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आईवीएफ ओवम पिकअप तकनीक श्वेत क्रांति में जोड़ेगी नया अध्याय
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। विश्व आईवीएफ दिवस पर सोमवार को राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) के निदेशक डॉ. मनमोहन सिंह चौहान ने कहा कि आईवीएफ ओवम पिकअप तकनीक देश में श्वेत क्रांति में नया अध्याय जोड़ने जा रही है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत 2023-24 का लक्ष्य दिया है कि देश में आईवीएफ ओवम पिकअप तकनीक से देसी नस्ल की दुधारू गायों के 3000 सांड़ बनाने हैं। ये वो सांड़ होंगे जिनकी मां की 10 किलो से अधिक दूध देने की क्षमता है। इन सांड़ों को तैयार कर उनके सीमन से कृत्रिम गर्भाधान कराया जाएगा। टेस्ट ट्यूब बेबी से देसी नस्ल की गाय साहिवाल, गीर व थारपारकर आदि की उत्पादकता और दुग्ध उत्पादन बढ़ाना है। केंद्र सरकार ने देश में 30 केंद्र बनाए हैं और प्रत्येक केंद्र पर 100 सांड़ तैयार करने हैं। इसके लिए केंद्र सरकार के पशुपालन विभाग ने करीब 200 करोड़ रुपये बजट का प्रावधान किया है। एनडीआरआई की ओर से देश के कई पशु चिकित्सा विशेषज्ञों को आईवीएफ कॉफ तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया है। आगे भी प्रशिक्षण कार्यक्रम जारी रहेंगे।
उन्होंने कहा कि 31 वर्ष पूर्व संस्थान में इस तकनीक के विकास पर काम शुरू हुआ था। प्रथम चरण में इस तकनीक से बकरी का भ्रूण तैयार करने का प्रयास किया था। 1991 में संस्थान में उन्होंने इस तकनीक पर प्रथम शोध पत्र प्रकाशित किया था। संस्थान सफलता की ओर बढ़ता गया और बाद में भैंस पर तकनीक का इस्तेमाल कर भ्रूण से आईवीएफ कॉफ तैयार किए। 1996-97 में बकरी का बच्चा पैदा किया। इसी तकनीक की मदद से बाद में क्लोनिंग में सफलता मिली। सात मार्च 2012 को संस्थान में होली के दिन आईवीएफ तकनीक से साहिवाल नस्ल गाय की पहली बछड़ी पैदा हुई थी। बछड़ी का नाम होली रखा गया। आईवीएफ तकनीक से एक गाय से वर्ष में 100 बच्चे पैदा कर सकते है। राजस्थान की कांक्रेज नस्ल की गाय जिसमें रोग प्रतिरोधि क्षमता है लेकिन दूध कम देती है, उसका दूध बढ़ाने पर अनुसंधान किया जाएगा। गौशालाओं के स्वस्थ पशुओं को इस तकनीक के लिए इस्तेमाल कर काम करेंगे।
प्रो. एडवर्ड को झेलना पड़ा था समाज का विरोध
डॉ. चौहान ने बताया कि यूरोप के पशु चिकित्सा वैज्ञानिक प्रो. एडवर्ड ने 1978 में मेडिकल डाक्टर से मिलकर मानव में प्रथम टैस्ट ट्यूब बेबी बनाया था। जिस महिला में बांझपन की दिक्कत थी उसके अंडे को टैस्ट ट्यूब में निषेचित किया और भ्रूण तैयार कर ‘आया’ की बच्चेदानी में स्थानांतरित किया। विश्व की प्रथम बेबी लुइस ब्राउन थी जो 25 जुलाई 1978 को पैदा हुई। तब प्रो. एडवर्ड की इस तकनीक का समाज में कुछ लोगों ने कड़ा विरोध किया और उन्हें छह-सात वर्ष तक भूमिगत रहना पड़ा था। उन सात वर्षों में तकनीक का प्रसार हो गया और करीब 60 बच्चे पैदा होने से निसंतान लोगों के घरों में खुशियां आई। अब तक दुनिया में करीब 12 लाख बच्चे इस तकनीक से पैदा हो चुके हैं। प्रो. एडवर्ड को 32 वर्ष बाद 2010 में नोबल पुरस्कार मिला था।
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क्लोनिंग तकनीक के ट्रायल के लिए हरिद्वार क्षेत्र चुना
करनाल। एनडीआरआई करनाल की ओर से विकसित हैंड गाइडेड क्लोनिंग तकनीक से तैयार मुर्राह भैंस के क्लोन पर हरिद्वार क्षेत्र में तीन वर्षीय परीक्षण परियोजना पर काम शुरू कर दिया है। संस्थान ने उच्च गुणवत्ता वाली भैंस के सैल से जो क्लोन झोटे तैयार किए हैं उनके सीमन से कृत्रिम गर्भाधान कराएंगे। जो बच्चे पैदा होंगे उनकी दूध देने की क्षमता जांची जाएगी। शुरूआती चरण में संस्थान की ओर से पशुपालकों को एक से डेढ़ वर्ष आयु की 50 मुर्राह कटड़ियां मुफ्त दी जाएंगी। जब वे बड़ी होकर मद में आएंगी तो उनके कृत्रिम गर्भाधान के लिए एनडीआरआई से क्लोन झोटे का सीमन भेजा जाएगा। पशुपालकों को मिनरल मिक्सचर सहित कई मदद दी जाएंगी। परियोजना के तहत गहन अध्ययन किया जाएगा। परियोजना से उस क्षेत्र में नस्ल सुधार होगा और लोगों की आजीविका बनेगी।
