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Karnal News: ऊन से महिलाएं बुन रहीं आत्मनिर्भरता और समृद्धि
Mon, 01 Dec 2025 02:06 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
Updated Mon, 01 Dec 2025 02:06 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल।
हाथों के बुने स्वेटर उनके लिए आत्मनिर्भरता की सीढ़ी हैं। सर्दी का माैसम शुरू होते ही कई गांवों में महिलाएं समूहों हाथों से स्वेटर बुनने लगती हैं। इस बार भी ऐसा है। स्वयं सहायता समूह की महिलाएं अपने इस घरेलू हुनर को रोजगार का साधन बना चुकी हैं। हर शनिवार व रविवार को अलग-अलग गांवों की महिलाएं शहर के बाजार में अपना स्टॉल लगाती हैं। ग्राहकों की कतार लगती है। हाथों से बुने स्वेटर बेहद पसंद किए जा रहे हैं। स्टॉल लगाए हुए एक महिला बोलीं, ये रेडीमेड स्वेटरों को मात देते हैं। हम स्वेटर नहीं अपने लिए समृद्धि और आत्मनिर्भरता बुनते हैं।
- चार साल से कर रही स्वयं का रोजगार
संगोही गांव की रहने वाली संजो देवी ने बताया कि वह पिछले चार साल से स्वयं सहायता समूह से जुड़कर स्वरोजगार कर रही हैं। उन्होंने बताया कि शहरों में लोग सबसे अधिक केवल रेडीमेड स्वेटरों पर निर्भर रहते हैं, जिसमें न तो अच्छी गुणवत्ता होती है न ही वह अधिक टिकाऊ। इसलिए उन्होंने सोचा की लोगों को पुरानी हस्तनिर्मित कला से जोड़कर रखने के लिए उन्हें हाथों से बने ऊनी कपड़े अलग-अलग डिजाइनों में उपलब्ध करवाना होगा। वह हर साल सर्दी आने से छह से सात माह पहले ही गर्म स्वेटर, जुराबें, दस्ताने और टाॅपी बनाने लग जाती हैं। फिर उन्हें बाजार में जाकर बेचती है। संजो ने बताया कि हर वर्ष लगभग 30 से 50 हजार तक की आमदनी कर वह अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करती हैं।
- बचपन से बना रहीं ऊनी कपड़े
चिड़ाव गांव की रजनी ने बताया कि वह बचपन से मां के साथ हाथों से बुनने वाली स्वेटर व अलग-अलग डिजाइन में परिधान बनाती आ रही हैं। बचपन के शाैक को बनाए रखने के लिए खुद को समूह से जोड़ा, जिसके बाद सर्दी के माैसम आने से पहले ही ट्रेंड कर रहे डिजाइनों को ध्यान में रखते हुए ऊनी वस्त्रों को तैयार करती है। इनमें ऊनी कार्डिगन, बच्चों, बुजुर्गों व युवाओं की ऊनी स्वेटर बुनती है। इन्हें पहले बुजुर्ग महिला ही तैयार किया करती थी लेकिन दाैर बदल रहा है। इसमें युवतियां भी स्वयं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए घरेलू हुनर को रोजगार का साधन बना रहीं हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में उन्होंने केवल युवाओं के लिए ऊनी स्वेटर व दस्ताने बनाएं हैं, जिन्हें उचित दामों पर लोगों को उपलब्ध करवाया जाएगा।
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करनाल।
हाथों के बुने स्वेटर उनके लिए आत्मनिर्भरता की सीढ़ी हैं। सर्दी का माैसम शुरू होते ही कई गांवों में महिलाएं समूहों हाथों से स्वेटर बुनने लगती हैं। इस बार भी ऐसा है। स्वयं सहायता समूह की महिलाएं अपने इस घरेलू हुनर को रोजगार का साधन बना चुकी हैं। हर शनिवार व रविवार को अलग-अलग गांवों की महिलाएं शहर के बाजार में अपना स्टॉल लगाती हैं। ग्राहकों की कतार लगती है। हाथों से बुने स्वेटर बेहद पसंद किए जा रहे हैं। स्टॉल लगाए हुए एक महिला बोलीं, ये रेडीमेड स्वेटरों को मात देते हैं। हम स्वेटर नहीं अपने लिए समृद्धि और आत्मनिर्भरता बुनते हैं।
- चार साल से कर रही स्वयं का रोजगार
संगोही गांव की रहने वाली संजो देवी ने बताया कि वह पिछले चार साल से स्वयं सहायता समूह से जुड़कर स्वरोजगार कर रही हैं। उन्होंने बताया कि शहरों में लोग सबसे अधिक केवल रेडीमेड स्वेटरों पर निर्भर रहते हैं, जिसमें न तो अच्छी गुणवत्ता होती है न ही वह अधिक टिकाऊ। इसलिए उन्होंने सोचा की लोगों को पुरानी हस्तनिर्मित कला से जोड़कर रखने के लिए उन्हें हाथों से बने ऊनी कपड़े अलग-अलग डिजाइनों में उपलब्ध करवाना होगा। वह हर साल सर्दी आने से छह से सात माह पहले ही गर्म स्वेटर, जुराबें, दस्ताने और टाॅपी बनाने लग जाती हैं। फिर उन्हें बाजार में जाकर बेचती है। संजो ने बताया कि हर वर्ष लगभग 30 से 50 हजार तक की आमदनी कर वह अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करती हैं।
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- बचपन से बना रहीं ऊनी कपड़े
चिड़ाव गांव की रजनी ने बताया कि वह बचपन से मां के साथ हाथों से बुनने वाली स्वेटर व अलग-अलग डिजाइन में परिधान बनाती आ रही हैं। बचपन के शाैक को बनाए रखने के लिए खुद को समूह से जोड़ा, जिसके बाद सर्दी के माैसम आने से पहले ही ट्रेंड कर रहे डिजाइनों को ध्यान में रखते हुए ऊनी वस्त्रों को तैयार करती है। इनमें ऊनी कार्डिगन, बच्चों, बुजुर्गों व युवाओं की ऊनी स्वेटर बुनती है। इन्हें पहले बुजुर्ग महिला ही तैयार किया करती थी लेकिन दाैर बदल रहा है। इसमें युवतियां भी स्वयं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए घरेलू हुनर को रोजगार का साधन बना रहीं हैं। उन्होंने बताया कि वर्तमान में उन्होंने केवल युवाओं के लिए ऊनी स्वेटर व दस्ताने बनाएं हैं, जिन्हें उचित दामों पर लोगों को उपलब्ध करवाया जाएगा।
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