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बिना पिंडदान कराए लौटे श्रद्धालुओं ने जताया रोष
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वटसावित्री व्रत अमावस पर सरस्वती तीर्थ से बाहर चोरी छिपे पिंडदान कराने का जमकर खेल चला। इसके एवज में पंडितों ने श्रद्धालुुओं की मजबूरी का फायदा उठाकर उनका शोषण भी किया। शुक्रवार को वटसावित्री व्रत अमावस पर ब्रह्मसरोवर, सन्निहित सरोवर व पिहोवा के सरस्वती तीर्थ पर पहुंचे श्रद्धालुओं को तीर्थ पर पिंडदान व स्नान से वंचित रहने पर निराशा का सामना करना पड़ा।
अल सुबह ही सरस्वती तीर्थ पर श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था। तीर्थ पर पुरोहितों की दुकानें बंद पाकर श्रद्धालुओं ने इधर-उधर दौड़ लगानी शुरू कर दी लेकिन कहीं बात न बनती देख अधिकतर श्रद्धालु बगैैर पिंडदान व पूजा अर्चना के ही वापस अपने गंतव्य स्थान को लौट गए। दिन के समय कुछ पुरोहित जब तीर्थ पर पहुंचे थे तो उनको देखकर श्रद्धालुओं ने उनसे पिंडदान, कर्मकांड व तर्पण कराने की गुुहार लगाई। उन्होंने प्रशासन के आदेशों पर दुहाई देकर उन्होंने अपनी मजबूरी बताकर उनको वापस भेज दिया। मालूम हो अमावस की पूर्व संध्या पर ही जिला प्रशासन ने तीर्थ स्थान पर पिंडदान व स्नान पर प्रतिबंध लगाने के आदेश पारित किए थे ताकि तीर्थों पर भीड़ एकत्रित न हो पाए। प्रशासन ने पुरोहितों को भी अमावस पर अपने प्रतिष्ठान बंद रखने के आदेश दिए थे। इसका असर भी तीर्थों पर देखने को मिला। पूरा दिन तीर्थ पुरोहितों की दुकानें बंद ही रही। फिर भी प्रशासन की ओर से तीर्थों व इसके आसपास भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। सरस्वती तीर्थ पर सुबह चार बजे ही पुलिस कर्मचारियों ने मोर्चा संभाल लिया था जिस कारण पुरोहितों ने तीर्थ से दूरी बनाई रखी और तीर्थ पर पिंडदान, कर्मकांड व तर्पण का कार्य पूरी तरह से बंद रहा। बता दे कोरोना महामारी को देखते हुए प्रशासन ने तीर्थ पर पिंडदान, स्नान व पूजा अर्चना पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके साथ ही इस साल तीन दिवसीय विश्व प्रसिद्ध चैत्र चौदस मेले पर भी रोक लगा दी गई थी। करीब दो महीने के बाद पिछले सप्ताह ही तीर्थ पुरोहित की मांग को देखते हुए उनको सशर्त पिंडदान की इजाजत दी गई थी। चौदस पर तीर्थ पर श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने अमावस पर तीर्थ पर पिंडदान व स्नान पर प्रतिबंध लगा दिया।
पिंडदान कराने के एवज में मांगे साढ़े पांच हजार
पुलिस की मौजूदगी के कारण सरस्वती तीर्थ पर पिंडदान व कर्मकांड पर पूर्ण रूप से बंद रहा लेकिन कुछ पंडितों ने प्रशासन की नजर से चोरी छिपे श्रद्घालुओं से अन्य स्थानों पर पिंडदान का कार्य पूर्ण कराया। यमुनानगर से आए श्रद्धालु राकेश बजाज ने बताया कि वह अपने दोस्त शम्मी के साथ अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान कराने आया था। यहां आने पर उनको जानकारी मिली कि तीर्थ पर पिंडदान कराने पर प्रतिबंध है। ऐसे में उनसे एक पंडित से अपने किसी गुप्त स्थान पर पिंडदान कराने की योजना बताई। इसके ऐवज में उसने उनसे साढ़े पांच हजार रुपये की मांग की, लेकिन संतुष्ट न होने पर उन्होंने बगैर पिंडदान वापस जाना मुनासिब समझा।
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श्रद्धालुओं ने जताया रोष
तीर्थ पर पिंडदान न होने से कई श्रद्घालुओं ने प्रशासन के खिलाफ रोष व्यक्त किया। श्रद्धालुओं ने बताया कि प्रशासन ने एक दिन पहले ही तीर्थ पर पिंडदान व स्नान पर प्रतिबंध लगाकर उनके साथ खिलवाड़ किया है। प्रशासन को समय रहते ही ऐसी सूचना व जानकारी सभी स्थानों तक पहुंचानी चाहिए थी लेकिन प्रशासन की लापरवाही के चलते उनको बगैर पिंडदान व स्नान के वापिस लौटना पड़ा, जिससे उनको आर्थिक हानि भी हुई है। इसके अलावा प्रशासन को तीर्थ पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए कम से कम पिंडदान की व्यवस्था जरूर करनी चाहिए थी।
सुहागिनों ने पति की लंबी उम्र के लिए रखा व्रत
वटसावित्री व्रत अमावस पर सुहागिनों ने व्रत रखकर अपने पति की लंबी उम्र की कामना की। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अवावस को किया जाता है क्योंकि इस दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण वापिस मांग लिए थे। अपने पति की प्राण रक्षा के लिए सावित्री ने वट (बड़) वृक्ष के नीचे बैठकर त्रयोदशी से अमावस्या तक तपस्या की थी इसलिए इस व्रत को वट सावित्री व्रत कहा जाता है। पति की दीर्घायु की कामना के लिए सुहागिनें अन्न व जल को त्याग कर सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत को पूरा करती है।
