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एक साथ बुझ गए घर के तीन चिराग 22-09-05
Updated Tue, 10 Jul 2018 12:28 AM IST
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राजेश शांडिल्य
कुरुक्षेत्र। चीख पुकार सुनी तो मुनीर और उसके समुदाय के अन्य लोग नमाज को छोड़ जोहड़ की ओर दौड़े। मुनीर ने जोहड़ में छलांग लगाई और गांव खरींडवा के जोहड़ में डूबे तीन बच्चों को निकालने में जुट गया। सफलता तो मिली, मगर अधूरी, क्योंकि जब इन बच्चों को अस्पताल पहुंचाया गया तो डाक्टरों ने इन्हें मृत घोषित दिया। इस भयावह घटना के बीच एक अनूठी मिसाल भी सामने आई। दरअसल नमाज छोड़ कर बच्चों की सहायता के लिए गांव के अन्य लोगों के साथ जो हाथ आगे आए थे, उनमें कुछ हाथ मुस्लिम समुदाय के उन लोगों के भी थे, जो कि 17 अप्रैल 2018 के हमले के दौरान एक अन्य समुदाय की गोलियों के छर्रों और अन्य हथियारों से जख्मी हो चुके थे। तब उस वारदात के दौरान दो लोगों की मौत भी हुई थी। मगर मदद के लिए हाथ बढ़ाने वालों ने धर्म की दीवार लांघ कर घृणा और बैर से दूर अपने कर्तव्य को तवज्जों दी।
मुनीर को मलाल है कि काश वह रवि, अनिकेत और अमित को सुरक्षित बाहर निकाल उसके परिवार के आंसू पोंछ पाता। यहां बता दें कि रविवार को जब गांव खरींडवा में तीन बच्चों के डूबने की घटना का शोर मचा तो कई लोग घटनास्थल की ओर मदद के लिये दौड़े थे। तीन बच्चों के डूबने से गांव में मचे कोहराम की गूंज निकट स्थित कब्रिस्तान तक पहुंची थी, जहां मुस्लिम समुदाय के कई लोग नमाज के समय पहुंचे थे, लेकिन बच्चों के डूबने की बात कानों तक पहुंचते ही, फ्लावर डेकोरेशन का काम करने वाला 22 वर्षीय मुनीर, 55 वर्षीय राजमिस्त्री रिजवान, 60 वर्षीय दीनमोहम्मद और 40 वर्षीय नूरद्दीन मौके पर पहुंचे थे।
84 दिन पहले इसलिए सुर्खियों में आया था यह गांव
17 अप्रैल 2018 को शाहाबाद का गांव खरींडवा तब सुर्खियों में आया था जब यहां काफी समय से चल रहे जमीन विवाद को लेकर दो समुदायों में खूनी संघर्ष हुआ था। जमकर पथराव और फायर भी किए गए, जिसमें एक व्यक्ति मौत हो गई थी और मुस्लिम समुदाय के 20 से ज्यादा लोग गंभीर रुप से जख्मी हो गए थे। तब सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास करने वाली ताकतों ने इस माहौल को राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया था, लेकिन दूसरे समुदाय के प्रति जो उदाहरण इस गांव में रविवार को पेश किया वह ऐसे तत्वों को सबक जरूर देगा।
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काफी मन्नतों के बाद घर में गूंजी थी किलकारियां
इस घटना से खरींडवा वासी नरेंद्र और सुखबीर के परिवार दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा है। सुखबीर ने कहा कि उसने मन्नतों के बाद बेटे की प्राप्ति की थी, लेकिन सोचा न था कि होनी उसके साथ यह खेल खेलेगी। क्योंकि एक ही घर में तीन लड़के हंसी की किलकारियों बनते थे, लेकिन आज तीनों एक साथ ही इस दुनिया को अलविदा कह गए थे।
बार-बार बच्चों को पुकार बेहोश हो रहीं थीं तीनों बच्चों की माताएं
अनिकेत, अमित व रवि की माताएं बार-बार आने बच्चों को पुकार कर मूर्छित हो रहीं थीं और बार-बार अपने बच्चों के शवों से लिप्ट कर रो रहीं थीं। नरेंद्र ने कहा कि इस तरह उनके बच्चे पहले कभी जोहड़ पर नहाने भी नहीं गए लेकिन रविवार को जोहड़ पर पहुंच गए और काल का ग्रास बन गए। इन शवों को जब स्वर्ग आश्रम लेकर गए तो पूरा गांव रो उठा था। वहीं एक साथ तीन चिताएं जलने के कारण गांव में चूल्हा तक नहीं जला। पूरा गांव शोक में डूबा था।
दोनों भाई ड्राइवरी कर करते हैं परिवार का पालन
अनिकेत, अमित के पिता नरेंद्र और रवि के पिता सुखबीर ड्राइवरी कर पेट का पालन करते हैं। रविवार को भी वह काम पर गए हुए थे और फोन पर बच्चों के साथ हादसे की खबर सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
ओवरफ्लो था जोहड़
गांव का यह जोहड़ ओवरफ्लो था। जिसमें पानी लबालब भरा था और किनारों से बाहर पहुंचा था। जोहड़ की चारदीवारी भी नहीं थी। हालांकि गांववासियों का कहना है कि प्रतिदिन यहां काफी बच्चे नहाते हैं। लेकिन यह बच्चे छोटे थे और काल का ग्रास बन गए।
