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सैकड़ों महिलाओं को दिलाया इंसाफ
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अधिवक्ता सुदेश कुमारी।
- फोटो : Kurukshetra
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। लोगों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने वाली अधिवक्ता सुदेश कुमारी अब तक सैकड़ों महिलाओं को न्याय दिला चुकी है। जहां किसी के अधिकारों के हनन की बात आती है तो वह पीड़ित को इंसाफ दिलाने दिनरात एक करके संघर्ष में जुट जाती हैं। इस संघर्ष के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें कई दिनों के लिए अपना घर तक छोड़ना पड़ा, लेकिन बावजूद इसके उनके मन में कभी पीछे हटने का ख्याल नहीं आया।
आज भी जहां किसी से साथ अन्याय हो रहा होता है तो सुदेश कुमारी इंसाफ दिलाने के लिए पहुंच जाती हैं। जिला प्रशासन से लेकर सरकार और हाईकोर्ट तक पीड़ित की आवाज पहुंचाने कोई कसर नहीं छोड़ती हैं। अधिवक्ता व जन संघर्ष मंच की प्रदेश महासचिव सुदेश कुमारी का कहना है कि समाज में महिलाओं, अशिक्षित व बुजुर्गों को हर कोई दबाने का प्रयास करता है। वहीं देश के संविधान में सभी के लिए समानता का अधिकार निहित है।
सुदेश कुमारी ने सन 1987 में अपने गांव से लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए संघर्ष शुरू किया था। उस समय वह कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में वकालत की पढ़ाई कर रही थीं। उन्हीं दिनों उनके गांव भौर सैयदा में शराब पीने से कई लोगों की जान चली गई थी। उनके परिजनों को इंसाफ दिलाने के लिए उन्होंने पहली बार ग्रामीणों को एकत्रित करके प्रशासन व सरकार के खिलाफ इंसाफ की आवाज बुलंद की। उसके बाद से उनका सफर निरंतर जारी है। वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब तक बहुत से लोगों को इंसाफ भी दिला चुकी हैं।
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एक समय ऐसा भी आया जब छोड़ना पड़ा घर
सुदेश कुमारी ने बताया कि 1988 में जुरासी खुर्द के दो युवकों को आतंकवादी घोषित करके उनका एनकाउंटर कर दिया गया था। पता चला कि दोनों युवक बेकसूर थे, जिन्हें इंसाफ दिलाने के लिए की लड़ाई भी उन्होंने लड़ी। उनकी आवाज दबाने के लिए पुलिस उनके पिता को घर से उठाकर थाने ले गई। उस समय उनका आंदोलन तत्कालीन एसपी के खिलाफ चला था। पुलिस की ओर से बार-बार परिजनों को परेशान किया जाने लगा, जिस वजह से उन्होंने अपना घर छोड़कर बाहर रहने का फैसला किया और कई दिनों तक वह अपने संगठन की सदस्य चंद्ररेखा के साथ रहीं।
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कुरुक्षेत्र। लोगों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने वाली अधिवक्ता सुदेश कुमारी अब तक सैकड़ों महिलाओं को न्याय दिला चुकी है। जहां किसी के अधिकारों के हनन की बात आती है तो वह पीड़ित को इंसाफ दिलाने दिनरात एक करके संघर्ष में जुट जाती हैं। इस संघर्ष के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें कई दिनों के लिए अपना घर तक छोड़ना पड़ा, लेकिन बावजूद इसके उनके मन में कभी पीछे हटने का ख्याल नहीं आया।
आज भी जहां किसी से साथ अन्याय हो रहा होता है तो सुदेश कुमारी इंसाफ दिलाने के लिए पहुंच जाती हैं। जिला प्रशासन से लेकर सरकार और हाईकोर्ट तक पीड़ित की आवाज पहुंचाने कोई कसर नहीं छोड़ती हैं। अधिवक्ता व जन संघर्ष मंच की प्रदेश महासचिव सुदेश कुमारी का कहना है कि समाज में महिलाओं, अशिक्षित व बुजुर्गों को हर कोई दबाने का प्रयास करता है। वहीं देश के संविधान में सभी के लिए समानता का अधिकार निहित है।
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सुदेश कुमारी ने सन 1987 में अपने गांव से लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए संघर्ष शुरू किया था। उस समय वह कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में वकालत की पढ़ाई कर रही थीं। उन्हीं दिनों उनके गांव भौर सैयदा में शराब पीने से कई लोगों की जान चली गई थी। उनके परिजनों को इंसाफ दिलाने के लिए उन्होंने पहली बार ग्रामीणों को एकत्रित करके प्रशासन व सरकार के खिलाफ इंसाफ की आवाज बुलंद की। उसके बाद से उनका सफर निरंतर जारी है। वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद अब तक बहुत से लोगों को इंसाफ भी दिला चुकी हैं।
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एक समय ऐसा भी आया जब छोड़ना पड़ा घर
सुदेश कुमारी ने बताया कि 1988 में जुरासी खुर्द के दो युवकों को आतंकवादी घोषित करके उनका एनकाउंटर कर दिया गया था। पता चला कि दोनों युवक बेकसूर थे, जिन्हें इंसाफ दिलाने के लिए की लड़ाई भी उन्होंने लड़ी। उनकी आवाज दबाने के लिए पुलिस उनके पिता को घर से उठाकर थाने ले गई। उस समय उनका आंदोलन तत्कालीन एसपी के खिलाफ चला था। पुलिस की ओर से बार-बार परिजनों को परेशान किया जाने लगा, जिस वजह से उन्होंने अपना घर छोड़कर बाहर रहने का फैसला किया और कई दिनों तक वह अपने संगठन की सदस्य चंद्ररेखा के साथ रहीं।