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अब कट्टे में नहीं शीशी में मिलेगा नैनो यूरिया
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इफको का एक शोध कृषि क्षेत्र में क्रांति ला सकता है क्योंकि विश्व में पहली बार यूरिया खाद को तरल पदार्थ के रूप में लांच करने की तैयारी है। जिससे अब किसानों को यूरिया 45 किग्रा के कट्टों के बजाय 500 मिली की शीशी में भी उपलब्ध होगी। इसे यूरिया के विकल्प के रूप में विकसित किया जा रहा है। खास बात यह है कि इससे यूरिया की कीमत में भारी कमी आएगी, साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति और भूमिगत जल स्तर को होने वाला नुकसान भी रोका जा सकेगा। क्योंकि नैनो यूरिया का फसल पर स्प्रे किया जाएगा। नैनो यूरिया का उत्पादन जून में शुरू हो जाएगा। इस पर विस्तृत चर्चा के लिए इफको 22 मई की सुबह 11 बजे वेबिनार भी करने जा रहा है।
भारत में मिल चुकी मान्यता
इफको करनाल के प्रबंधक डा. निरंजन सिंह ने बताया कि शोध तो अमेरिका में भी चल रहा है, लेकिन भारत में इफको ने इसे तैयार कर लिया है और भारत सरकार ने नैनो यूरिया को खाद के रूप में मान्यता प्रदान कर दी है। इफको यूपी में आंवला, गुजरात आदि जहां भी इफको खाद उत्पादन प्लांट हैं, इन सभी में भी नैनो यूरिया का उत्पादन 15 जून से शुरू कर देगा। इसके बाद नैनो यूरिया को जून के महीने में ही किसानों के लिए लांच करने की तैयारी है। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति, भूमिगत जल स्तर को बड़ा फायदा तो होगा ही, इसकी वास्तविक कीमत भी यूरिया के कट्टे से करीब आधी है। इसका ट्रांसपोर्टेशन भी बेहद आसान होगा। किसानों को भी खेतों तक ले जाने में आसानी होगी। जितना काम 45 किग्रा का कट्टा करता है, उतना ही काम 500 मिली की शीशी वाली नैनो यूरिया करेगी।
पर्यावरण, उर्वरा शक्ति, भूमिगत जल को नहीं पहुंचेगा नुकसान
इफको प्रबंधक ने बताया कि किसानों द्वारा यूरिया का प्रयोग अत्यधिक बढ़ गया है। अभी तक जो यूरिया खेतों में लगाई जाती है, वह पानी में घुलकर जमीन के अंदर जाती है, जिससे उर्वरा शक्ति प्रभावित होती। पानी के साथ भूमिगत जलस्तर में मिलकर भी जल को भी कहीं न कहीं प्रभावित करती है। क्योंकि खेतों में लगाई जाने वाली यूरिया का पौधा सिर्फ 30 प्रतिशत उपयोग कर पाता है। शेष जमीन के अंदर चली जाती है या फिर अमोनिया में परिवर्तित होकर उड़ जाती है, जो वायुमंडल को भी नुकसान पहुंचाती है। लेकिन अब द्रव्य पदार्थ के रूप में नैनो यूरिया का स्प्रे किया जाएगा, जो पत्तों के छिद्रों से पौधा अपने अंदर लेगा। जिससे पौधा खाद का 90 प्रतिशत उपयोग कर पाएगा। अभी तक इफको ने नैनो यूरिया की कीमत का खुलासा नहीं किया है लेकिन प्रबंधक ने बताया कि अभी किसानों को 45 किग्रा का कट्टा 266.50 रुपये का मिलता है, इस पर करीब इतनी ही सरकारी सब्सिडी भी होती है। लेकिन नैनो यूरिया की बिना सब्सिडी कीमत किसानों द्वारा दी जा रही कीमत से भी कम होती। यदि सरकार सब्सिडी न भी दे तो भी किसानों को महंगा नहीं पड़ेगा यदि सरकार सब्सिडी जारी रखती है तो यह बेहद सस्ता हो जाएगा।
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खाड़ी देशों से निर्भरता होगी खत्म
यूरिया को बनाने में नेचुरल गैस का इस्तेमाल किया जाता है। जिसके लिए हमें खाड़ी देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। पेट्रोलियम प्रोडक्ट के कारण डालरों में भुगतान करना होता है लेकिन नैनो यूरिया के उत्पादन में हमें इसकी आवश्यकता नहीं होगी।
