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अनेक लोगों को बिना मुकदमे ही लटकाया फंदे पर
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कड़े संघर्ष के बाद भारत देश को 15 अगस्त 1947 को मिली आजादी का बीज तब से करीब 90 साल पहले बोया गया था। 1857 में प्रथम स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे ने जब गाय की चर्बी से बने कारतूस का इस्तेमाल करने से मना कर दिया था तो 10 मई, 1857 को स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी फूटी थी। इस भड़की हुई चिंगारी ने ज्वाला बनकर थानेसर को भी अपने आगोश में ले लिया था। क्रांति में थानेसर के 135 बागी शहीद हुए थे और 62 विद्रोहियों को ब्रिटिश हुकुमत ने लुटेरे कहकर मार डाला था। वहीं अनेक लोगों को बिना मुकदमा चलाए सरेआम फांसी पर लटका दिया गया।
राजकीय पीजी कॉलेज, अंबाला कैंट के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अतुल यादव बताते हैं कि अंबाला व दिल्ली के बीच जीटी रोड पर अनेक देशभक्तों के पंजर पेड़ों पर लटके रहते थे। अंग्रेजों के लिए पंजाब को दिल्ली से जोड़ने वाले शेरशाह सूरी मार्ग (वर्तमान नाम एनएच-44) का विशेष महत्व था, क्योंकि यही मार्ग था जो पंजाब और दिल्ली के क्रांतिकारियों को जोड़ सकता था। इस मार्ग पर पिपली प्रमुख केंद्र था, क्योंकि यहां पर खजाना ट्रेजड़ी भी थी। 12 मई 1857 को थानेसर में विद्रोह की ज्वाला फूट पड़ी। विद्रोह करने वाले अधिकतर लगान न देने वाले थे। यह विद्रोह पूरी तरह लगान न देने वाले वर्सेज कंपनी सरकार के बीच था। यहां हुए विद्रोह को दबाने में उपायुक्त मेकलीन के असफल रहने पर वह अपना बचाव करते हुए अंबाला भाग गया था। थानेसर के साथ-साथ शाहाबाद, कैथल, कौल, पूंडरी व फतेहपुर आदि क्षेत्रों में भी क्रांति फैल गई।
1857 की क्रांति के दौरान थानेसर 2336 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ था, जिसकी जनसंख्या 4,96,750 थी। इस जनसंख्या में से 52 प्रतिशत हिंदू शामिल थे, 38 प्रतिशत मुसलमान और 08 प्रतिशत सिख अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ थे। क्रांति में देसी सेना बगावत नहीं कर पाई थी, लेकिन तब नंबरदारों और चौधरियों ने उसकी कमान संभाली थी। इन सभी में कोई एक नेता नहीं था।
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विद्रोह के आरंभ होते ही अंग्रेजों ने हथियारों की खोजबीन शुरू कर दी। अंग्रेज अधिकारी लेविस ने शाहाबाद और लेफ्टिनेंट पारमन ने थानेसर के साथ लगते क्षेत्र व कैथल में सर्च ऑपरेशन चलाया। एक वर्ष के अंत तक यहां से करीब सात हजार हथियार बरामद हुए। खोजबीन के दौरान अंग्रेज अधिकारियों ने सेना के लिए प्रयोग में लाने हेतु थानेसर व जगाधरी से 02 लाख 35 हजार रुपये भी एकत्रित किए थे।
डॉ. अतुल यादव ने बताया कि अंग्रेजों ने पंजाब के अपने स्वामित्व राजाओं व पटियाला, जींद, कुंजपुरा, करनाल आदी से मदद ली, जिस पर पटियाला के राजा ने 1500 सैनिक व 04 तोपें 15 मई को मदद के लिए दी और 16 मई को वापस ले ली, क्योंकि तब वहां पर भी विद्रोह भड़क चुका था। 17 मई को जींद के राजा ने 400 सैनिकों की मदद दी। कुंजपुरा के राजा ने 350 और करनाल के राजा ने 150 सैनिक दिए। कुंजपुरा के नवाब ने सैनिकों को 20 मई को पिहोवा की सड़क की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया।
