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गेहूं की चार नई किस्में चिह्नित, मंजूरी के लिए केंद्र को भेजा प्रस्ताव
करनाल
Updated Thu, 24 Oct 2013 11:52 PM IST
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देशभर के उत्तर-पश्चिमी जोन के लिए गेहूं की चार नई किस्मों को चिह्नित किया गया है। चारों किस्मों को उत्तर प्रदेश के कानपुर स्थित चंद्रशेखर आजाद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी एंड टेक्नोलॉजी संस्थान में सितंबर माह में आयोजित वर्कशाप में चिह्नित किया गया है।
चारों किस्मों को स्वीकृति के लिए दिल्ली में सेंट्रल वैरायटी रिलीज कमेटी को भेजा जा चुका है। चारों किस्मों में दो समय पर बिजाई वाली हैं तो दो किस्में देरी से बोई जाने वाली हैं। इन चारों किस्मों में पीला रतवा को रोकने की क्षमता अधिक है। अगले वर्ष होने वाली बिजाई से पहले यह वैरायटी रिलीज हो जाएगी।
कानपुर में चिह्नित की जाने वाली किस्मों में दिल्ली की आईएआरआई की एचडी-3086 है तो करनाल के डीडब्ल्यूआर की डीबीडब्ल्यू-88 शामिल हैं। ये दोनों किस्में सिंचाई के क्षेत्र में समय पर बिजाई के लिए हैं। इन दोनों किस्मों में उत्पादन क्षमता तो अन्य किस्मों के बराबर है लेकिन पीला रतवा से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है।
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इन किस्मों की बिजाई का समय 25 अक्तूबर से 15 नवंबर तक है। देरी से बोई जाने वाली किस्मों में डीडब्ल्यूआर की डीबीडब्ल्यू -90 और हिसार स्थित चौ. चरणसिंह कृषि विश्वविद्यालय की डब्ल्यूएच-1124 है। इन दोनों किस्मों में भी पीला रतवा रोकने की प्रतिरोधक क्षमता अन्य वैरायटियों से अधिक है।
इन दोनों वैरायटियों में 4.3 टन प्रति हेक्टेयर से 4.5 टन प्रति हेक्टेयर तक पैदावार होती है। इन दोनों किस्मों की बिजाई को समय 15 नवंबर के बाद 20 दिसंबर तक उचित माना गया है। चारों वैरायटियां पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर व राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भाग के लिए चिह्नित की गई हैं। कानपुर स्थित चंद्रशेखर आजाद एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय एंड टेक्नोलॉजी संस्थान में आयोजित एक सितंबर से 4 सितंबर तक वर्कशाप में इनको चिह्नित किया गया है।
किसानों को बनाएंगे आधुनिक
अगले वर्ष गेहूं की बिजाई के सीजन से पहले ही सरकार की ओर से किया जाने वाले नोटिफिकेशन का पता चल जाता है। गेहूं वैज्ञानिक ऐसी वैरायटी तैयार करते हैं, जिससे पीला रतवा कम आए। प्रत्येक किसानों को कोई ऐसी किस्म नहीं लगानी चाहिए, जिसमें पीला रतवा पहले ही आ चुका हो।
पांच किलो मीटर की परिधि में प्रत्येक किसान ऐसी किस्मों को बीजना छोड़ दें और नई किस्म वैज्ञानिकों के अनुसार लगाएं तो देशभर के किसानों को तबाही से बचाया जा सकता है। इन चारों किस्मों का बीज तैयार करने की दिशा में काम चल रहा है। वे लोग केवल ब्रीडर सीड तैयार करते हैं।
सरप्लस होने पर किसान को जागरूक करने के लिए बीज बांट देते हैं। बहुत गर्मी हो जाए तो गेहूं की तमाम फसलों में पोटेशियम क्लोराइड या कैल्शियम क्लोराइड का स्प्रे किया जाना चाहिए।
डॉ. इंदू शर्मा, निदेशक, गेहूं निदेशालय अनुसंधान, करनाल
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चारों किस्मों को स्वीकृति के लिए दिल्ली में सेंट्रल वैरायटी रिलीज कमेटी को भेजा जा चुका है। चारों किस्मों में दो समय पर बिजाई वाली हैं तो दो किस्में देरी से बोई जाने वाली हैं। इन चारों किस्मों में पीला रतवा को रोकने की क्षमता अधिक है। अगले वर्ष होने वाली बिजाई से पहले यह वैरायटी रिलीज हो जाएगी।
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कानपुर में चिह्नित की जाने वाली किस्मों में दिल्ली की आईएआरआई की एचडी-3086 है तो करनाल के डीडब्ल्यूआर की डीबीडब्ल्यू-88 शामिल हैं। ये दोनों किस्में सिंचाई के क्षेत्र में समय पर बिजाई के लिए हैं। इन दोनों किस्मों में उत्पादन क्षमता तो अन्य किस्मों के बराबर है लेकिन पीला रतवा से लड़ने की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है।
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इन किस्मों की बिजाई का समय 25 अक्तूबर से 15 नवंबर तक है। देरी से बोई जाने वाली किस्मों में डीडब्ल्यूआर की डीबीडब्ल्यू -90 और हिसार स्थित चौ. चरणसिंह कृषि विश्वविद्यालय की डब्ल्यूएच-1124 है। इन दोनों किस्मों में भी पीला रतवा रोकने की प्रतिरोधक क्षमता अन्य वैरायटियों से अधिक है।
इन दोनों वैरायटियों में 4.3 टन प्रति हेक्टेयर से 4.5 टन प्रति हेक्टेयर तक पैदावार होती है। इन दोनों किस्मों की बिजाई को समय 15 नवंबर के बाद 20 दिसंबर तक उचित माना गया है। चारों वैरायटियां पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर व राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भाग के लिए चिह्नित की गई हैं। कानपुर स्थित चंद्रशेखर आजाद एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय एंड टेक्नोलॉजी संस्थान में आयोजित एक सितंबर से 4 सितंबर तक वर्कशाप में इनको चिह्नित किया गया है।
किसानों को बनाएंगे आधुनिक
अगले वर्ष गेहूं की बिजाई के सीजन से पहले ही सरकार की ओर से किया जाने वाले नोटिफिकेशन का पता चल जाता है। गेहूं वैज्ञानिक ऐसी वैरायटी तैयार करते हैं, जिससे पीला रतवा कम आए। प्रत्येक किसानों को कोई ऐसी किस्म नहीं लगानी चाहिए, जिसमें पीला रतवा पहले ही आ चुका हो।
पांच किलो मीटर की परिधि में प्रत्येक किसान ऐसी किस्मों को बीजना छोड़ दें और नई किस्म वैज्ञानिकों के अनुसार लगाएं तो देशभर के किसानों को तबाही से बचाया जा सकता है। इन चारों किस्मों का बीज तैयार करने की दिशा में काम चल रहा है। वे लोग केवल ब्रीडर सीड तैयार करते हैं।
सरप्लस होने पर किसान को जागरूक करने के लिए बीज बांट देते हैं। बहुत गर्मी हो जाए तो गेहूं की तमाम फसलों में पोटेशियम क्लोराइड या कैल्शियम क्लोराइड का स्प्रे किया जाना चाहिए।
डॉ. इंदू शर्मा, निदेशक, गेहूं निदेशालय अनुसंधान, करनाल