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आज विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर विशेष
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मानसिक दबाव और घटती सहन शक्ति के कारण बच्चे से लेकर युवा और बुजुर्ग भी अपनी जिंदगी को दांव पर लगाने से नहीं झिझक रहे। दिन प्रतिदिन आत्महत्या का ग्राफ बढ़ रहा है, वर्ष 2021 में अब तक सौ से अधिक मामले सामने आ चुके हैं। इनमें 34 लोगों ने फंदा तो 35 से अधिक ने जहरीला पदार्थ निगल कर आत्महत्या कर ली। इनके अलावा 40 से अधिक लोगों ने ट्रेन के आगे आकर और नहर में छलांग लगाकर अपनी जीवन लीला समाप्त की है। मृतकों में 12 महिलाएं और किशोर भी शामिल हैं, लेकिन जिले में कई ऐसे मनोचिकित्सक और समाजसेवी भी हैं, जो तनाव और अवसाद से बाहर निकाल लोगों को नई जिंदगी जीना सिखा रहे हैं। आइए, उनसे रूबरू कराते हैं... संवाद
दबखेड़ी वासी गोताखोर प्रगट सिंह ऐसे 1900 से अधिक लोगों की जान बचा चुके हैं, जो दुनिया को अलविदा कहने का मन बना चुके थे। प्रगट सिंह का कहना है कि वह वर्ष 2003 से नि:शुल्क सेवाएं दे रहे हैं। अभी तक उन्होंने जहां 11 हजार 895 से अधिक शव बरामद किए, वहीं ऐन मौके पर पहुंच आत्महत्या करने का प्रयास करने वाले 1900 से अधिक लोगों की जिंदगी भी बचाई है। प्रगट सिंह का कहना है मामूली कहासुनी होने पर लोग आत्महत्या जैसा कदम उठाने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन वे नहीं जानते ही हमारी जिंदगी अनमोल है। सभी अपनी जिंदगी से प्यार करें।
एलएनजेपी अस्पताल में सेवारत मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सुरेंद्र मढाण अब तक न जाने कितनों को जीने की नई राह दिखा चुके हैं। उनका कहना है कि परिवारों में रोजाना होने वाले आपसी झगड़े, तनाव, बेरोजगारी और नशाखोरी की वजह से व्यक्ति मानसिक तनाव में आ जाता है और फिर धीरे-धीरे अवसाद का शिकार होने लगता है। साथ ही मोबाइल का इस्तेमाल ज्यादा समय तक करना और मानसिक परेशानी के चलते परिजनों एवं दोस्तों से दूरी बनाने की वजह से व्यक्ति अवसाद का शिकार हो जाता है। अवसाद में ज्यादा समय तक रहने से व्यक्ति आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर होता है, लेकिन खुदकुशी करना किसी समस्या का कोई हल नहीं।
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मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. नेहा दुआ सोबती का कहना है कि तनाव और अवसाद के कारण लोग आत्महत्या करते हैं, ये सभी को पता है, लेकिन कई मानसिक बीमारी ऐसी हैं, जिनकी वजह से इंसान हताश हो जाता है और आत्महत्या जैसे कदम उठाता है। उनके अस्पताल में रोजाना एक से दो मरीज पहुंच रहे हैं, जो खुदकुशी करने के बारे में सोच चुके होते हैं। कोरोना काल के बाद सुसाइड की ज्यादा घटनाएं बढ़ी हैं। बच्चे भी तनाव में आ रहे हैं। आत्महत्या केस का बढ़ना एकल परिवार तनाव और सहन शक्ति की कमी है। अंदर ही अंदर घुटने से अच्छा है हम अपनी भावना अपनों के साथ शेयर करें। आत्महत्या से पहले लोग अकसर संकेत जरूर देते हैं।
