{"_id":"6ac95b6cc88bd0cf2002c419","slug":"shukla-ravivariya-maha-saptami-festival-to-be-celebrated-at-kamyakeshwar-tirtha-on-the-18th-preparations-underway-kurukshetra-news-c-45-1-kur1009-162416-2026-10-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"Kurukshetra News: काम्यकेश्वर तीर्थ पर 18 को मनेगा शुक्ल रविवारीय महा सप्तमी पर्व, तैयारी शुरू","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Kurukshetra News: काम्यकेश्वर तीर्थ पर 18 को मनेगा शुक्ल रविवारीय महा सप्तमी पर्व, तैयारी शुरू
विज्ञापन
कुरुक्षेत्र। कमोदा स्थित काम्यकेश्वर तीर्थ पर 18 अक्तूबर को आश्विन मास की शुक्ल रविवारीय महा सप्तमी पर्व मनाया जाएगा। इस मेले की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। तीर्थ के घाटों की साफ-सफाई, मंदिर की रंगाई-पुताई और रंगीन रोशनी से सजावट की जा रही है। हवन के साथ मेले और भंडारे का शुभारंभ होगा। ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी हवन में पूर्णाहुति डालेंगे।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महा सप्तमी पर तीर्थ स्नान, दान और पूजा-अर्चना से दीर्घायु एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है। इससे मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। नवरात्र के अवसर पर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में मां कालरात्रि की पूजा का विधान बताया गया है। इसे पुत्र सप्तमी भी कहते हैं, इस दिन व्रत रखने से संतान सुख मिलता है। श्रद्धालु इस अवसर पर भगवान शिव और मां दुर्गा की आराधना कर परिवार की सुख-समृद्धि एवं कल्याण की कामना करते हैं। काम्यकेश्वर तीर्थ और महादेव मंदिर को पांडवों ने अपनी तपोस्थली बनाया था। वनवास के दौरान यह स्थान उनकी तपस्या का केंद्र रहा। भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को इस स्थान का महत्व बताया था। पांडवों की तपोस्थली मान्यता है कि यहां 12 वर्षों तक चलने वाले यज्ञ में नैमिषारण्य से लाखों ब्राह्मण आए थे। इस दौरान यह स्थान यज्ञ-स्थली और तपोभूमि के रूप में महत्वपूर्ण हो गया। पांडवों ने इस तीर्थ को अपनी तपोस्थली बनाया था। यह स्थान उनके वनवास के दौरान तपस्या का केंद्र रहा।
भगवान श्रीकृष्ण ने दिया धर्म का उपदेश ग्रामीण सुमिंद्र शास्त्री बताते हैं कि इस तीर्थ की अहम मान्यता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ इस पावन धरा पर तीन बार धर्म का उपदेश दिया था। उन्होंने पांडवों को सांत्वना दी और द्रौपदी को दुर्वासा ऋषि के श्राप से बचाया था। जयद्रथ द्वारा द्रौपदी के हरण के प्रयास के बाद भी श्रीकृष्ण ने उन्हें सांत्वना दी। ऋषि दुर्वासा ने द्रौपदी की परीक्षा के लिए यहीं भोजन मांगा था, जिसकी व्यवस्था द्रौपदी ने सूर्यदेव से प्राप्त अक्षय पात्र से की थी।
विज्ञापन
विज्ञापन
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महा सप्तमी पर तीर्थ स्नान, दान और पूजा-अर्चना से दीर्घायु एवं आरोग्य की प्राप्ति होती है। इससे मनोकामनाएं भी पूर्ण होती हैं। नवरात्र के अवसर पर पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में मां कालरात्रि की पूजा का विधान बताया गया है। इसे पुत्र सप्तमी भी कहते हैं, इस दिन व्रत रखने से संतान सुख मिलता है। श्रद्धालु इस अवसर पर भगवान शिव और मां दुर्गा की आराधना कर परिवार की सुख-समृद्धि एवं कल्याण की कामना करते हैं। काम्यकेश्वर तीर्थ और महादेव मंदिर को पांडवों ने अपनी तपोस्थली बनाया था। वनवास के दौरान यह स्थान उनकी तपस्या का केंद्र रहा। भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को इस स्थान का महत्व बताया था। पांडवों की तपोस्थली मान्यता है कि यहां 12 वर्षों तक चलने वाले यज्ञ में नैमिषारण्य से लाखों ब्राह्मण आए थे। इस दौरान यह स्थान यज्ञ-स्थली और तपोभूमि के रूप में महत्वपूर्ण हो गया। पांडवों ने इस तीर्थ को अपनी तपोस्थली बनाया था। यह स्थान उनके वनवास के दौरान तपस्या का केंद्र रहा।
विज्ञापन
भगवान श्रीकृष्ण ने दिया धर्म का उपदेश ग्रामीण सुमिंद्र शास्त्री बताते हैं कि इस तीर्थ की अहम मान्यता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा के साथ इस पावन धरा पर तीन बार धर्म का उपदेश दिया था। उन्होंने पांडवों को सांत्वना दी और द्रौपदी को दुर्वासा ऋषि के श्राप से बचाया था। जयद्रथ द्वारा द्रौपदी के हरण के प्रयास के बाद भी श्रीकृष्ण ने उन्हें सांत्वना दी। ऋषि दुर्वासा ने द्रौपदी की परीक्षा के लिए यहीं भोजन मांगा था, जिसकी व्यवस्था द्रौपदी ने सूर्यदेव से प्राप्त अक्षय पात्र से की थी।
विज्ञापन