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Karnal News: लगान देने से इनकार कर अंग्रेजी हुकूमत से लड़ी थी जंग
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- 1857 में अंग्रेजी सेना ने हमला किया तो बल्ला के ग्रामीणों ने खदेड़ दिया
संवाद न्यूज एजेंसी
मूनक। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग लड़ने में बल्ला गांव का भी खासा योगदान रहा है। 1857 में जब अंग्रेजी हुकूमत ने फसलों पर ज्यादा कर लगा दिया तो ग्रामीणों ने कर चुकाने की बजाय उनसे दो-दो हाथ करने का फैसला लिया। इस दौरान अंग्रेजी सैनिकों ने गांव पर हमला भी किया, गोले भी दागे मगर ग्रामीण डरे नहीं बल्कि मुकाबला करते हुए अंग्रेजी सैनिकों को वहां से खदेड़ दिया।
वर्तमान में इस गांव की करीब 20 हजार आबादी है। गांव में सभी जाति व धर्म के लोग रहते हैं। इसमें जाटों की संख्या ज्यादा है। ग्रामीण रमेश, सुरेश, वरिंद्र, राजवीर, राजेंद्र, जसवंत, राममेहर, बलबीर, महेंद्र, सतपाल, इंद्र, रामेश्वर और कृष्ण कुमार ने बताया कि पहले गांव वासी फसलों पर ही निर्भर रहते थे। इसी की कमाई से अपने घर का गुजारा करते थे मगर अंग्रेजी सरकार उस समय फसलों पर टैक्स ज्यादा लेने लगी। जिसके कारण देश भर में विरोध शुरू हो गया। क्योंकि आमदनी कम होने के कारण वह यह चुका नहीं सकते थे। इसके विरोध में ग्रामीण कूद गए और लगान नहीं देने का फैसला लिया। संवाद
दुर्व्यवहार के खिलाफ लड़े
ग्रामीणों ने बताया कि अंग्रेजी सैनिक उन किसानों के साथ दुर्व्यवहार करते थे जो लगान नहीं देते थे। चौपाल व सार्वजनिक स्थानों पर उनके कान पकड़वाए जाते थे। इसी से आक्रोशित ग्रामीणों ने उनके खिलाफ आवाज बुलंद की। इससे भड़के सैनिकों ने गांव पर हमला कर दिया और तोप से तीन गोले दागे गए। इसके आज भी निशान मौजूद हैं। गनीमत रही कि तब जान माल का नुकसान नहीं हुआ।
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सेठ ने भरा पूरे गांव का लगान
बाद में मोर माजरा गांव के सेठ शली ने सारे गांव का लगान भर दिया था। ताकि ग्रामीणों को कोई परेशानी न आए। देश आजाद होने के बाद भी 33 वर्ष तक गांव वालों ने इस लगान को भरा। फिर तत्कालीन उप प्रधानमंत्री ताऊ देवीलाल ने इसे खत्म किया। 1857 से 1965 व 1971 और कारगिल युद्ध में भी इस गांव के जवानों ने शहादत दी है। कारगिल युद्ध में गुलाब सिंह, 1971 की लड़ाई में रतन सिंह जाट बटालियन में अपनी शहादत देकर गांव का नाम ऊंचा किया है। आज भी गांव वासी बैठकों में बुजुर्गों से सुनी उन बातों की चर्चा करते हैं
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संवाद न्यूज एजेंसी
मूनक। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंग लड़ने में बल्ला गांव का भी खासा योगदान रहा है। 1857 में जब अंग्रेजी हुकूमत ने फसलों पर ज्यादा कर लगा दिया तो ग्रामीणों ने कर चुकाने की बजाय उनसे दो-दो हाथ करने का फैसला लिया। इस दौरान अंग्रेजी सैनिकों ने गांव पर हमला भी किया, गोले भी दागे मगर ग्रामीण डरे नहीं बल्कि मुकाबला करते हुए अंग्रेजी सैनिकों को वहां से खदेड़ दिया।
वर्तमान में इस गांव की करीब 20 हजार आबादी है। गांव में सभी जाति व धर्म के लोग रहते हैं। इसमें जाटों की संख्या ज्यादा है। ग्रामीण रमेश, सुरेश, वरिंद्र, राजवीर, राजेंद्र, जसवंत, राममेहर, बलबीर, महेंद्र, सतपाल, इंद्र, रामेश्वर और कृष्ण कुमार ने बताया कि पहले गांव वासी फसलों पर ही निर्भर रहते थे। इसी की कमाई से अपने घर का गुजारा करते थे मगर अंग्रेजी सरकार उस समय फसलों पर टैक्स ज्यादा लेने लगी। जिसके कारण देश भर में विरोध शुरू हो गया। क्योंकि आमदनी कम होने के कारण वह यह चुका नहीं सकते थे। इसके विरोध में ग्रामीण कूद गए और लगान नहीं देने का फैसला लिया। संवाद
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दुर्व्यवहार के खिलाफ लड़े
ग्रामीणों ने बताया कि अंग्रेजी सैनिक उन किसानों के साथ दुर्व्यवहार करते थे जो लगान नहीं देते थे। चौपाल व सार्वजनिक स्थानों पर उनके कान पकड़वाए जाते थे। इसी से आक्रोशित ग्रामीणों ने उनके खिलाफ आवाज बुलंद की। इससे भड़के सैनिकों ने गांव पर हमला कर दिया और तोप से तीन गोले दागे गए। इसके आज भी निशान मौजूद हैं। गनीमत रही कि तब जान माल का नुकसान नहीं हुआ।
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सेठ ने भरा पूरे गांव का लगान
बाद में मोर माजरा गांव के सेठ शली ने सारे गांव का लगान भर दिया था। ताकि ग्रामीणों को कोई परेशानी न आए। देश आजाद होने के बाद भी 33 वर्ष तक गांव वालों ने इस लगान को भरा। फिर तत्कालीन उप प्रधानमंत्री ताऊ देवीलाल ने इसे खत्म किया। 1857 से 1965 व 1971 और कारगिल युद्ध में भी इस गांव के जवानों ने शहादत दी है। कारगिल युद्ध में गुलाब सिंह, 1971 की लड़ाई में रतन सिंह जाट बटालियन में अपनी शहादत देकर गांव का नाम ऊंचा किया है। आज भी गांव वासी बैठकों में बुजुर्गों से सुनी उन बातों की चर्चा करते हैं