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अल सुबह ही सरस्वती तीर्थ पर श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था। तीर्थ पर पुरोहितों की दुकानें बंद पाकर श्रद्धालुओं ने इधर-उधर दौड़ लगानी शुरू कर दी लेकिन कहीं बात न बनती देख अधिकतर श्रद्धालु बगैैर पिंडदान व पूजा अर्चना के ही वापस अपने गंतव्य स्थान को लौट गए। दिन के समय कुछ पुरोहित जब तीर्थ पर पहुंचे थे तो उनको देखकर श्रद्धालुओं ने उनसे पिंडदान, कर्मकांड व तर्पण कराने की गुुहार लगाई। उन्होंने प्रशासन के आदेशों पर दुहाई देकर उन्होंने अपनी मजबूरी बताकर उनको वापस भेज दिया। मालूम हो अमावस की पूर्व संध्या पर ही जिला प्रशासन ने तीर्थ स्थान पर पिंडदान व स्नान पर प्रतिबंध लगाने के आदेश पारित किए थे ताकि तीर्थों पर भीड़ एकत्रित न हो पाए। प्रशासन ने पुरोहितों को भी अमावस पर अपने प्रतिष्ठान बंद रखने के आदेश दिए थे। इसका असर भी तीर्थों पर देखने को मिला। पूरा दिन तीर्थ पुरोहितों की दुकानें बंद ही रही। फिर भी प्रशासन की ओर से तीर्थों व इसके आसपास भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। सरस्वती तीर्थ पर सुबह चार बजे ही पुलिस कर्मचारियों ने मोर्चा संभाल लिया था जिस कारण पुरोहितों ने तीर्थ से दूरी बनाई रखी और तीर्थ पर पिंडदान, कर्मकांड व तर्पण का कार्य पूरी तरह से बंद रहा। बता दे कोरोना महामारी को देखते हुए प्रशासन ने तीर्थ पर पिंडदान, स्नान व पूजा अर्चना पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके साथ ही इस साल तीन दिवसीय विश्व प्रसिद्ध चैत्र चौदस मेले पर भी रोक लगा दी गई थी। करीब दो महीने के बाद पिछले सप्ताह ही तीर्थ पुरोहित की मांग को देखते हुए उनको सशर्त पिंडदान की इजाजत दी गई थी। चौदस पर तीर्थ पर श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने अमावस पर तीर्थ पर पिंडदान व स्नान पर प्रतिबंध लगा दिया।
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पिंडदान कराने के एवज में मांगे साढ़े पांच हजार
पुलिस की मौजूदगी के कारण सरस्वती तीर्थ पर पिंडदान व कर्मकांड पर पूर्ण रूप से बंद रहा लेकिन कुछ पंडितों ने प्रशासन की नजर से चोरी छिपे श्रद्घालुओं से अन्य स्थानों पर पिंडदान का कार्य पूर्ण कराया। यमुनानगर से आए श्रद्धालु राकेश बजाज ने बताया कि वह अपने दोस्त शम्मी के साथ अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान कराने आया था। यहां आने पर उनको जानकारी मिली कि तीर्थ पर पिंडदान कराने पर प्रतिबंध है। ऐसे में उनसे एक पंडित से अपने किसी गुप्त स्थान पर पिंडदान कराने की योजना बताई। इसके ऐवज में उसने उनसे साढ़े पांच हजार रुपये की मांग की, लेकिन संतुष्ट न होने पर उन्होंने बगैर पिंडदान वापस जाना मुनासिब समझा।
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श्रद्धालुओं ने जताया रोष
तीर्थ पर पिंडदान न होने से कई श्रद्घालुओं ने प्रशासन के खिलाफ रोष व्यक्त किया। श्रद्धालुओं ने बताया कि प्रशासन ने एक दिन पहले ही तीर्थ पर पिंडदान व स्नान पर प्रतिबंध लगाकर उनके साथ खिलवाड़ किया है। प्रशासन को समय रहते ही ऐसी सूचना व जानकारी सभी स्थानों तक पहुंचानी चाहिए थी लेकिन प्रशासन की लापरवाही के चलते उनको बगैर पिंडदान व स्नान के वापिस लौटना पड़ा, जिससे उनको आर्थिक हानि भी हुई है। इसके अलावा प्रशासन को तीर्थ पर पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए कम से कम पिंडदान की व्यवस्था जरूर करनी चाहिए थी।
सुहागिनों ने पति की लंबी उम्र के लिए रखा व्रत
वटसावित्री व्रत अमावस पर सुहागिनों ने व्रत रखकर अपने पति की लंबी उम्र की कामना की। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अवावस को किया जाता है क्योंकि इस दिन सावित्री ने यमराज से अपने पति के प्राण वापिस मांग लिए थे। अपने पति की प्राण रक्षा के लिए सावित्री ने वट (बड़) वृक्ष के नीचे बैठकर त्रयोदशी से अमावस्या तक तपस्या की थी इसलिए इस व्रत को वट सावित्री व्रत कहा जाता है। पति की दीर्घायु की कामना के लिए सुहागिनें अन्न व जल को त्याग कर सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत को पूरा करती है।