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Karnal News: कृषि में विज्ञान-तकनीक से 55 हजार करोड़ का लाभ
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करनाल। कृषि में वैज्ञानिक अनुसंधान और नई तकनीकों का योगदान देश की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा साबित हो रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. एमएल जाट ने कृषि क्षेत्र में विज्ञान व तकनीक से 55 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रत्यक्ष लाभ पहुंचने का दावा किया है।
उन्होंने बताया कि कृषि, बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन के कुल उत्पादन का मूल्य पिछले वर्ष करीब 1.70 लाख करोड़ रुपये आंका गया। इसमें विज्ञान और तकनीक के योगदान का एक-तिहाई हिस्सा है। वे वीरवार को आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) में पहुंचे। 27 और 28 अक्तूबर को दिल्ली के भारत मंडपम में होने वाले इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव (ईएसटीआईसी)-2026 के पूर्वावलोकन कार्यक्रम में उपलब्धियों और आगामी कॉन्क्लेव में आईसीएआर की भागीदारी की रूपरेखा साझा की। उन्होंने फसल विज्ञान, पशु विज्ञान, मृदा प्रबंधन, कृषि यंत्रीकरण और खाद्य प्रणालियों में हो रहे तकनीकी विकास की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि कृषि में उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और पोषक तत्वों के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लक्ष्य के तहत ग्रीन अमोनिया तकनीक पर काम किया जा रहा है। सौर ऊर्जा से हाइड्रोजन तैयार करने और उसके माध्यम से अमोनिया बनाने की तकनीक पर अनुसंधान हो रहा है। इस सीजन में छह राज्यों के 10 हजार एकड़ क्षेत्र में इसका प्रदर्शन किया जा रहा है। तकनीक का उद्देश्य खेती में पोषक तत्वों की उपलब्धता के नए विकल्पों पर काम करना है। हालांकि, इसके परिणाम और व्यावहारिक उपयोगिता का आकलन प्रदर्शन के नतीजों के आधार पर किया जाना होगा।
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एक साल में फील्ड फसलों की 386 से अधिक किस्में जारी
डॉ. जाट ने बताया कि आईसीएआर ने एक वर्ष में फील्ड फसलों की 386 से अधिक किस्में जारी की हैं। 94 प्रतिशत किस्में जलवायु अनुकूल हैं, जबकि 29 किस्में बायोफोर्टिफाइड हैं। किस्मों को किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रजनक बीज उत्पादन कर रहे हैं। बागवानी क्षेत्र में भी 57 फसलों की 117 उन्नत किस्में विकसित की गईं।
पशु रोगों से निपटने और उत्पादकता बढ़ाने पर भी काम
आईसीएआर की ओर से पशु विज्ञान के क्षेत्र में जीनोमिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रिसिजन लाइवस्टॉक फार्मिंग जैसी तकनीकों पर काम किया जा रहा है। लंपी स्किन डिजीज के दौरान स्वदेशी वैक्सीन विकसित करने के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि खुरपका-मुंहपका रोग के मामलों में पिछले वर्ष 85 प्रतिशत तक कमी दर्ज हुई। पशु रोगों की समय रहते पहचान और पूर्वानुमान के लिए भी मॉडल विकसित कर रहे हैं।
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के तहत मृदा स्वास्थ्य, जलभराव, जल निकासी और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों पर शोध किया जा रहा है। राजस्थान, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में खारे पानी और लवणीय भूमि वाले क्षेत्रों में झींगा पालन का विस्तार किया गया है।
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ईएसटीआईसी-2026 में एनडीआरआई की टेस्टिंग किट भी होगी शामिल
ईएसटीआईसी-2026 में कृषि के लिए एग्री-टेक, फूड सिस्टम एंड न्यूट्रिशन को प्रमुख विषय के रूप में रखा गया है। कॉन्क्लेव में दुनिया की पहली जीनोम एडिटेड धान की दो किस्मों, अरहर के रेफरेंस जीनोम और कीट प्रतिरोध से जुड़े शोध सहित कई वैज्ञानिक उपलब्धियों को प्रदर्शित किया जाएगा।
करनाल की एनडीआरआई की ओर से विकसित दूध में मिलावट की तत्काल जांच करने वाली रैपिड टेस्टिंग किट भी प्रदर्शनी में शामिल होगी। इसके अलावा, आईसीएआर और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की संयुक्त पहल सेहत के तहत कृषि, खाद्य और स्वास्थ्य के बीच संबंधों पर जोर दिया जाएगा। कॉन्क्लेव में 12 व्यापक विषयगत क्षेत्रों पर चर्चा होगी और विभिन्न विभागों के वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, युवा शोधकर्ता तथा डीप-टेक स्टार्टअप हिस्सा लेंगे।
