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Kurukshetra News: मारकंडा पर बांध का इंतजार, मानसून से पहले सताने लगी बाढ़ की आशंका
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कुरुक्षेत्र। मारकंडा दरिया से जलमग्र हुए गांव कठवा की 2025 की तस्वीर।आकाईव
शाहाबाद। मारकंडा से संभावित बाढ़ से बचाव के लिए प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस तैयारी नहीं की गई है। वर्ष 2023 की जुलाई में आई बाढ़ और उसके बाद 2025 में करीब 48 हजार क्यूसेक तक पहुंचे जलस्तर ने शाहाबाद और आसपास के इलाकों में भारी तबाही मचाई थी।
खेत जलमग्न हुए, गांव डूबे और हजारों परिवारों की आजीविका पर गहरा असर पड़ा। अब फरवरी का महीना चल रहा है और जून-जुलाई दूर नहीं, लेकिन कोईद तैयारी नजर नहीं आ रही।
पिछले वर्षों में मारकंडा का जलस्तर खतरे के निशान से काफी ऊपर पहुंच गया था। तंगौर, कठवा, कलसाना, मुगल माजरा, गुमटी, मलिकपुर, अरूप नगर, मदनपुर, मोहनपुर, झरौली, नलवी और झांसा जैसे कई गांव पानी की चपेट में आ गए थे। हालात इतने गंभीर थे कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, सांसद नवीन जिंदल, सांसद दीपेंद्र हुड्डा, अभय सिंह चौटाला और उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला सहित अनेक नेताओं ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। लेकिन पानी उतरते ही हालात जस के तस रह गए। न स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठे और न ही बांध निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ सकी। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर बार बाढ़ के समय राजनीति तेज हो जाती है। सत्ता पक्ष विपक्ष पर जिम्मेदारी डालता है, तो विपक्ष सरकार की नाकामी गिनाता है। जैसे ही पानी उतरता है, बाढ़ का मुद्दा भी बयानबाजी तक सिमट जाता है।
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ग्रामीणों का आरोप है कि मारकंडा का पानी हर साल उनके घरों और खेतों में घुसता है लेकिन नेताओं की सक्रियता केवल दौरों और आश्वासनों तक ही सीमित रह जाती है। मारकंडा दरिया के किनारे बसे तंगौर, कठवा, कलसाना, मुगल माजरा, गुमटी, मलिकपुर, अरूप नगर, मदनपुर और मोहनपुर जैसे गांव हर वर्ष बाढ़ की मार झेलते हैं।
लगातार खतरे के कारण मलिकपुर से कई परिवार पलायन करने को मजबूर हो चुके हैं। ग्रामीणों का साफ कहना है कि इन गांवों को बचाने के लिए आसपास पक्के बांधों का निर्माण बेहद जरूरी है।
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खेत जलमग्न हुए, गांव डूबे और हजारों परिवारों की आजीविका पर गहरा असर पड़ा। अब फरवरी का महीना चल रहा है और जून-जुलाई दूर नहीं, लेकिन कोईद तैयारी नजर नहीं आ रही।
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पिछले वर्षों में मारकंडा का जलस्तर खतरे के निशान से काफी ऊपर पहुंच गया था। तंगौर, कठवा, कलसाना, मुगल माजरा, गुमटी, मलिकपुर, अरूप नगर, मदनपुर, मोहनपुर, झरौली, नलवी और झांसा जैसे कई गांव पानी की चपेट में आ गए थे। हालात इतने गंभीर थे कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी, सांसद नवीन जिंदल, सांसद दीपेंद्र हुड्डा, अभय सिंह चौटाला और उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला सहित अनेक नेताओं ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। लेकिन पानी उतरते ही हालात जस के तस रह गए। न स्थायी समाधान की दिशा में ठोस कदम उठे और न ही बांध निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ सकी। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर बार बाढ़ के समय राजनीति तेज हो जाती है। सत्ता पक्ष विपक्ष पर जिम्मेदारी डालता है, तो विपक्ष सरकार की नाकामी गिनाता है। जैसे ही पानी उतरता है, बाढ़ का मुद्दा भी बयानबाजी तक सिमट जाता है।
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ग्रामीणों का आरोप है कि मारकंडा का पानी हर साल उनके घरों और खेतों में घुसता है लेकिन नेताओं की सक्रियता केवल दौरों और आश्वासनों तक ही सीमित रह जाती है। मारकंडा दरिया के किनारे बसे तंगौर, कठवा, कलसाना, मुगल माजरा, गुमटी, मलिकपुर, अरूप नगर, मदनपुर और मोहनपुर जैसे गांव हर वर्ष बाढ़ की मार झेलते हैं।
लगातार खतरे के कारण मलिकपुर से कई परिवार पलायन करने को मजबूर हो चुके हैं। ग्रामीणों का साफ कहना है कि इन गांवों को बचाने के लिए आसपास पक्के बांधों का निर्माण बेहद जरूरी है।

कुरुक्षेत्र। मारकंडा दरिया से जलमग्र हुए गांव कठवा की 2025 की तस्वीर।आकाईव