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श्रीमद्भगवद्गीता के समक्ष नहीं ठहर सकता कोई ग्रंथ: डॉ मिश्र
Updated Mon, 27 Nov 2017 12:10 AM IST
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श्रीमद्भगवद्गीता के समक्ष नहीं ठहर सकता कोई ग्रंथ : डॉ मिश्र
अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र। वैदिक संस्कृति ही विश्व की प्राचीनतम और पवित्र सर्वमान्य संस्कृति है। विश्व कल्याण, सृष्टि की सुव्यवस्था, मानव को उसके जीवन के लक्ष्य, ज्ञान, कर्तव्य, अकर्तव्य के निर्धारण के लिए ही वैदिक मंत्रों के रूप में वैदिक संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ। वैदिक संस्कृति के विस्तारक अनेक ग्रंथों में श्रीमद्भगद्गीता का अपना महत्व है। श्रीमद्भगवद्गीता परमात्मा के श्रीमुख से निकला वैदिक संस्कृति का ऐसा अनुपम रत्न है, जिसकी तुलना में विश्व का कोई भी ग्रंथ ठहर नहीं सकता।
यह विचार मातृ सेवा मिशन के संयोजक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने मिशन द्वारा गीता जयंती समारोह 217 के अवसर पर आयोजित 18 दिवसीय विश्व कल्याण महायज्ञ के चौदहवें दिन व्यक्त किए। महायज्ञ में गीता के चौदहवें अध्याय के श्लोकों की आहुति दी गई। उन्होंने कहा कि वेदों का सार उपनिषद् है और उपनिषदों का सार श्रीमद्भगवद्गीता है। गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति की त्रिवेणी से चतुर्वर्ग की प्राप्ति के सभी मार्ग बताए गए हैं। ये वैदिक संस्कृति के मूलाधार और तत्वसार हैं। वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए स्वयं परमात्मा ने इस धरा पर अवतार धारण करने की अपनी प्रतिज्ञा दोहराई है। वैदिक संस्कृति के आधार और वेदों के सार भूत उपनिषदों का मूल गीता श्रीभगवान के श्रीमुख से निस्सृत एक ऐसा अतुलनीय महाग्रंथ है, जिसका एक भी शब्द सदुपदेश से खाली नहीं है। गीता का वैदिक संस्कृति के उत्थान, पोषण में अविस्मरणीय और महत्वपूर्ण योगदान है। कार्यक्रम में मिशन के विद्यार्थी, सदस्य आदि उपस्थित रहे।
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अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र। वैदिक संस्कृति ही विश्व की प्राचीनतम और पवित्र सर्वमान्य संस्कृति है। विश्व कल्याण, सृष्टि की सुव्यवस्था, मानव को उसके जीवन के लक्ष्य, ज्ञान, कर्तव्य, अकर्तव्य के निर्धारण के लिए ही वैदिक मंत्रों के रूप में वैदिक संस्कृति का प्रादुर्भाव हुआ। वैदिक संस्कृति के विस्तारक अनेक ग्रंथों में श्रीमद्भगद्गीता का अपना महत्व है। श्रीमद्भगवद्गीता परमात्मा के श्रीमुख से निकला वैदिक संस्कृति का ऐसा अनुपम रत्न है, जिसकी तुलना में विश्व का कोई भी ग्रंथ ठहर नहीं सकता।
यह विचार मातृ सेवा मिशन के संयोजक डॉ. श्रीप्रकाश मिश्र ने मिशन द्वारा गीता जयंती समारोह 217 के अवसर पर आयोजित 18 दिवसीय विश्व कल्याण महायज्ञ के चौदहवें दिन व्यक्त किए। महायज्ञ में गीता के चौदहवें अध्याय के श्लोकों की आहुति दी गई। उन्होंने कहा कि वेदों का सार उपनिषद् है और उपनिषदों का सार श्रीमद्भगवद्गीता है। गीता में कर्म, ज्ञान और भक्ति की त्रिवेणी से चतुर्वर्ग की प्राप्ति के सभी मार्ग बताए गए हैं। ये वैदिक संस्कृति के मूलाधार और तत्वसार हैं। वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए स्वयं परमात्मा ने इस धरा पर अवतार धारण करने की अपनी प्रतिज्ञा दोहराई है। वैदिक संस्कृति के आधार और वेदों के सार भूत उपनिषदों का मूल गीता श्रीभगवान के श्रीमुख से निस्सृत एक ऐसा अतुलनीय महाग्रंथ है, जिसका एक भी शब्द सदुपदेश से खाली नहीं है। गीता का वैदिक संस्कृति के उत्थान, पोषण में अविस्मरणीय और महत्वपूर्ण योगदान है। कार्यक्रम में मिशन के विद्यार्थी, सदस्य आदि उपस्थित रहे।
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