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सरकारी रवैये के बोझ में दब गया शहीदों का बलिदान
ब्यूरो/अमर उजाला, सादिक अली
Updated Tue, 26 Jul 2016 12:47 AM IST
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शहीद स्मारक का हाल।
- फोटो : Amar Ujala
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शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकीं निशां होगा...
देश की सरहदों की हिफाजत करते हुए अपनी जान देने वाले वतन परस्तों के लिए किसी शायर ने यह सटीक शेर कहा था। इस एक अदद शेर ने कई जवानों में जोश भी भरा होगा, लेकिन कारगिल जैसी दुर्लभ जंग में पाकिस्तान को हराने वाले जांबाजों की याद में प्रशासन की ओर से शहर में कुछ नहीं होगा। यहां तक कि जिले के भी कारगिल शहीद को श्रद्धांजलि देने के लिए न मेला लगेगा, न फूल चढ़ेंगे..., न उनकी शहादत को नमन किया जाएगा। जी हां यह सच है।
3 मई 1999 से शुरू हुई और 26 जुलाई 99 तक चली कारगिल की लड़ाई में कुरुक्षेत्र के कोल्हापुर गांव ने भी एक बेटा खोया था।
18 वर्ष का यह सिपाही द्रास में पाकिस्तानियों को मारता रहा और 6 जुलाई 1999 को सरहद की रक्षा करते हुए शहीद हो गया था। लेकिन 17 साल में ही इस जांबाज की शहादत को भूला दिया गया। परिवार में मां- पिता, बहनें, रिश्तेदार सब हैं। अपने स्तर पर 6 जुलाई को हर वर्ष शहादत दिवस मना लेते हैं। लेकिन जब देश में कारगिल विजय का जश्न मनाया जाएगा और शहीदों के बलिदान को नमन किया जाएगा। कुरुक्षेत्र में शहीद स्मारक पर फूल भी नहीं चढ़ेंगे। क्योंकि प्रशासन के पास ऐसे किसी आयोजन की सूचना ही नहीं है। जिला सैनिक कल्याण बोर्ड भी खामोश है। हर बार की तरह इस बार उनकी ओर से भी किसी आयोजन का कोई खत नहीं निकला। डीपीआरओ ऑफिस के जरिये सैनिक कल्याण बोर्ड सूचना जारी करता है, लेकिन कुरुक्षेत्र के एपीआरओ की मानें तो इस बार ऐसी कोई सूचना यहां से नहीं है। जिला प्रशासन की ओर से भी कोई आयोजन नहीं किया जाना है।
जगा के खाक की किस्मत शहीद सोए हैं
लहू से सीना-ए-जमीं के दाग धोए हैं, जगा के खाक की किस्मत शहीद सोए हैं,
फौज हो कहीं की इस तरफ का रुख न करें, यहां जमीन में बम मनचलों ने बोए हैं..।
जांबाज सिपाहियों की दम पर ही देश का हर बाशिंदा यह शेर पढ़ सकता है। खुद को सुरक्षित कह सकता है, लेकिन अपने सीने पर गोलियां खाकर मरने वाले शहीदों लिए प्रशासन के पास वक्त नहीं है। इतना भी नहीं कि लघु सचिवालय परिसर में बने शहीद स्मारक को इस खास मौके पर ही साफ करवा लिया जाए। शहीद स्मारक के गेट पर कचरा पड़ा हुआ है। लेकिन सफाई तक नहीं हुई।
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अधिकारियों को पता ही नहीं कल क्या है?
कारगिल विजय दिवस पर किसी कार्यक्रम की आस में जब प्रशासनिक आला अधिकारियों को फोन किया तो जवाब सुनकर हैरानी हुई। कहा गया कल क्या है? जब बताया कि कारगिल विजय दिवस है। जवाब और हैरान करने वाला आया वह तो 16 को होता है। हमने कहा नहीं 26 जुलाई को कारगिल फतह हुआ था। कार्यक्रम है या नहीं, इस पर जवाब मिला हमें कोई जानकारी नहीं।
18 साल की उम्र में हो गया था शहीद संजीव
गांव कोल्हापुर निवासी संजीव कुमार कारगिल युद्ध के करीब एक वर्ष पहले ही आर्मी में भर्ती हुए थे। कारगिल में तनाव को देखते हुए उन्हें भी द्रास में मोर्चा संभालने भेजा गया। कुरुक्षेत्र जिले का यह शेर आखिरी दम तक दुश्मनों के दांत खट्टे करता रहा और 6 जुलाई 1999 को शहीद हो गया। मां बाप का इकलौता बेटा, चार बहनों का इकलौता भाई, देश की आन बान शान के लिए मर मिटा। उस वक्त मां पार्वती के नाम पर सरकार ने गैस एजेंसी शुरू कराई। पिता सरकारी स्कूल में शिक्षक रहे। लेकिन शहादत के बाद से प्रशासन की ओर से कभी किसी भी दिन शहीद को याद तक नहीं किया गया।
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वतन पर मरने वालों का यही बाकीं निशां होगा...
