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उद्योग : लॉकडाउन ने जड़ दिए थे ताले, मजदूरों को पड़ गए थे खाने के लाले
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जीटी बेल्ट के विभिन्न शहरों में ऐसे कई बड़े उद्योग हैं, जो देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी अपनी बड़ी पहचान रखते हैं। इनका सलाना टर्नओवर अरबों रुपये में है। इनमें अंबाला का साइंस उद्योग, मिक्सी उद्योग, थोक कपड़ा बाजार, यमुनानगर की प्लाईवुड इंडस्ट्री, मैटल इंडस्ट्री, पानीपत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री, कारपेट उद्योग, धागा, डाइंग उद्योग व करनाल की एग्रो उपकरण इंडस्ट्री मुख्य है। पहली बार ऐसा हुआ जब महामारी के बाद लॉकडाउन के साथ इन उद्योगों पर भी ताले लग गए। करीब 70 दिनों से अधिक समय तक इंडस्ट्री बंद रही और करोड़ों रुपये का फटका उद्यमियों को झेलना पड़ा। मगर उसका एक दूसरा बड़ा असर उन श्रमिकों व कर्मचारियों पर पड़ा जो इन उद्योगों में काम करते थे। उनका काम छूट गया। शुरूआत दौर में तो उद्यमियों ने उन्हें आधा वेतन व राशन दिया। लेकिन उद्योग पूरी तरह ठप होने की वजह से यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक आगे नहीं बढ़ पाया। मजबूरन शुरू हुआ इन उद्योगों में कार्यरत अधिकतर मजदूरों का ऐसा पलायन जिसने झकझोर कर रख दिया। इन उद्योगों को हुए नुकसान की अभी तक भरपाई नहीं हुई और न ही पलायन कर चुके सभी मजदूर अभी वापस लौटे हैं। लड़खड़ाई इंडस्ट्री धीरे-धीरे संभलने की कोशिश कर रही है।
विशाल बतरा प्रधान कपड़ा मार्केट
कपड़ा इंडस्ट्री :12 हजार श्रमिकों की रोजी-रोटी पर था संकट
अंबाला। एशिया की सबसे बड़ी थोक कपड़ा मार्केट लॉकडाउन में पूरी तरह से बंद रही। यहां करीब 1100 दुकानें हैं। इनमें करीब 12000 कर्मचारी कार्यरत हैं और सालाना टर्न ओवर 2000 करोड़ से ज्यादा का है। लेकिन लॉकडाउन में हालात यह हो गए थे कि कारोबारियों को बैंकों की किस्तें भरनी मुश्किल हो गई। लिहाजा कपड़ा मार्केट में कार्यरत कमिज़्यों को कई माह तक सिर्फ 30 से लेकर 50 प्रतिशत तक वेतन दिया गया। इस तरह इन सभी की रोजी-रोटी के लाले पड़ गए थे। कपड़ा मार्केट होलसेल एसोसिएशन के प्रधान विशाल बतरा के अनुसार लॉकडाउन के बाद से अभी कारोबार धीरे-धीरे पटरी पर आ रहा है। लेकिन अब फिर हालात बिगड़ने लगे हैं। पहले कपड़ा में चलता-फिरता ग्राहक भारी संख्या में आ जाता था। मगर पिछले दिनों से ग्राहक कम होने लगे हैं। अब केवल जरूरत वाला ग्राहक ही आ रहा है। लॉकडाउन के बाद भी हिमाचल, पंजाब, उत्तरप्रदेश से आने वाले ग्राहक तो लगभग बंद ही हो गए थे। हरियाणा से भी ग्राहकों की संख्या आधी रह गई थी।
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उमेश गुप्ता, प्रधान सेम एसोसिएशन अंबाला।
साइंड इंडस्ट्री : कोविड काल में टूटी कमर
अंबाला। अंबाला की रीड माने जाने वाली साइंस इंडस्ट्री की भी कोरोना ने कमर तोड़ दी थी। मार्च माह में वित्त वर्ष खत्म होने से पूर्व कारोबारियों को तमाम ऑर्डर क्लीयर कर माल देश-विदेश में भेजना था। माल भी तैयार था। मगर अचानक 25 मार्च को लॉकडाउन लग गया। माल फैक्टरियों में ही पड़ा रह गया और आर्डर रद्द हो गए। इसी कारण उद्यमियों को काफी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। अंबाला में छोटी- बड़ी साइंस की करीब 1500 इकाइयां मौजूद हैं। इनमें करीब 30 हजार से ज्यादा कर्मी कार्यरत हैं। एक-एक फैक्टरी का टर्न ओवर 20 से 50 करोड़ तक है। लेकिन लॉकडाउन में कारोबारी सड़क पर आने की कगार पर पहुंच गए थे। अंबाला सेम एसोसिएशन के प्रधान उमेश गुप्ता ने बताया कि ज्यादा नुकसान मार्च में तैयार उपकरणों के ऑर्डर रद्द होने और समय पर सप्लाई नहीं होने के कारण झेलना पड़ा