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करनाल। विश्व आईवीएफ दिवस पर सोमवार को राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई) के निदेशक डॉ. मनमोहन सिंह चौहान ने कहा कि आईवीएफ ओवम पिकअप तकनीक देश में श्वेत क्रांति में नया अध्याय जोड़ने जा रही है। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत 2023-24 का लक्ष्य दिया है कि देश में आईवीएफ ओवम पिकअप तकनीक से देसी नस्ल की दुधारू गायों के 3000 सांड़ बनाने हैं। ये वो सांड़ होंगे जिनकी मां की 10 किलो से अधिक दूध देने की क्षमता है। इन सांड़ों को तैयार कर उनके सीमन से कृत्रिम गर्भाधान कराया जाएगा। टेस्ट ट्यूब बेबी से देसी नस्ल की गाय साहिवाल, गीर व थारपारकर आदि की उत्पादकता और दुग्ध उत्पादन बढ़ाना है। केंद्र सरकार ने देश में 30 केंद्र बनाए हैं और प्रत्येक केंद्र पर 100 सांड़ तैयार करने हैं। इसके लिए केंद्र सरकार के पशुपालन विभाग ने करीब 200 करोड़ रुपये बजट का प्रावधान किया है। एनडीआरआई की ओर से देश के कई पशु चिकित्सा विशेषज्ञों को आईवीएफ कॉफ तैयार करने का प्रशिक्षण दिया गया है। आगे भी प्रशिक्षण कार्यक्रम जारी रहेंगे।
उन्होंने कहा कि 31 वर्ष पूर्व संस्थान में इस तकनीक के विकास पर काम शुरू हुआ था। प्रथम चरण में इस तकनीक से बकरी का भ्रूण तैयार करने का प्रयास किया था। 1991 में संस्थान में उन्होंने इस तकनीक पर प्रथम शोध पत्र प्रकाशित किया था। संस्थान सफलता की ओर बढ़ता गया और बाद में भैंस पर तकनीक का इस्तेमाल कर भ्रूण से आईवीएफ कॉफ तैयार किए। 1996-97 में बकरी का बच्चा पैदा किया। इसी तकनीक की मदद से बाद में क्लोनिंग में सफलता मिली। सात मार्च 2012 को संस्थान में होली के दिन आईवीएफ तकनीक से साहिवाल नस्ल गाय की पहली बछड़ी पैदा हुई थी। बछड़ी का नाम होली रखा गया। आईवीएफ तकनीक से एक गाय से वर्ष में 100 बच्चे पैदा कर सकते है। राजस्थान की कांक्रेज नस्ल की गाय जिसमें रोग प्रतिरोधि क्षमता है लेकिन दूध कम देती है, उसका दूध बढ़ाने पर अनुसंधान किया जाएगा। गौशालाओं के स्वस्थ पशुओं को इस तकनीक के लिए इस्तेमाल कर काम करेंगे।
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प्रो. एडवर्ड को झेलना पड़ा था समाज का विरोध
डॉ. चौहान ने बताया कि यूरोप के पशु चिकित्सा वैज्ञानिक प्रो. एडवर्ड ने 1978 में मेडिकल डाक्टर से मिलकर मानव में प्रथम टैस्ट ट्यूब बेबी बनाया था। जिस महिला में बांझपन की दिक्कत थी उसके अंडे को टैस्ट ट्यूब में निषेचित किया और भ्रूण तैयार कर ‘आया’ की बच्चेदानी में स्थानांतरित किया। विश्व की प्रथम बेबी लुइस ब्राउन थी जो 25 जुलाई 1978 को पैदा हुई। तब प्रो. एडवर्ड की इस तकनीक का समाज में कुछ लोगों ने कड़ा विरोध किया और उन्हें छह-सात वर्ष तक भूमिगत रहना पड़ा था। उन सात वर्षों में तकनीक का प्रसार हो गया और करीब 60 बच्चे पैदा होने से निसंतान लोगों के घरों में खुशियां आई। अब तक दुनिया में करीब 12 लाख बच्चे इस तकनीक से पैदा हो चुके हैं। प्रो. एडवर्ड को 32 वर्ष बाद 2010 में नोबल पुरस्कार मिला था।
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क्लोनिंग तकनीक के ट्रायल के लिए हरिद्वार क्षेत्र चुना
करनाल। एनडीआरआई करनाल की ओर से विकसित हैंड गाइडेड क्लोनिंग तकनीक से तैयार मुर्राह भैंस के क्लोन पर हरिद्वार क्षेत्र में तीन वर्षीय परीक्षण परियोजना पर काम शुरू कर दिया है। संस्थान ने उच्च गुणवत्ता वाली भैंस के सैल से जो क्लोन झोटे तैयार किए हैं उनके सीमन से कृत्रिम गर्भाधान कराएंगे। जो बच्चे पैदा होंगे उनकी दूध देने की क्षमता जांची जाएगी। शुरूआती चरण में संस्थान की ओर से पशुपालकों को एक से डेढ़ वर्ष आयु की 50 मुर्राह कटड़ियां मुफ्त दी जाएंगी। जब वे बड़ी होकर मद में आएंगी तो उनके कृत्रिम गर्भाधान के लिए एनडीआरआई से क्लोन झोटे का सीमन भेजा जाएगा। पशुपालकों को मिनरल मिक्सचर सहित कई मदद दी जाएंगी। परियोजना के तहत गहन अध्ययन किया जाएगा। परियोजना से उस क्षेत्र में नस्ल सुधार होगा और लोगों की आजीविका बनेगी।