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उन्होंने बताया कि कृषि, बागवानी, पशुपालन और मत्स्य पालन के कुल उत्पादन का मूल्य पिछले वर्ष करीब 1.70 लाख करोड़ रुपये आंका गया। इसमें विज्ञान और तकनीक के योगदान का एक-तिहाई हिस्सा है। वे वीरवार को आईसीएआर-केंद्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान (सीएसएसआरआई) में पहुंचे। 27 और 28 अक्तूबर को दिल्ली के भारत मंडपम में होने वाले इमर्जिंग साइंस, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन कॉन्क्लेव (ईएसटीआईसी)-2026 के पूर्वावलोकन कार्यक्रम में उपलब्धियों और आगामी कॉन्क्लेव में आईसीएआर की भागीदारी की रूपरेखा साझा की। उन्होंने फसल विज्ञान, पशु विज्ञान, मृदा प्रबंधन, कृषि यंत्रीकरण और खाद्य प्रणालियों में हो रहे तकनीकी विकास की जानकारी दी।
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उन्होंने बताया कि कृषि में उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और पोषक तत्वों के मामले में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लक्ष्य के तहत ग्रीन अमोनिया तकनीक पर काम किया जा रहा है। सौर ऊर्जा से हाइड्रोजन तैयार करने और उसके माध्यम से अमोनिया बनाने की तकनीक पर अनुसंधान हो रहा है। इस सीजन में छह राज्यों के 10 हजार एकड़ क्षेत्र में इसका प्रदर्शन किया जा रहा है। तकनीक का उद्देश्य खेती में पोषक तत्वों की उपलब्धता के नए विकल्पों पर काम करना है। हालांकि, इसके परिणाम और व्यावहारिक उपयोगिता का आकलन प्रदर्शन के नतीजों के आधार पर किया जाना होगा।
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एक साल में फील्ड फसलों की 386 से अधिक किस्में जारी
डॉ. जाट ने बताया कि आईसीएआर ने एक वर्ष में फील्ड फसलों की 386 से अधिक किस्में जारी की हैं। 94 प्रतिशत किस्में जलवायु अनुकूल हैं, जबकि 29 किस्में बायोफोर्टिफाइड हैं। किस्मों को किसानों तक पहुंचाने के लिए प्रजनक बीज उत्पादन कर रहे हैं। बागवानी क्षेत्र में भी 57 फसलों की 117 उन्नत किस्में विकसित की गईं।
पशु रोगों से निपटने और उत्पादकता बढ़ाने पर भी काम
आईसीएआर की ओर से पशु विज्ञान के क्षेत्र में जीनोमिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और प्रिसिजन लाइवस्टॉक फार्मिंग जैसी तकनीकों पर काम किया जा रहा है। लंपी स्किन डिजीज के दौरान स्वदेशी वैक्सीन विकसित करने के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि खुरपका-मुंहपका रोग के मामलों में पिछले वर्ष 85 प्रतिशत तक कमी दर्ज हुई। पशु रोगों की समय रहते पहचान और पूर्वानुमान के लिए भी मॉडल विकसित कर रहे हैं।
प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के तहत मृदा स्वास्थ्य, जलभराव, जल निकासी और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों पर शोध किया जा रहा है। राजस्थान, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में खारे पानी और लवणीय भूमि वाले क्षेत्रों में झींगा पालन का विस्तार किया गया है।
ईएसटीआईसी-2026 में एनडीआरआई की टेस्टिंग किट भी होगी शामिल
ईएसटीआईसी-2026 में कृषि के लिए एग्री-टेक, फूड सिस्टम एंड न्यूट्रिशन को प्रमुख विषय के रूप में रखा गया है। कॉन्क्लेव में दुनिया की पहली जीनोम एडिटेड धान की दो किस्मों, अरहर के रेफरेंस जीनोम और कीट प्रतिरोध से जुड़े शोध सहित कई वैज्ञानिक उपलब्धियों को प्रदर्शित किया जाएगा।
करनाल की एनडीआरआई की ओर से विकसित दूध में मिलावट की तत्काल जांच करने वाली रैपिड टेस्टिंग किट भी प्रदर्शनी में शामिल होगी। इसके अलावा, आईसीएआर और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद की संयुक्त पहल सेहत के तहत कृषि, खाद्य और स्वास्थ्य के बीच संबंधों पर जोर दिया जाएगा। कॉन्क्लेव में 12 व्यापक विषयगत क्षेत्रों पर चर्चा होगी और विभिन्न विभागों के वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, युवा शोधकर्ता तथा डीप-टेक स्टार्टअप हिस्सा लेंगे।