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22 साल बाद भी सरकार ने पूरे नहीं किए कारगिल शहीद संजीव के परिवार से किए वादे

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 25 Jul 2021 11:39 PM IST
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The family cherished the memories of the martyr, waiting for the fulfillment of the government promises even after 22 years
कुरुक्षेत्र। शहीद संजीव कुमार की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित करते शहीद के पिता रणजीत सिंह शहीद की मा? - फोटो : Kurukshetra
कारगिल युद्ध (1999) में गांव कौलापुर के संजीव के शहीद होने की खबर जैसे ही उनके पिता रणजीत सिंह को लगी तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। चार बहनों का इकलौता भाई संजीव 19 साल की उम्र में ही वीरगति को प्राप्त हो गया था। रणजीत सिंह उस दिन भादसों मिल (करनाल) में अपने ट्रक में सामान लोड करा रहे थे कि अचानक उनको मिल के कुछ कर्मियों से मालूम हुआ कि कुरुक्षेत्र के एक गांव का बेटा पाकिस्तान से चल रहे कारगिल युद्ध में शहीद हो गया है। जानकारी जुटाने पर पता चला कि शहीद होने वाला कोई और नहीं, बल्कि उनका बेटा संजीव ही था। इसके दो दिन बाद उन्हें सेना की ओर से भी मैसेज भेजा गया। एक ओर जहां बेटे को खोने का गम था, वहीं देश के लिए बेटे के शहीद होने पर गर्व महसूस हो रहा था। उस समय पूरे राजकीय सम्मान के साथ संजीव को अंतिम विदाई दी गई। लेकिन शहीद होने के 22 साल बाद भी प्रशासन व सरकार की ओर से किये गये वादे अधूरे रह गये। संजीव के परिजनों को 22 साल बाद भी सरकारी वादों के पूरा होने का इंतजार है।
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संजीव भारतीय सेना में 8वीं सिख रेजीमेंट के सिपाही थे, जो 1999 कारगिल युद्ध के समय 19 साल के थे। संजीव की शहादत के बाद रणजीत सिंह के घर कुलविंद्र सिंह का जन्म हुआ। कुलविंद्र ने बताया कि प्रशासन की ओर से भाई की याद में कोई कार्यक्रम नहीं किया जाता। संजीव की यादों को सहेजने के लिए पिता ने स्वयं के खर्चे से ही गांव का मुख्य प्रवेश बनाया है। मुख्य द्वार पर शहीद संजीव के चित्र लगाए गए हैं। वहीं गांव में संजीव की प्रतिमा पर हर रविवार को गांव के युवकों के साथ मिलकर साफ सफाई करते हैं। यहां आकर परिजनों को काफी सुकून मिलता है। बहनें बताती हैं कि संजीव सैनिक ही बनना चाहता था। दो बार भारतीय सेना के मापदंड पर खरा न उतरने के बाद भी उसने कभी हिम्मत नहीं हारी। युद्ध से पहले वह छुट्टियां लेकर गांव आया हुआ था। युद्ध की घोषणा होते ही वो अपनी ड्यूटी पर रवाना हो गया था। उसके बाद उनकी शहादत की खबर ही परिवार को मिली थी। संजीव की याद में आज भी छह जुलाई (शहादत के दिन) को परिजन गांव में भंडारे का आयोजन करते हैं। इस दिन परिवार के सभी लोग और शहीद संजीव की बहनें भी कार्यक्रम में पहुंचती हैं।
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प्रदेश सरकार ने की थी कई घोषणाएं
परिजनों के अनुसार कारगिल युद्ध के शहीद संजीव के सम्मान में प्रदेश सरकार ने कई घोषणाएं की थी। उनमें मात्र दो घोषणाएं सरकार ने पूरी की हैं। इनमें पिपली-बाबैन मार्ग का नाम शहीद संजीव मार्ग व गांव में स्थित राजकीय उच्च विद्यालय का नाम शहीद संजीव के नाम पर रखा गया है। गांव में शहीद के नाम पर गेट बनाने, स्कूल का दर्जा बढ़ाने, दो कनाल जमीन पर शहीद के नाम पर पार्क बनाने और कई अन्य घोषणाएं आज भी लंबित हैं। सरकार ने शहीद संजीव की बहन को भी नौकरी देने का वादा किया था मगर 22 साल बाद भी उसे पूरा नहीं किया गया है।
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मामले की कराई जाएगी जांच: मुकुल कुमार
मामले को लेकर डीसी मुकुल कुमार ने बताया कि यह मामला उनकी जानकारी में नहीं है। मामले की जांच कराई जाएगी। उसके बाद ही कार्रवाई होगी।

कुरुक्षेत्र। कारगिल मे शहीद हुए  सिपाही संजीव कुमार की तस्वीर के साथ पिता रणजीत सिंह ,मां पार्वती

कुरुक्षेत्र। कारगिल मे शहीद हुए सिपाही संजीव कुमार की तस्वीर के साथ पिता रणजीत सिंह ,मां पार्वती- फोटो : Kurukshetra

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