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किसानों को लेकर गरमाई सियासत

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 17 Sep 2020 02:33 AM IST
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politics heated up about farmers
देव शर्मा
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केंद्र सरकार द्वारा लागू अशेंसियल कमोडिटी एक्ट, कांट्रेक्ट फार्मिंग व मंडियों के बाहर शुल्क मुक्त फसल खरीद जैसे अध्यादेशों के विरोध और समर्थन को लेकर सियासत गरमा गई है। कांग्रेस, जहां एक ओर किसान संगठनों, आढ़तियों आदि को जोड़कर केंद्र व हरियाणा की भाजपा की अगुवाई वाली सरकार को घेरने में जुट गई हैं तो भाजपा-जजपा भी परदे के पीछे से इन अध्यादेशों के समर्थन में उतर आई है। हर किसी को किसानों की हमदर्दी चाहिए। दोनों ही प्रमुख पार्टियों की राजनीतिक स्क्रिप्ट में किसान इन दिनों हीरो है। हालांकि राजनीतिक बन चुकी इस लड़ाई के बीच मंडियों में किसानों की फसलों को औने पौने दामों पर खरीद जैसे वास्तविक मुद्दे कहीं खो गए हैं। जिन्हें ना तो कांग्रेस सही तरीके से उठा पा रही है और ना ही किसान संगठन।

केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए तीन अध्यादेशों को कांग्रेस ने मुद्दा बना लिया है। इसमें मंडी के बाहर टैक्स फ्री खरीद के कारण आढ़तियों को यह डर सता रहा है कि यदि बाहर खरीद होने लगी तो मंडियों में अनाज कैसे आएगा। ऐसी स्थिति में उनके कारोबार का क्या होगा। दूसरी बात बड़ी संख्या में आढ़ती, राइस मिलर्स भी हैं, इनमें अधिकांश सीएमआर चावल का काम करते हैं। 15 से 30 सितंबर का पखवाड़ा आढ़तियों, राइस मिलर्स के लिए स्वर्णिम पखवाड़ा होता है, क्योंकि इस समय महीनधार भरपूर मात्रा में मंडियों में पहुंचता है लेकिन सरकारी खरीद नहीं होती। एमएसपी से कम पर किसान का धान खरीदकर भंडारित कर लिया जाता है, जिसे बाद में एमएसपी रेट पर बेचकर बड़ा मुनाफा कमाया जाता है। या फिर इसी धान को सीएमआर चावल के लिए प्रयोग किया जाता है। सभी मुनाफे में रहते हैं लेकिन सबसे बड़े घाटे में यदि कोई रहता है तो वह है किसान। कांग्रेस हो या फिर किसान संगठन, भाजपा हो या फिर जजपा, 15 सितंबर से सरकारी धान खरीद या फिर किसान को मंडी से बाहर या अंदर, एमएसपी के रेट दिलाना किसी का भी मुख्य मुद्दा नहीं है। कांग्रेस, आढ़तियों व किसान संगठनों के एजेंडे में तीन अध्यादेशों की वापसी मुख्य मुद्दा है। अब पिपली में किसानों पर लाठी चार्ज का मुद्दा और जुड़ गया है। पहले तो किसान संगठनों ने अपने स्वर मुखर किए, आढ़तियों ने उनके स्वर में स्वर मिलाया। पिपली रैली के बाद अब सभी जिला मुख्यालयों पर धरना शुरू कर दिया गया है, 18 सितंबर से आढ़तियों ने मंडियों में ह़डताल करने तो भाकियू ने 20 सितंबर को हरियाणा बंद करने का आह्वान कर दिया है। पहले तो कांग्रेस परदे के पीछे थी लेकिन अब खुलकर समर्थन में आ गई है। जिसे देकर भाजपा को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ी है। भाजपा ने भी खुद को परदे के पीछे रखकर समर्थक किसानों को कांग्रेस के जवाब में उतार दिया है। मार्केट कमेटियों को पूर्व चेयरमैन व अन्य भाजपा नेताओं को किसानों के सीधे संपर्क के लिए उतार दिया है। कुल मिलाकर सियासत की शतरंज में किसान एक बार मोहरा बनता जा रहा है।
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