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गंभीर अपराधों में पंचायत के फैसले मान्य नहीं
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हाईप्रोफाइल दुष्कर्म के मामले में पुलिस की ओर से पंचायत के जिस फैसले और शपथपत्र को दंपती के खिलाफ आधार बनाया जा रहा है। उसको लेकर कानूनी राय कुछ अलग है। वकीलों का मानना है कि दुष्कर्म, हत्या या अन्य गंभीर अपराधों को लेकर की जाने वाली पंचायतों के फैसले अदालतों में मान्य नहीं होते हैं। समझौतों की गुंजाइश जैसे आपराधिक मामलों में प्रशासनिक और न्यायिक स्तर मीडिएशन सेंटर की व्यवस्था की गई है।
- जिला बार संघ के पूर्व प्रधान चांदबीर मंढाण ने कहा कि छोटे अपराध के मामलों में पंचायती फैसला मान लिया जाता है लेकिन महिला के विरुद्ध अपराध, 302, 307 व 376 पोक्सो एक्ट जैसे मामलों में पंचायती स्तर के समझौते या फैसलों को अदालत नहीं मानती। समझौते होने के मामले में केस की दिशा मोड़ दी जाती है। किंतू बयान कोर्ट में ही देने पड़ते हैं। यदि कोई ब्लैकमेल होता है तो उसकी भी कोई वजह हो सकती है।
-वेद कश्यप एडवोकेट का मानना है कि पंचायती फैसले या समझौते को कानून नहीं मानता। पंचायती फैसले सामाजिक तौर पर एक-दूसरे की मान लेते हैं। उसी आधार पर पंचायत का फैसला होता है। जबकि न्यायालय में कागजों व गवाहों के आधार पर फैसले होते हैं। यदि पुलिस की भूमिका संदेहास्पद हो तो उच्च स्तरीय कमेटी बने या दूसरे राज्य के अधिकारियों को जांच देनी चाहिये। राष्ट्रीय महिला आयोग को खुद संज्ञान लेना चाहिये।
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-एडवोकेट राजेश कश्यप का कहना है कि कोई महिला सामूहिक दुष्कर्म के आरोप लगाए और आरोपी पक्ष पंचायत करके मामले को निपटाने के लिए पैसे देने का आरोप लगाता है, वह गलत है। आरोपी पक्ष को शुरू से ही कानून से चलना चाहिये। उसे पंचायत की जरूरत ही नहीं। कुछ ना कुछ हुआ तभी पंचायत की नौबत आई होगी।
कानून के हिसाब से यदि मामला दर्ज हुआ तो जांच के बाद आरोपी गिरफ्तार किया जाता है। कई मामलों में पुलिस आरोपी को जल्द गिरफ्तार कर लेती है तो कई में ढील रहती है।
-अभय सिंह साहू एडवोकेट का कहना है कि पंचायत के फैसले को कोर्ट में आधार नहीं माना जाता। पुलिस की जांच में भी पंचायत के समझौते को नहीं माना जाना चाहिये। लोगों में कानून के प्रति जारूकता की कमी है अन्यथा समझौते के लिए पंचायत नहीं करनी पड़ती। पंचायत का लिखित दस्तावेज यदि बना है तो उसे सिर्फ ट्रायल में एवीडेंस के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं। पंचायत के निर्णय के कोर्ट में कोई मायने नहीं। उसे केवल प्रस्तुत ही किया जा सकता है।
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- जिला बार संघ के पूर्व प्रधान चांदबीर मंढाण ने कहा कि छोटे अपराध के मामलों में पंचायती फैसला मान लिया जाता है लेकिन महिला के विरुद्ध अपराध, 302, 307 व 376 पोक्सो एक्ट जैसे मामलों में पंचायती स्तर के समझौते या फैसलों को अदालत नहीं मानती। समझौते होने के मामले में केस की दिशा मोड़ दी जाती है। किंतू बयान कोर्ट में ही देने पड़ते हैं। यदि कोई ब्लैकमेल होता है तो उसकी भी कोई वजह हो सकती है।
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-वेद कश्यप एडवोकेट का मानना है कि पंचायती फैसले या समझौते को कानून नहीं मानता। पंचायती फैसले सामाजिक तौर पर एक-दूसरे की मान लेते हैं। उसी आधार पर पंचायत का फैसला होता है। जबकि न्यायालय में कागजों व गवाहों के आधार पर फैसले होते हैं। यदि पुलिस की भूमिका संदेहास्पद हो तो उच्च स्तरीय कमेटी बने या दूसरे राज्य के अधिकारियों को जांच देनी चाहिये। राष्ट्रीय महिला आयोग को खुद संज्ञान लेना चाहिये।
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-एडवोकेट राजेश कश्यप का कहना है कि कोई महिला सामूहिक दुष्कर्म के आरोप लगाए और आरोपी पक्ष पंचायत करके मामले को निपटाने के लिए पैसे देने का आरोप लगाता है, वह गलत है। आरोपी पक्ष को शुरू से ही कानून से चलना चाहिये। उसे पंचायत की जरूरत ही नहीं। कुछ ना कुछ हुआ तभी पंचायत की नौबत आई होगी।
कानून के हिसाब से यदि मामला दर्ज हुआ तो जांच के बाद आरोपी गिरफ्तार किया जाता है। कई मामलों में पुलिस आरोपी को जल्द गिरफ्तार कर लेती है तो कई में ढील रहती है।
-अभय सिंह साहू एडवोकेट का कहना है कि पंचायत के फैसले को कोर्ट में आधार नहीं माना जाता। पुलिस की जांच में भी पंचायत के समझौते को नहीं माना जाना चाहिये। लोगों में कानून के प्रति जारूकता की कमी है अन्यथा समझौते के लिए पंचायत नहीं करनी पड़ती। पंचायत का लिखित दस्तावेज यदि बना है तो उसे सिर्फ ट्रायल में एवीडेंस के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं। पंचायत के निर्णय के कोर्ट में कोई मायने नहीं। उसे केवल प्रस्तुत ही किया जा सकता है।