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र परुथी का कहना है कि 90 प्रतिशत आत्महत्या करने वाले लोगों की आयु 18 से 45 वर्ष के बीच पाई गई है। कई कारणों से इंसान जीवन लीला समाप्त करता है। हर माह उनके पास 20 से 25 मरीज ऐसे आते हैं, जो आत्महत्या करने की इच्छा जाहिर करते हैं, लेकिन उन्हें तब बहुत अच्छा लगता है, जब मरीज उपचार लेने के बाद मरीज आकर बोलता है मैं अब जीना चाहता हूं। आत्महत्या से बचाव के लिए घर में ही एक फ्रेंडली माहौल का होना बेहद जरूरी है। परिवार का फ्रेंडली माहौल परिवार के सदस्यों में आत्मविश्वास पैदा करता है।
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दबखेड़ी वासी गोताखोर प्रगट सिंह ऐसे 1900 से अधिक लोगों की जान बचा चुके हैं, जो दुनिया को अलविदा कहने का मन बना चुके थे। प्रगट सिंह का कहना है कि वह वर्ष 2003 से नि:शुल्क सेवाएं दे रहे हैं। अभी तक उन्होंने जहां 11 हजार 895 से अधिक शव बरामद किए, वहीं ऐन मौके पर पहुंच आत्महत्या करने का प्रयास करने वाले 1900 से अधिक लोगों की जिंदगी भी बचाई है। प्रगट सिंह का कहना है मामूली कहासुनी होने पर लोग आत्महत्या जैसा कदम उठाने को तैयार हो जाते हैं, लेकिन वे नहीं जानते ही हमारी जिंदगी अनमोल है। सभी अपनी जिंदगी से प्यार करें।
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एलएनजेपी अस्पताल में सेवारत मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सुरेंद्र मढाण अब तक न जाने कितनों को जीने की नई राह दिखा चुके हैं। उनका कहना है कि परिवारों में रोजाना होने वाले आपसी झगड़े, तनाव, बेरोजगारी और नशाखोरी की वजह से व्यक्ति मानसिक तनाव में आ जाता है और फिर धीरे-धीरे अवसाद का शिकार होने लगता है। साथ ही मोबाइल का इस्तेमाल ज्यादा समय तक करना और मानसिक परेशानी के चलते परिजनों एवं दोस्तों से दूरी बनाने की वजह से व्यक्ति अवसाद का शिकार हो जाता है। अवसाद में ज्यादा समय तक रहने से व्यक्ति आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर होता है, लेकिन खुदकुशी करना किसी समस्या का कोई हल नहीं।
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मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. नेहा दुआ सोबती का कहना है कि तनाव और अवसाद के कारण लोग आत्महत्या करते हैं, ये सभी को पता है, लेकिन कई मानसिक बीमारी ऐसी हैं, जिनकी वजह से इंसान हताश हो जाता है और आत्महत्या जैसे कदम उठाता है। उनके अस्पताल में रोजाना एक से दो मरीज पहुंच रहे हैं, जो खुदकुशी करने के बारे में सोच चुके होते हैं। कोरोना काल के बाद सुसाइड की ज्यादा घटनाएं बढ़ी हैं। बच्चे भी तनाव में आ रहे हैं। आत्महत्या केस का बढ़ना एकल परिवार तनाव और सहन शक्ति की कमी है। अंदर ही अंदर घुटने से अच्छा है हम अपनी भावना अपनों के साथ शेयर करें। आत्महत्या से पहले लोग अकसर संकेत जरूर देते हैं।
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र परुथी का कहना है कि 90 प्रतिशत आत्महत्या करने वाले लोगों की आयु 18 से 45 वर्ष के बीच पाई गई है। कई कारणों से इंसान जीवन लीला समाप्त करता है। हर माह उनके पास 20 से 25 मरीज ऐसे आते हैं, जो आत्महत्या करने की इच्छा जाहिर करते हैं, लेकिन उन्हें तब बहुत अच्छा लगता है, जब मरीज उपचार लेने के बाद मरीज आकर बोलता है मैं अब जीना चाहता हूं। आत्महत्या से बचाव के लिए घर में ही एक फ्रेंडली माहौल का होना बेहद जरूरी है। परिवार का फ्रेंडली माहौल परिवार के सदस्यों में आत्मविश्वास पैदा करता है।