ब्रिटिश सरकार की विशेष सावधानी के बावजूद भी यमुना के किनारे पर बसे गुर्जरों ने कौल, पिपली व अमीन के रोडों ने कुरुक्षेत्र के सैनिकों व लाडवा के सिखों व अन्य जातियों के लोगों ने अंग्रेज सरकार व इसके प्रतिबिंब को समूल नष्ट कर दिया। विद्रोहियों/क्रांतिकारियों का कोई नेता नहीं था। यह अलग-अलग स्थानों पर खुद ही लड़ रहे थे। दुकानों को बंद कर दिया गया, जो दुकान खोलता उससे जुर्माना वसूल कर क्रांति में लगाया जाता। जाति के आधार पर भी संगठन बन गए थे तथा वे अपनी जातियों के नारे लगाकर लोगों को एकत्रित करते थे। सरकार के कार्यालयों-तहसील व थानों को जलाने की घटनाएं भी हुई। थानेसर में में धार्मिक स्थानों को भी हिंदू, मुस्लिम व सिखों ने क्रांति के लिए प्रयोग किया।
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राजकीय पीजी कॉलेज, अंबाला कैंट के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अतुल यादव बताते हैं कि अंबाला व दिल्ली के बीच जीटी रोड पर अनेक देशभक्तों के पंजर पेड़ों पर लटके रहते थे। अंग्रेजों के लिए पंजाब को दिल्ली से जोड़ने वाले शेरशाह सूरी मार्ग (वर्तमान नाम एनएच-44) का विशेष महत्व था, क्योंकि यही मार्ग था जो पंजाब और दिल्ली के क्रांतिकारियों को जोड़ सकता था। इस मार्ग पर पिपली प्रमुख केंद्र था, क्योंकि यहां पर खजाना ट्रेजड़ी भी थी। 12 मई 1857 को थानेसर में विद्रोह की ज्वाला फूट पड़ी। विद्रोह करने वाले अधिकतर लगान न देने वाले थे। यह विद्रोह पूरी तरह लगान न देने वाले वर्सेज कंपनी सरकार के बीच था। यहां हुए विद्रोह को दबाने में उपायुक्त मेकलीन के असफल रहने पर वह अपना बचाव करते हुए अंबाला भाग गया था। थानेसर के साथ-साथ शाहाबाद, कैथल, कौल, पूंडरी व फतेहपुर आदि क्षेत्रों में भी क्रांति फैल गई।
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1857 की क्रांति के दौरान थानेसर 2336 स्क्वायर किलोमीटर में फैला हुआ था, जिसकी जनसंख्या 4,96,750 थी। इस जनसंख्या में से 52 प्रतिशत हिंदू शामिल थे, 38 प्रतिशत मुसलमान और 08 प्रतिशत सिख अंग्रेजों की नीतियों के खिलाफ थे। क्रांति में देसी सेना बगावत नहीं कर पाई थी, लेकिन तब नंबरदारों और चौधरियों ने उसकी कमान संभाली थी। इन सभी में कोई एक नेता नहीं था।
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विद्रोह के आरंभ होते ही अंग्रेजों ने हथियारों की खोजबीन शुरू कर दी। अंग्रेज अधिकारी लेविस ने शाहाबाद और लेफ्टिनेंट पारमन ने थानेसर के साथ लगते क्षेत्र व कैथल में सर्च ऑपरेशन चलाया। एक वर्ष के अंत तक यहां से करीब सात हजार हथियार बरामद हुए। खोजबीन के दौरान अंग्रेज अधिकारियों ने सेना के लिए प्रयोग में लाने हेतु थानेसर व जगाधरी से 02 लाख 35 हजार रुपये भी एकत्रित किए थे।
डॉ. अतुल यादव ने बताया कि अंग्रेजों ने पंजाब के अपने स्वामित्व राजाओं व पटियाला, जींद, कुंजपुरा, करनाल आदी से मदद ली, जिस पर पटियाला के राजा ने 1500 सैनिक व 04 तोपें 15 मई को मदद के लिए दी और 16 मई को वापस ले ली, क्योंकि तब वहां पर भी विद्रोह भड़क चुका था। 17 मई को जींद के राजा ने 400 सैनिकों की मदद दी। कुंजपुरा के राजा ने 350 और करनाल के राजा ने 150 सैनिक दिए। कुंजपुरा के नवाब ने सैनिकों को 20 मई को पिहोवा की सड़क की सुरक्षा के लिए नियुक्त किया।
ब्रिटिश सरकार की विशेष सावधानी के बावजूद भी यमुना के किनारे पर बसे गुर्जरों ने कौल, पिपली व अमीन के रोडों ने कुरुक्षेत्र के सैनिकों व लाडवा के सिखों व अन्य जातियों के लोगों ने अंग्रेज सरकार व इसके प्रतिबिंब को समूल नष्ट कर दिया। विद्रोहियों/क्रांतिकारियों का कोई नेता नहीं था। यह अलग-अलग स्थानों पर खुद ही लड़ रहे थे। दुकानों को बंद कर दिया गया, जो दुकान खोलता उससे जुर्माना वसूल कर क्रांति में लगाया जाता। जाति के आधार पर भी संगठन बन गए थे तथा वे अपनी जातियों के नारे लगाकर लोगों को एकत्रित करते थे। सरकार के कार्यालयों-तहसील व थानों को जलाने की घटनाएं भी हुई। थानेसर में में धार्मिक स्थानों को भी हिंदू, मुस्लिम व सिखों ने क्रांति के लिए प्रयोग किया।