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इंडो-पैसिफिक आपसी सहयोग, विकसित विश्व व्यवस्था का प्रतीक : परमिता त्रिपाठी

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 16 Oct 2024 04:59 AM IST
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Indo-Pacific mutual cooperation, symbol of developed world order: Parmita Tripathi
कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंडो-पैसिफिक स्टडीज व केंद्र सरकार के विदेश मंत्रालय के इंडो-पैसिफिक डिवीजन के सहयोग से उच्च स्तरीय तीसरे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। दो दिवसीय सम्मेलन में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास विषय पर ऑफलाइन और ऑनलाइन विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए।
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सम्मेलन के दूसरे दिन मुख्यातिथि के तौर पर ऑनलाइन माध्यम से केंद्र सरकार के विदेश मंत्रालय के इंडो-पैसिफिक डिवीजन की संयुक्त सचिव परमिता त्रिपाठी जुड़ी। उन्होंने कहा कि इंडो-पैसिफिक आपसी सहयोग एवं विकसित विश्व व्यवस्था का प्रतीक है। वैश्विक व्यापार एवं समुद्री संसाधनों का इंडो-पैसिफिक अहम हिस्सा भी है। ये संसाधन न केवल इस क्षेत्र के देशों की आर्थिक सुरक्षा के लिए बल्कि समग्र रूप से वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने कहा कि इंडो पैसिफिक केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि सहयोग, सुरक्षा एवं आपसी संयोजन को बढ़ावा देने का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के प्रबंधन, संरक्षण, सुरक्षा और विकास के लिए सहयोग को बढ़ावा देने की पहल की है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय विवादों से लेकर जलवायु परिवर्तन और गैर-पारंपरिक खतरों जैसे अवैध मछली पकड़ने, तस्करी और समुद्री डकैती तक कई महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
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विशिष्ट अतिथि मॉरीशस में भारत के पूर्व उच्चायुक्त अनूप मुदगिल ने कहा कि पिछले 10 वर्षों से हर कोई महासागर के बारे में बात कर रहा है। वर्तमान में मनुष्य अच्छा जीवन जीना चाहता है जोकि उस देश के आर्थिक विकास पर निर्भर करता है। आर्थिक विकास के लिए हमें ऊर्जा, खनिज, पानी के रूप में संसाधन की आवश्यकता होती है लेकिन धरती पर संसाधन सीमित हैं जबकि मनुष्य के सपने और उम्मीदें अंतहीन हैं। प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण जल, वायु, भूमि, जैव विविधता को काफी नुकसान हुआ है।
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रेकम नुसंतारा फाउंडेशन इंडोनेशिया से एनिस्या रोसडियाना ने इंडोनेशिया में महासागर विकास से संबंधी नीति के बारे में जानकारी दी। निदेशक प्रो. वीएन अत्री ने सम्मेलन के बारे में विस्तृत जानकारी दी। इस मौके पर राजदूत संजय पांडा, विदेश सहयोग विभाग के लिए मुख्यमंत्री के सलाहकार पवन कुमार चौधरी, कुलपति प्रो. एडीएन बाजपेयी, कुलपति प्रो. एमबी चेट्टी, प्रो. अशोक चौहान, डॉ. प्रिया सहित अन्य सदस्य, शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद थे।



समस्याओं के समाधान का सार वसुधैव कुटुंबकम में शामिल : कुलपति

कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि वर्तमान में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में जो भी समस्याएं हैं, उनका समाधान आपसी सहयोग, शांति, स्थिरता और एक-दूसरे के प्रति सम्मान में निहित है। उन्होंने कहा कि वैश्विक जनकल्याण की भावना एवं निकट भविष्य की सभी समस्याओं के समाधान का सार वसुधैव कुटुंबकम में शामिल है। वसुधैव कुटुंबकम की भावना स्थिरता, समझ और शांति को पोषित कर विश्व को मानवता के जनकल्याण की ओर अग्रसर करती है। इस अवधारणा को अपनाकर हमें समावेशी एवं सामंजस्यपूर्ण विश्व के सपने को साकार करना होगा।




इंडो पैसिफिक क्षेत्र कई देशों को जोड़ने का कर रहा कार्य : डॉ. चार्ल्स
कुरुक्षेत्र। कुवि के सीनेट हॉल में आयोजित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षा, जलवायु, सतत विकास विषय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन दो सत्रों में किया गया। दूसरे सत्र में मुख्य अतिथि ड्यूक यूनिवर्सिटी के निकोलस स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट के निदेशक डॉ. जॉन विर्डिन ने कहा कि इंडो पैसिफिक क्षेत्र वह क्षेत्र है जहां दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नजर आती है। ऐसे में इस क्षेत्र की बढ़ती अहमियत को समझा जा सकता है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र वो आधार है, जिसके चारों ओर कई देश अपनी नीतियों को स्थापित और जोड़ने में लगे हैं।

विशिष्ट अतिथि डॉ. चार्ल्स एस कोलगन रहे। उन्होंने प्रतिभागियों को जलवायु परिवर्तन और नीली अर्थव्यवस्था, महासागर आधारित तथा महासागरीय अर्थव्यवस्था के बारे में बताया। इंडो पैसिफिक क्षेत्र कई देशों को जोड़ने का कार्य कर रहा है। राष्ट्रीय आय और उत्पादन में महासागर से संबंधित योगदान तथा महासागर अर्थव्यवस्था, महासागर संसाधनों के उपयोग के लिए नवीन तकनीकों का अनुप्रयोग किया जाना चाहिए।

ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के सतत विकास सुधार केंद्र के निदेशक डॉ. बेन मिलिगन ने कहा कि समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र किसी भी देश की राष्ट्रीय संपदा का एक महत्वपूर्ण घटक होता है जो उसके सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए आवश्यक होता है। ऑस्ट्रेलिया के सेंटर फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट रिफॉर्म के डॉ. जॉर्डन गाकुटन ने सतत विकास लक्ष्य की प्राप्ति में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं, कानून एवं नीतियों की जानकारी साझा की। रेकम नुसंतारा ने इंडोनेशिया में महासागर विकास से संबंधी नीति के बारे में जानकारी दी। सम्मेलन के सह-संयोजक प्रो. संजीव बंसल ने सम्मेलन की रिपोर्ट प्रस्तुत की।
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