देश की सरहदों की हिफाजत करते हुए अपनी जान देने वाले वतन परस्तों के लिए किसी शायर ने यह सटीक शेर कहा था। इस एक अदद शेर ने कई जवानों में जोश भी भरा होगा, लेकिन कारगिल जैसी दुर्लभ जंग में पाकिस्तान को हराने वाले जांबाजों की याद में प्रशासन की ओर से शहर में कुछ नहीं होगा। यहां तक कि जिले के भी कारगिल शहीद को श्रद्धांजलि देने के लिए न मेला लगेगा, न फूल चढ़ेंगे..., न उनकी शहादत को नमन किया जाएगा। जी हां यह सच है।
3 मई 1999 से शुरू हुई और 26 जुलाई 99 तक चली कारगिल की लड़ाई में कुरुक्षेत्र के कोल्हापुर गांव ने भी एक बेटा खोया था।
18 वर्ष का यह सिपाही द्रास में पाकिस्तानियों को मारता रहा और 6 जुलाई 1999 को सरहद की रक्षा करते हुए शहीद हो गया था। लेकिन 17 साल में ही इस जांबाज की शहादत को भूला दिया गया। परिवार में मां- पिता, बहनें, रिश्तेदार सब हैं। अपने स्तर पर 6 जुलाई को हर वर्ष शहादत दिवस मना लेते हैं। लेकिन जब देश में कारगिल विजय का जश्न मनाया जाएगा और शहीदों के बलिदान को नमन किया जाएगा। कुरुक्षेत्र में शहीद स्मारक पर फूल भी नहीं चढ़ेंगे। क्योंकि प्रशासन के पास ऐसे किसी आयोजन की सूचना ही नहीं है। जिला सैनिक कल्याण बोर्ड भी खामोश है। हर बार की तरह इस बार उनकी ओर से भी किसी आयोजन का कोई खत नहीं निकला। डीपीआरओ ऑफिस के जरिये सैनिक कल्याण बोर्ड सूचना जारी करता है, लेकिन कुरुक्षेत्र के एपीआरओ की मानें तो इस बार ऐसी कोई सूचना यहां से नहीं है। जिला प्रशासन की ओर से भी कोई आयोजन नहीं किया जाना है।
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जगा के खाक की किस्मत शहीद सोए हैं
लहू से सीना-ए-जमीं के दाग धोए हैं, जगा के खाक की किस्मत शहीद सोए हैं,
फौज हो कहीं की इस तरफ का रुख न करें, यहां जमीन में बम मनचलों ने बोए हैं..।
जांबाज सिपाहियों की दम पर ही देश का हर बाशिंदा यह शेर पढ़ सकता है। खुद को सुरक्षित कह सकता है, लेकिन अपने सीने पर गोलियां खाकर मरने वाले शहीदों लिए प्रशासन के पास वक्त नहीं है। इतना भी नहीं कि लघु सचिवालय परिसर में बने शहीद स्मारक को इस खास मौके पर ही साफ करवा लिया जाए। शहीद स्मारक के गेट पर कचरा पड़ा हुआ है। लेकिन सफाई तक नहीं हुई।
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अधिकारियों को पता ही नहीं कल क्या है?
कारगिल विजय दिवस पर किसी कार्यक्रम की आस में जब प्रशासनिक आला अधिकारियों को फोन किया तो जवाब सुनकर हैरानी हुई। कहा गया कल क्या है? जब बताया कि कारगिल विजय दिवस है। जवाब और हैरान करने वाला आया वह तो 16 को होता है। हमने कहा नहीं 26 जुलाई को कारगिल फतह हुआ था। कार्यक्रम है या नहीं, इस पर जवाब मिला हमें कोई जानकारी नहीं।
18 साल की उम्र में हो गया था शहीद संजीव
गांव कोल्हापुर निवासी संजीव कुमार कारगिल युद्ध के करीब एक वर्ष पहले ही आर्मी में भर्ती हुए थे। कारगिल में तनाव को देखते हुए उन्हें भी द्रास में मोर्चा संभालने भेजा गया। कुरुक्षेत्र जिले का यह शेर आखिरी दम तक दुश्मनों के दांत खट्टे करता रहा और 6 जुलाई 1999 को शहीद हो गया। मां बाप का इकलौता बेटा, चार बहनों का इकलौता भाई, देश की आन बान शान के लिए मर मिटा। उस वक्त मां पार्वती के नाम पर सरकार ने गैस एजेंसी शुरू कराई। पिता सरकारी स्कूल में शिक्षक रहे। लेकिन शहादत के बाद से प्रशासन की ओर से कभी किसी भी दिन शहीद को याद तक नहीं किया गया।