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समाज की समस्याओं को प्रस्तुत करता है लेखक
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग, साहित्य परिषद एवं देस हरियाणा पत्रिका की ओर से ‘अपने लेखक से संवाद करें’ कार्यक्रम ऑनलाइन आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया के संपादक एवं लेखक पंकज चतुर्वेदी ने बताया कि एक लेखक की अपने लेखन के माध्यम से अपने समाज और राष्ट्र निर्माण में क्या भूमिका होती है। एक लेखक समाज की विभिन्न समस्याओं और मुद्दों को अपने साहित्य का विषय बनाकर प्रस्तुत करता है, जिसका समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने आज जलवायु-परिवर्तन के कारण पर्यावरण किस तरह से बदल रहा है और हमारे प्राकृतिक स्रोतों को मनुष्य जाने-अनजाने में किस प्रकार से नष्ट कर रहे, उन्हें कैसे बचाया जाए ? सहित अनेक सवाल जो मानव-जाति और जीवन के वर्तमान और भविष्य के पक्षों को प्रभावित करेंगे उन सभी पर प्रकाश डाला। उन्होंने लेखक बनने की प्रक्रिया में विषयों और विधाओं का चयन कैसे करना है और कैसे उनकी अभिव्यक्ति हो सकती है, इसके उदाहरण प्रस्तुत किए। लेखन के उद्देश्य, विवेकशील आलोचनात्मक दृष्टि तथा विरासत के लेखन को आत्मसात करके ही सार्थक लेखन संभव है। कहा कि अपने आसपास के परिवेश को बारीकी देखना व उस परिस्थिति के विभिन्न आयामों से विचार करना लेखन के लिए आवश्यक है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं देस हरियाणा के संपादक डॉ. सुभाष चंद्र ने कहा लेखक व साहित्यकार अपने साहित्य के माध्यम से समाज में व्याप्त अनेक संकीर्णताओं और रूढ़ियों पर प्रहार करता है। हर लेखक को दृष्टि अर्जित करने के संघर्ष से गुजरना होता है। लेखक के योगदान से ही एक अच्छे और स्वच्छ समाज के निर्माण की परिकल्पना की जा सकती है। कार्यक्रम में हिंदी विभाग के शोधार्थी एवं विद्यार्थियों के अलावा डॉ.जसबीर सिंह, बृजपाल, विकास साल्याण, राजकुमार जांगड़ा, डॉ. रविंद्र गासो, राम मोहन राय, अरुण कैहरबा, कवि जयपाल, गौरव आदि ने हिस्सा लिया।
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कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग, साहित्य परिषद एवं देस हरियाणा पत्रिका की ओर से ‘अपने लेखक से संवाद करें’ कार्यक्रम ऑनलाइन आयोजित किया गया। मुख्य वक्ता नेशनल बुक ट्रस्ट ऑफ इंडिया के संपादक एवं लेखक पंकज चतुर्वेदी ने बताया कि एक लेखक की अपने लेखन के माध्यम से अपने समाज और राष्ट्र निर्माण में क्या भूमिका होती है। एक लेखक समाज की विभिन्न समस्याओं और मुद्दों को अपने साहित्य का विषय बनाकर प्रस्तुत करता है, जिसका समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने आज जलवायु-परिवर्तन के कारण पर्यावरण किस तरह से बदल रहा है और हमारे प्राकृतिक स्रोतों को मनुष्य जाने-अनजाने में किस प्रकार से नष्ट कर रहे, उन्हें कैसे बचाया जाए ? सहित अनेक सवाल जो मानव-जाति और जीवन के वर्तमान और भविष्य के पक्षों को प्रभावित करेंगे उन सभी पर प्रकाश डाला। उन्होंने लेखक बनने की प्रक्रिया में विषयों और विधाओं का चयन कैसे करना है और कैसे उनकी अभिव्यक्ति हो सकती है, इसके उदाहरण प्रस्तुत किए। लेखन के उद्देश्य, विवेकशील आलोचनात्मक दृष्टि तथा विरासत के लेखन को आत्मसात करके ही सार्थक लेखन संभव है। कहा कि अपने आसपास के परिवेश को बारीकी देखना व उस परिस्थिति के विभिन्न आयामों से विचार करना लेखन के लिए आवश्यक है।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे हिंदी विभाग के अध्यक्ष एवं देस हरियाणा के संपादक डॉ. सुभाष चंद्र ने कहा लेखक व साहित्यकार अपने साहित्य के माध्यम से समाज में व्याप्त अनेक संकीर्णताओं और रूढ़ियों पर प्रहार करता है। हर लेखक को दृष्टि अर्जित करने के संघर्ष से गुजरना होता है। लेखक के योगदान से ही एक अच्छे और स्वच्छ समाज के निर्माण की परिकल्पना की जा सकती है। कार्यक्रम में हिंदी विभाग के शोधार्थी एवं विद्यार्थियों के अलावा डॉ.जसबीर सिंह, बृजपाल, विकास साल्याण, राजकुमार जांगड़ा, डॉ. रविंद्र गासो, राम मोहन राय, अरुण कैहरबा, कवि जयपाल, गौरव आदि ने हिस्सा लिया।
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