्ञापन
सम्मान के साथ कमाने का जरिया भी मिला : अनामिका
शिल्पकार अनामिका दास कलिता व रूपाली कलिता बताती है कि उनके गांव की 150 से ज्यादा महिलाएं आज पूरी तरह से आत्मनिर्भर हैं। यह प्रधानमंत्री द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का ही परिणाम है। हालांकि वे अपने-अपने घरों में सही घरेलू जिंदगी जी रही थी, लेकिन उन्होंने कुछ करने की ठानी तो शिल्पकला को ही माध्यम बना लिया। आज उनके साथ-साथ उक्त सभी महिलाएं खुद के पांवों पर खड़ी हैं। उन्हें न केवल विशेष सम्मान मिला है बल्कि कमाई का जरिया भी मिल गया है। उनके इस जज्बे को असम सरकार ने भी खूब सम्मान दिया है और इसी के चलते उन्हें यहां कुरुक्षेत्र में अपनी कला दिखाने का पहली बार मौका मिला है। यहां के लोग उनकी हर कला को खूब पसंद कर रहे हैं।
केन व बंबू की कला को देख पर्यटक मुरीद
महोत्सव में शिल्पकार अली असम राज्य की प्रसिद्ध केन और बंबू की पारंपरिक शिल्पकला को लेकर पहुंचे हैं। असम के बरपेटा जिले के भालुकी गांव से ग्रीन गोल्ड केन एंड बंबू से बने फूलदान, ट्रे, पेन स्टैंड, इजी चेयर, मूढ़ा, पर्स, बाल्टी, मैगजीन होल्डर, मग जैसी लुभावनी चीजें लेकर प्रदर्शित कर रहे हैं। उनके हुनर को देख स्टॉल पर हर पर्यटक ठहर सा जाता है।
उनके उत्पादों को पर्यटकों की ओर से खूब पसंद किया जा रहा है। वे पिछले 15 सालों से महोत्सव में अपनी कला को प्रदर्शित कर रहे हैं। इसके अलावा चंडीगढ़ के कलाग्राम, दिल्ली के प्रगति मैदान सहित कई जगहों पर अपनी कला का जादू बिखेर चुके हैं।