{"_id":"614ceb4e8ebc3e09973712d0","slug":"two-new-indigenous-breeds-of-indian-buffalo-registered-karnal-news-knl842160187","type":"story","status":"publish","title_hn":"भारतीय भैंसों की दो नई देसी नस्लें हुई पंजीकृत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भारतीय भैंसों की दो नई देसी नस्लें हुई पंजीकृत
विज्ञापन
कर्मबीर लाठर
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। भारत में पाई जाने वाली भैंसों की दो और देसी नस्लों का पंजीकरण किया गया है। इनमें ‘धारवाड़ी भैंस’ नस्ल का उद्गम स्थल कर्नाटक है और दूसरी ‘मंदा भैंस’ का ओडिशा है।
नेशनल ब्यूरो आफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्स (एनबीएजीआर) करनाल के निदेशक डा. बीपी मिश्रा ने बताया कि नई पंजीकृत भैंसों की नस्लों को मिलाकर देश में अब कुल देसी नस्लों की संख्या 202 है, जिनमें गोवंश की 50, भैंस की 19, बकरी की 34, भेड़ की 44, घोड़े की सात, ऊंट की नौ, सुअर की दस, गधे की तीन, याक की एक, मुर्गे की19, बत्तख की दो, गीज की एक व स्वान की तीन नस्लें शामिल हैं। उन्होंने बताया कि पंजीकरण के बाद नस्ल को और उसके उद्गम स्थल को भी पहचान मिलती है।
उन्होंने बताया कि भैंसों की नई नस्लों के नाम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक (पशु विज्ञान) डा. बीएन त्रिपाठी की अध्यक्षता में 16 अगस्त 2021 को हुई नौवीं नस्ल पंजीकरण समिति की बैठक में पंजीकरण के लिए अनुमोदित किए थे। उसके बाद इनका पंजीकरण कर लिया गया है। देश में एनबीएजीआर पशुधन व कुक्कुट की नई नस्लों के पंजीकरण के लिए नोडल एजेंसी है।
विज्ञापन
धारवाड़ी के दूध से बनता है जीआई टैग वाला पेड़ा
धारवाड़ी भैंस कर्नाटक राज्य के बागलकोट, बेलगाम, डहरवाड़, गडग, बेल्लारी, बीदर, विजयपुरा, चित्रदुर्ग, कलबुर्गी, हावेरी, कोपल, रायचूर व यादगित जिलों में पाई जाती है। यह मध्यम आकार की काले रंग की भैंस है जिसका सिर सीधा होता है। सींग अर्ध-गोलाकार होते हुए गर्दन को स्पर्श करती है। इसे मुख्य रूप से दूध के उद्देश्य से पाला जाता है। यह प्रतिदिन 1.5 से 8.7 लीटर तक दूध देती है। इसके दूध का उपयोग जीआई टैग (भौगोलिक उपदर्शन) वाला प्रसिद्ध धारवाड़ पेड़ा तैयार करने के लिए किया जाता है। यह भैंस कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए अनुकूल है।
कृषि कार्यों के लिए उपयुक्त ‘मंदा’ भैंस
मंदा भैंस ओडिशा राज्य के कोरापुट, मलकानगिरी व नवरंगपुर जिलों में पाई जाती है। यह कद-काठी में मजबूत है और ओडिशा के पूर्वी घाट की पहाड़ी और कोरापुट क्षेत्र के पठार के लिए अनुकूल है। तांबे के रंग के बालों के साथ शरीर का रंग ज्यादातर राख की तरह भूरा या पूरी तरह भूरा होता है। पैर का निचला हिस्सा हल्के रंग का होता है। सींग चौड़ी होती है जो पीछे की ओर जाकर लगभग आधा घेरा बनाती है। मंदा भैंसों को कृषि कार्यों, दूध व खाद के लिए पाला जाता है। नर व मादा दोनों का उपयोग कृषि कार्यों के लिए किया जाता है। दैनिक दूध उत्पादन 1.2 से 3.7 किलोग्राम के बीच होता है।
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। भारत में पाई जाने वाली भैंसों की दो और देसी नस्लों का पंजीकरण किया गया है। इनमें ‘धारवाड़ी भैंस’ नस्ल का उद्गम स्थल कर्नाटक है और दूसरी ‘मंदा भैंस’ का ओडिशा है।
नेशनल ब्यूरो आफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्स (एनबीएजीआर) करनाल के निदेशक डा. बीपी मिश्रा ने बताया कि नई पंजीकृत भैंसों की नस्लों को मिलाकर देश में अब कुल देसी नस्लों की संख्या 202 है, जिनमें गोवंश की 50, भैंस की 19, बकरी की 34, भेड़ की 44, घोड़े की सात, ऊंट की नौ, सुअर की दस, गधे की तीन, याक की एक, मुर्गे की19, बत्तख की दो, गीज की एक व स्वान की तीन नस्लें शामिल हैं। उन्होंने बताया कि पंजीकरण के बाद नस्ल को और उसके उद्गम स्थल को भी पहचान मिलती है।
विज्ञापन
उन्होंने बताया कि भैंसों की नई नस्लों के नाम भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक (पशु विज्ञान) डा. बीएन त्रिपाठी की अध्यक्षता में 16 अगस्त 2021 को हुई नौवीं नस्ल पंजीकरण समिति की बैठक में पंजीकरण के लिए अनुमोदित किए थे। उसके बाद इनका पंजीकरण कर लिया गया है। देश में एनबीएजीआर पशुधन व कुक्कुट की नई नस्लों के पंजीकरण के लिए नोडल एजेंसी है।
विज्ञापन
धारवाड़ी के दूध से बनता है जीआई टैग वाला पेड़ा
धारवाड़ी भैंस कर्नाटक राज्य के बागलकोट, बेलगाम, डहरवाड़, गडग, बेल्लारी, बीदर, विजयपुरा, चित्रदुर्ग, कलबुर्गी, हावेरी, कोपल, रायचूर व यादगित जिलों में पाई जाती है। यह मध्यम आकार की काले रंग की भैंस है जिसका सिर सीधा होता है। सींग अर्ध-गोलाकार होते हुए गर्दन को स्पर्श करती है। इसे मुख्य रूप से दूध के उद्देश्य से पाला जाता है। यह प्रतिदिन 1.5 से 8.7 लीटर तक दूध देती है। इसके दूध का उपयोग जीआई टैग (भौगोलिक उपदर्शन) वाला प्रसिद्ध धारवाड़ पेड़ा तैयार करने के लिए किया जाता है। यह भैंस कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए अनुकूल है।
कृषि कार्यों के लिए उपयुक्त ‘मंदा’ भैंस
मंदा भैंस ओडिशा राज्य के कोरापुट, मलकानगिरी व नवरंगपुर जिलों में पाई जाती है। यह कद-काठी में मजबूत है और ओडिशा के पूर्वी घाट की पहाड़ी और कोरापुट क्षेत्र के पठार के लिए अनुकूल है। तांबे के रंग के बालों के साथ शरीर का रंग ज्यादातर राख की तरह भूरा या पूरी तरह भूरा होता है। पैर का निचला हिस्सा हल्के रंग का होता है। सींग चौड़ी होती है जो पीछे की ओर जाकर लगभग आधा घेरा बनाती है। मंदा भैंसों को कृषि कार्यों, दूध व खाद के लिए पाला जाता है। नर व मादा दोनों का उपयोग कृषि कार्यों के लिए किया जाता है। दैनिक दूध उत्पादन 1.2 से 3.7 किलोग्राम के बीच होता है।