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नौ साल बाद फिर पुरस्कार से खाली रह गई कुरुक्षेत्र की झोली

Tue, 05 Sep 2017 12:16 AM IST
Updated Tue, 05 Sep 2017 12:16 AM IST
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नौ साल बाद फिर पुरस्कार से खाली रह गई कुरुक्षेत्र की झोली
नौ साल बाद फिर पुरस्कार से खाली रह गई झोली
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- राज्यस्तरीय पुरस्कार के मापदंडों पर खरा नहीं उतर पाया जिले का कोई शिक्षक
- चार ने किया था आवेदन, तीन यहीं पर रिजेक्ट तो एक को विभाग ने नकारा
अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र। भले ही शिक्षा विभाग स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता से लेकर माहौल व बच्चों, शिक्षकों व स्कूल से जुड़ी गतिविधियों को बेहतर बनाए जाने के दावे कर रहा हो, लेकिन जिला में यह धरातल पर नहीं टिक रहे है। इसका प्रमाण है कि नौ साल बाद भी यहां का कोई शिक्षक राज्य स्तरीय पुरस्कार के मापदंडों पर खरा नहीं उतर पाया है। जहां महज चार शिक्षकों ने ही जिला स्तर पर बनाई गई विभागीय कमेटी के समक्ष पुरस्कार के लिए आवेदन किया था वहीं इनमें से तीन को तय किए गए मापदंडों पर खरा न उतरने पर इस कमेटी ने ही रिजेक्ट कर दिया तो वहीं एक शिक्षक का केस पास कर विभाग को भेजा। यह केस भी सिरे नहीं चढ़ पाया और विभाग ने इसे भी सिरे से नकार दिया।
शिक्षा विभाग की ओर से विगत दिवस ही राज्यस्तरीय पुरस्कार के लिए योग्य पाए गए 29 शिक्षकों की सूची जारी की। उन्हें शिक्षक दिवस पर राज्यपाल प्रो. कप्तान सिंह सोलंकी सम्मानित करेंगे। इस सूची में कुरुक्षेत्र जिले से कोई भी शिक्षक शामिल न हो पाने के चलते जिला भर में शिक्षकों से लेकर अधिकारियों व आम लोगों में भी शिक्षक चर्चा का विषय बने हुए हैं। विभागीय जानकारी अनुसार वर्ष 2007 में संस्कृत अध्यापक दलबीर मलिक को यह पुरस्कार मिला तो वहीं मंजू रहेजा को व स्वतंत्र कुमार, ओमप्रकाश को उनसे पहले यह पुरस्कार हासिल हुआ। वर्ष 2008 में सत्यवीर अत्री को यह पुरस्कार मिला, जिनके बाद विभाग के अनुसार आज तक किसी शिक्षक को यह पुरस्कार नहीं मिल पाया है। हालांकि इस बीच कई वर्षों में ये पुरस्कार सरकार की ओर से नहीं दिए जा सके, लेकिन इतने वर्षों में दौरान इस बार भी कोई पुरस्कार न मिल पाना शिक्षकों पर सवाल खड़ा कर रहा है।
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कई मापदंड करने होते हैं पूरे
पुरस्कार के लिए ई लेशन प्लान, सौ फीसदी रिजल्ट, स्कूल व अपने विषय के बच्चों की संख्या बढ़ाना, टीचर डायरी मेंटेन करना व एसीआर प्लस ए होना आदि कई मापदंड पूरे करने होते हैं।
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किसी भी शिक्षक का सूची में नाम न होने का है मलाल : दलबीर
वर्ष 2007 में स्टेट टीचर अवार्ड हासिल कर चुके व राजकीय माध्यमिक विद्यालय झिंवरेहड़ी के मुख्याध्यापक दलबीर सिंह मलिक का कहना है कि इस बार भी किसी भी शिक्षक का नाम अवार्ड की सूची में न होने का उन्हें भी मलाल है। किसी न किसी शिक्षक का नाम तो होना चाहिए था। शिक्षकों को अगले वर्ष के लिए अभी से ही मेहनत करनी चाहिए।


पुरस्कार से वंचित रहना चिंतनीय : आश्री
सर्व शिक्षा अभियान में जिला संयोजक एवं पुरस्कार को लेकर बनाई गई कमेटी में अग्रणी सदस्य रहे अरुण आश्री का कहना है कि पुरस्कार से इतने समय तक वंचित रहना शिक्षकों से लेकर जिला स्तर के सभी अधिकारियों के लिए चिंतनीय है। शिक्षकों को शुरू से ही प्रयास करने चाहिए। उन्होंने बताया कि इस बार प्रमोद कुमार नामक शिक्षक का नाम ही पुरस्कार के लिए यहां से पास कर भेजा गया, लेकिन वह भी विभाग की और से बनाई गई स्टेट कमेटी की ओर से रिजेक्ट कर दिया गया।
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