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चाय बेच-बेच कर बेटे को बनाया सरकारी अधिकारी

Sun, 19 Jun 2016 01:10 AM IST
विशेष नाथ गौड़/अमर उजाला, कुरूक्षेत्र
विशेष नाथ गौड़/अमर उजाला, कुरूक्षेत्र Updated Sun, 19 Jun 2016 01:10 AM IST
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Son made tea sold-selling government official, Kurukshetra
अपनी दुकान पर चाय बनाते सोमदत शर्मा - फोटो : Amar Ujala

गरीबी, तंगी, अभाव और दो वक्त की रोटी के साथ ही बच्चों को बेहतर भविष्य देने की चुनौती...। इतना संकट एक साथ किसी व्यक्ति के सामने आ जाए तो ज्यादातर वक्त के सामने हार ही मान ली जाती है, लेकिन कुरुक्षेत्र में एक पिता ऐसा भी है जिसने इन सारे संकटों का हंसते हंसते सामना किया और 15 वर्ष तक 19-19 घंटे काम करके बेटे को सरकारी अधिकारी बनाने का ख्वाब पूरा किया।

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जी हां, बच्चों की जिंदगी संवारने के लिए एक पिता ने ऐसा ही किया, चाय की दुकान चलाते हुए खुद अभावों में रहते हुए बेटे और बेटी को आला तालीम दिलाई। मेहनत रंग भी लाई और बेटा आज पंजाब की सरकारी पेपर मिल में एसडीओ है। बेटी भी उच्च शिक्षा हासिल कर अपने पैरों पर खड़ी है।
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ब्रह्मसरोवर के मेन गेट के सामने गणपति कनफेक्शनरी नाम की दुकान है। इस दुकान के मालिक का नाम है सोमदत्त शर्मा। पिछले 15 वर्ष से वह इस दुकान को चला रहे हैं। यानी लोगों को चाय बेचकर उनकी थकान तो उतार ही रहे हैं, खुद के ख्वाबों को ताबीर के आसमानों तक परवाज देने में कामयाब हुए हैं। वह कहते हैं जिंदगी में कई संकट आए।
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अभावों के बीच परिवार को पालना, सारी जरूरतों के बीच बच्चों को अच्छी तालीम देना कोई आसान काम नहीं था। लेकिन जिद थी कि बच्चों को सरकारी नौकरी में अच्छे मुकाम तक पहुंचाना है। बच्चों ने भी इस ख्वाब को अपनी आंखों में बसाया और अभावों के बीच भी कड़ी मेहनत की। सोमदत्त कहते हैं मैं रोज सुबह 4 बजे चाय की दुकान खोल देता था। देर रात तक लोगों को चाय बेचता, अपने लिए कोई शौक नहीं पाला, क्योंकि जरूरत परिवार को अच्छी स्थिति में लाने की थी।

हर पल था संघर्ष का साया
सोमदत्त शर्मा ने बताया कि सन् 2000 में चाय की दुकान खोली थी। शुरूआत में काफी कठिनाई का दौर आया। समय और संघर्ष के साथ जीवन चलता गया। यह वहीं दौर था जब बच्चों को पढ़ाना भी था और उन्हें कुछ बनाने का ख्वाब भी बुनना था। बस इसके बाद मेहनत, लगन व ईमानदारी से काम किया और आज मेरे बच्चे उस मुकाम तक पहुंच चुके हैं। मेरा संघर्ष कामयाब हुआ। बेटा अशोक शर्मा एसडीओ बन गया और बेटी संध्या ने भी फर्क से सिर ऊंचा कर दिया जब वह पंचकुला में फार्मासिस्ट बन गई।

पहले 19 अब 16 घंटे दुकान पर काम
सोमदत्त शर्मा ने बताया 15 साल पहले जब दुकान शुरू की थी तब लगातार 19 से 20 घंटे काम करता था। अब जब उम्र ने अपना असर दिखाना शुरू किया तो काम का समय भी कम कर दिया। लेकिन अभी भी कम से कम 16 घंटे तो काम करता ही हूं।

सबसे बड़ा कठिन दौर में रहा एडमिशन
सोमदत्त शर्मा ने बताया कि यूं तो हम प्रतिदिन जीवन के कठिन दौरों से गुजरते रहते हैं, लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा व कठिन दौर उस समय आया जब उनके बेटे अशोक शर्मा का एडमिशन कैमिकल इंजीनियररिंग में हो रहा था। 2004 था वो, प्रवेश के लिए करीब एक लाख 20 हजार रुपये एक मुश्त फीस जमा करानी थी।

यह फीस जमा करने के लिए एक निश्चित समयसीमा थी। एक अदद चाय की दुकान के दम पर इतनी बड़ी रकम जुटाना किसी पहाड़ को काटने जैसा ही था, लेकिन सवाल बेटे के भविष्य का था और अपने ख्वाब को पूरा करने का वक्त था, इस चुनौती को सिरमाथे लिया। नतीजा यह रहा कि तय समय में बेटे की फीस जमा हो गई और उसे प्रवेश मिल गया।



बेटा कहता है कुछ और काम कर लो
सोमदत्त ने बताया कि अब जब बेटा एक अच्छे मुकाम पर पहुंच गया है तो अब वह मुझे आराम करने के लिए कहता है। नहीं मानने पर चाय की दुकान बंद करके कोई दूसरा काम करने की सलाह देता है। वह कहता है आपके लिए कुछ नया व आरामदायक काम खुलवा देते हैं। लेकिन मैं कहता हूं इसी दुकान में मेहनत करके ही परिवार को बांध के रखा है। जीवन की कठिनाईयों को आराम से पार किया है।

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