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Karnal: पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य बोले- धर्म परिवर्तन कराने वालों को दी जाए फांसी, इसके लिए राजनेता जिम्मेदार

अमर उजाला ब्यूरो, करनाल (हरियाणा) Published by: अमर उजाला ब्यूरो Updated Wed, 23 Nov 2022 03:15 AM IST
सार

स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा है कि हिंदुओं का लक्ष्य अखंड भारत है, ताकि सभी को प्यार और सम्मान मिले। हिंदुओं को लक्ष्य से दूर नहीं होना चाहिए।

एसडी आदर्श स्कूल में आयोजित धर्म सभा में  उपसिथत पुरी पीठ के पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वा?
एसडी आदर्श स्कूल में आयोजित धर्म सभा में उपसिथत पुरी पीठ के पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वा?
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विस्तार

करनाल में पुरी पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज ने कहा कि हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने वालों को फांसी की सजा दी जाए। उन्होंने कहा कि देश व प्रदेश के राजा की हीनता के कारण ही धर्म परिवर्तन होता है। इसके लिए राजनेता ही जिम्मेदार हैं। उनकी शह के बिना धर्म परिवर्तन नहीं किया जा सकता। स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज दो दिन के लिए करनाल प्रवास पर हैं। मंगलवार को उन्होंने शहर में हुए विभिन्न कार्यक्रमों में शिरकत की।


स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा है कि हिंदुओं का लक्ष्य अखंड भारत है, ताकि सभी को प्यार और सम्मान मिले। हिंदुओं को लक्ष्य से दूर नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि गो हत्या और धर्म परिवर्तन के लिए राजा ही दोषी होता है। गो रक्षकों को गुंडा कहना गलत है। उन्होंने कहा कि राजनीति धर्म के अधीन होनी चाहिए।


देश में राज धर्म का प्रयोग धर्म के अनुसार होता है। राजनीति और धर्म एक-दूसरे के पर्याय हैं। अधर्मी राजा हमेशा देश और समाज के लिए खतरनाक होता है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दलों की आयु दो सौ साल से अधिक नहीं है, लेकिन गुरु और सनातन परंपरा एक अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार एक सौ 22 वर्ष पुरानी है।

राजनेता व्यास पीठ से ऊपर नहीं
स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने कहा कि कोई भी संस्था या राजनेता व्यास पीठ से ऊपर नहीं होता है। प्रधानमंत्री मोदी और योगी आदित्यनाथ उनके प्रिय हैं लेकिन वह भी व्यास पीठ से ऊपर नहीं हैं। हिंदुओं का सशक्त होना संसार के हित में है। सनातन धर्म और वैदिक संस्कृति संसार के उद्गम के साथ ही शुरू हो गई थी। हिंदू संस्कृति के तहत विज्ञान और राष्ट्र के उत्कर्ष के साथ अखंड भारत का स्वरूप विश्व के हित में है, जो अहंकार के वशीभूत होकर जो काम करते हैं वही, असफल होता है। संत को धन की आशक्ति से दूर रहना चाहिए।
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