कुरुक्षेत्र। चीख पुकार सुनी तो मुनीर और उसके समुदाय के अन्य लोग नमाज को छोड़ जोहड़ की ओर दौड़े। मुनीर ने जोहड़ में छलांग लगाई और गांव खरींडवा के जोहड़ में डूबे तीन बच्चों को निकालने में जुट गया। सफलता तो मिली, मगर अधूरी, क्योंकि जब इन बच्चों को अस्पताल पहुंचाया गया तो डाक्टरों ने इन्हें मृत घोषित दिया। इस भयावह घटना के बीच एक अनूठी मिसाल भी सामने आई। दरअसल नमाज छोड़ कर बच्चों की सहायता के लिए गांव के अन्य लोगों के साथ जो हाथ आगे आए थे, उनमें कुछ हाथ मुस्लिम समुदाय के उन लोगों के भी थे, जो कि 17 अप्रैल 2018 के हमले के दौरान एक अन्य समुदाय की गोलियों के छर्रों और अन्य हथियारों से जख्मी हो चुके थे। तब उस वारदात के दौरान दो लोगों की मौत भी हुई थी। मगर मदद के लिए हाथ बढ़ाने वालों ने धर्म की दीवार लांघ कर घृणा और बैर से दूर अपने कर्तव्य को तवज्जों दी।
मुनीर को मलाल है कि काश वह रवि, अनिकेत और अमित को सुरक्षित बाहर निकाल उसके परिवार के आंसू पोंछ पाता। यहां बता दें कि रविवार को जब गांव खरींडवा में तीन बच्चों के डूबने की घटना का शोर मचा तो कई लोग घटनास्थल की ओर मदद के लिये दौड़े थे। तीन बच्चों के डूबने से गांव में मचे कोहराम की गूंज निकट स्थित कब्रिस्तान तक पहुंची थी, जहां मुस्लिम समुदाय के कई लोग नमाज के समय पहुंचे थे, लेकिन बच्चों के डूबने की बात कानों तक पहुंचते ही, फ्लावर डेकोरेशन का काम करने वाला 22 वर्षीय मुनीर, 55 वर्षीय राजमिस्त्री रिजवान, 60 वर्षीय दीनमोहम्मद और 40 वर्षीय नूरद्दीन मौके पर पहुंचे थे।
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84 दिन पहले इसलिए सुर्खियों में आया था यह गांव
17 अप्रैल 2018 को शाहाबाद का गांव खरींडवा तब सुर्खियों में आया था जब यहां काफी समय से चल रहे जमीन विवाद को लेकर दो समुदायों में खूनी संघर्ष हुआ था। जमकर पथराव और फायर भी किए गए, जिसमें एक व्यक्ति मौत हो गई थी और मुस्लिम समुदाय के 20 से ज्यादा लोग गंभीर रुप से जख्मी हो गए थे। तब सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास करने वाली ताकतों ने इस माहौल को राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया था, लेकिन दूसरे समुदाय के प्रति जो उदाहरण इस गांव में रविवार को पेश किया वह ऐसे तत्वों को सबक जरूर देगा।
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काफी मन्नतों के बाद घर में गूंजी थी किलकारियां
इस घटना से खरींडवा वासी नरेंद्र और सुखबीर के परिवार दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा है। सुखबीर ने कहा कि उसने मन्नतों के बाद बेटे की प्राप्ति की थी, लेकिन सोचा न था कि होनी उसके साथ यह खेल खेलेगी। क्योंकि एक ही घर में तीन लड़के हंसी की किलकारियों बनते थे, लेकिन आज तीनों एक साथ ही इस दुनिया को अलविदा कह गए थे।
बार-बार बच्चों को पुकार बेहोश हो रहीं थीं तीनों बच्चों की माताएं
अनिकेत, अमित व रवि की माताएं बार-बार आने बच्चों को पुकार कर मूर्छित हो रहीं थीं और बार-बार अपने बच्चों के शवों से लिप्ट कर रो रहीं थीं। नरेंद्र ने कहा कि इस तरह उनके बच्चे पहले कभी जोहड़ पर नहाने भी नहीं गए लेकिन रविवार को जोहड़ पर पहुंच गए और काल का ग्रास बन गए। इन शवों को जब स्वर्ग आश्रम लेकर गए तो पूरा गांव रो उठा था। वहीं एक साथ तीन चिताएं जलने के कारण गांव में चूल्हा तक नहीं जला। पूरा गांव शोक में डूबा था।
दोनों भाई ड्राइवरी कर करते हैं परिवार का पालन
अनिकेत, अमित के पिता नरेंद्र और रवि के पिता सुखबीर ड्राइवरी कर पेट का पालन करते हैं। रविवार को भी वह काम पर गए हुए थे और फोन पर बच्चों के साथ हादसे की खबर सुनकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
ओवरफ्लो था जोहड़
गांव का यह जोहड़ ओवरफ्लो था। जिसमें पानी लबालब भरा था और किनारों से बाहर पहुंचा था। जोहड़ की चारदीवारी भी नहीं थी। हालांकि गांववासियों का कहना है कि प्रतिदिन यहां काफी बच्चे नहाते हैं। लेकिन यह बच्चे छोटे थे और काल का ग्रास बन गए।