ट्रांसपोर्टेशन होगा बेहद आसान
नैनो यूरिया को लाना-ले जाना बेहद आसान हो जाएगा। जो यूरिया कई ट्रकों में लाई जाती थी, उसे एक ट्रक में ही लाया जा सकेगा। किसानों को खाद ट्रैक्टर ट्रालियों से लानी और खेतों पर ले जानी होती है लेकिन अब किसान एक थैले में ही कई एकड़ की खाद ले जा सकेगा। इससे फसलोत्पादन लागत में बड़ी कमी आएगी।
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भारत में मिल चुकी मान्यता
इफको करनाल के प्रबंधक डा. निरंजन सिंह ने बताया कि शोध तो अमेरिका में भी चल रहा है, लेकिन भारत में इफको ने इसे तैयार कर लिया है और भारत सरकार ने नैनो यूरिया को खाद के रूप में मान्यता प्रदान कर दी है। इफको यूपी में आंवला, गुजरात आदि जहां भी इफको खाद उत्पादन प्लांट हैं, इन सभी में भी नैनो यूरिया का उत्पादन 15 जून से शुरू कर देगा। इसके बाद नैनो यूरिया को जून के महीने में ही किसानों के लिए लांच करने की तैयारी है। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति, भूमिगत जल स्तर को बड़ा फायदा तो होगा ही, इसकी वास्तविक कीमत भी यूरिया के कट्टे से करीब आधी है। इसका ट्रांसपोर्टेशन भी बेहद आसान होगा। किसानों को भी खेतों तक ले जाने में आसानी होगी। जितना काम 45 किग्रा का कट्टा करता है, उतना ही काम 500 मिली की शीशी वाली नैनो यूरिया करेगी।
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पर्यावरण, उर्वरा शक्ति, भूमिगत जल को नहीं पहुंचेगा नुकसान
इफको प्रबंधक ने बताया कि किसानों द्वारा यूरिया का प्रयोग अत्यधिक बढ़ गया है। अभी तक जो यूरिया खेतों में लगाई जाती है, वह पानी में घुलकर जमीन के अंदर जाती है, जिससे उर्वरा शक्ति प्रभावित होती। पानी के साथ भूमिगत जलस्तर में मिलकर भी जल को भी कहीं न कहीं प्रभावित करती है। क्योंकि खेतों में लगाई जाने वाली यूरिया का पौधा सिर्फ 30 प्रतिशत उपयोग कर पाता है। शेष जमीन के अंदर चली जाती है या फिर अमोनिया में परिवर्तित होकर उड़ जाती है, जो वायुमंडल को भी नुकसान पहुंचाती है। लेकिन अब द्रव्य पदार्थ के रूप में नैनो यूरिया का स्प्रे किया जाएगा, जो पत्तों के छिद्रों से पौधा अपने अंदर लेगा। जिससे पौधा खाद का 90 प्रतिशत उपयोग कर पाएगा। अभी तक इफको ने नैनो यूरिया की कीमत का खुलासा नहीं किया है लेकिन प्रबंधक ने बताया कि अभी किसानों को 45 किग्रा का कट्टा 266.50 रुपये का मिलता है, इस पर करीब इतनी ही सरकारी सब्सिडी भी होती है। लेकिन नैनो यूरिया की बिना सब्सिडी कीमत किसानों द्वारा दी जा रही कीमत से भी कम होती। यदि सरकार सब्सिडी न भी दे तो भी किसानों को महंगा नहीं पड़ेगा यदि सरकार सब्सिडी जारी रखती है तो यह बेहद सस्ता हो जाएगा।
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खाड़ी देशों से निर्भरता होगी खत्म
यूरिया को बनाने में नेचुरल गैस का इस्तेमाल किया जाता है। जिसके लिए हमें खाड़ी देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। पेट्रोलियम प्रोडक्ट के कारण डालरों में भुगतान करना होता है लेकिन नैनो यूरिया के उत्पादन में हमें इसकी आवश्यकता नहीं होगी।
ट्रांसपोर्टेशन होगा बेहद आसान
नैनो यूरिया को लाना-ले जाना बेहद आसान हो जाएगा। जो यूरिया कई ट्रकों में लाई जाती थी, उसे एक ट्रक में ही लाया जा सकेगा। किसानों को खाद ट्रैक्टर ट्रालियों से लानी और खेतों पर ले जानी होती है लेकिन अब किसान एक थैले में ही कई एकड़ की खाद ले जा सकेगा। इससे फसलोत्पादन लागत में बड़ी कमी आएगी।