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शुभम मित्तल, मिक्सी उद्यमी
मिक्सी इंडस्ट्री : 300 करोड़ की चपत
अंबाला। लॉक डाउन के चलते कच्चे माल की सप्लाई बिल्कुल बंद हो गई थी। इसके बाद जब लॉकडाउन खत्म हुआ तो कच्चे माल की कमी के चलते रेट में मनमानी तेजी कर दी गई। इस दौरान दूसरे राज्यों की लेबर अपने घर चली गई थी। अलबत्ता सारा काम चौपट हो गया। यह लेबर करीब छह महीने बाद आई तब जाकर काम फिर से चल पाया। अंबाला के मिक्सी उद्यमी शुभम मित्तल ने बताया कि अंबाला में मिक्सी की छोटी बड़ी करीब 125 इकाइयां इससे प्रभावित हुई। 300 करोड़ इनका टर्न ओवर होता था, जोकि लॉकडाउन में चौपट हो गया। करीब 4500 कर्मचारी इसे कारोबार से अंबाला में जुड़े हैं जिनको लॉकडाउन ने बुरी तरह से प्रभावित किया। हाल अभी भी यह हैं कि कच्चे माल के रेट बढ़ने के कारण सेल 25 से 30 प्रतिशत तक गिर चुकी है।
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पानीपत की चार इंडस्ट्री को 10 हजार करोड़ का लगा फटका
- लॉकडाउन के दौरान पानीपत के 18 हजार उद्योग तीन माह तक रहे थे बंद
- उद्योगों में काम करने वाले साढ़े तीन लाख से अधिक श्रमिक हुए प्रभावित
पानीपत। कोरोना के बढ़ते प्रकोप से बचाव के लिए सरकार ने पिछले वर्ष 23 मार्र्च को लॉकडाउन की घोषणा कर दी थी। पानीपत के 18 हजार उद्योगों पर ताला लटक गया। यहां काम करने वाले साढ़े तीन लाख श्रमिकों को घर बैठना पड़ा था। कारपेट, टेक्सटाइल, धागा और डाइंग का कारोबार रुक गया। विदेशों में माल की सप्लाई रुक गई। एक दिन में घरेलू मार्केट को 70 करोड़ और एक्सपोर्ट को 30 करोड़ रुपये तक का नुकसान झेलना पड़ा।
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डाइंग इंडस्ट्री : झेला दो हजार करोड़ तक नुकसान
पानीपत में करीब 550 डाइंग उद्योग की इकाइयां हैं। यहां डाइंग कारोबार सात हजार करोड़ तक का पहुंच चुका है। लॉकडाउन में सभी डाइंग यूनिट बंद हो गईं थीं। लेबर को इसके बाद भी वेतन दिया गया। डाइंग कारोबार को 2 हजार करोड़ तक का नुकसान उठाना पड़ा। लॉकडाउन उद्योगों के लिए बुरा वक्त था, जिसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा।
- भीम राणा, प्रधान, डायर्स एसोसिएशन
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कारपेट उद्योग : स्टॉक पूरे, मगर थम गई थी सप्लाई
पानीपत में कारपेट का छह हजार करोड़ का कारोबार है। लॉकडाउन से पहले जो ऑर्डर मिले थे, उन्हें पूरा कर लिया था, लेकिन लॉकडाउन लगने के बाद खरीदारों तक माल पहुंचा ही नहीं। लेबर अपने गांव चली गई। कारपेट का काफी माल खराब भी हो गया था। कारपेट उद्योग को लगभग 300 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा था।
- अनिल मितल, सचिव, कारपेट मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन
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टेक्सटाइल उद्योग : सब कुछ ठहर गया
पानीपत के टेक्सटाइल उत्पादों की 12 हजार करोड़ रुपये की एक्सपोर्ट और 90 हजार करोड़ रुपये की घरेलू मार्केट है। पानीपत से पूरे विश्व में टेक्सटाइल उत्पादों की सप्लाई होती है। लॉकडाउन में सब कुछ ठहर गया था। बड़ी संख्या में श्रमिक अपने घर लौट गए। श्रमिकों को वेतन देना जारी रखा और जो ठहर गए, उनकी मदद भी की। तीन माह तक उद्योग बंद रहने से पूरा टेक्सटाइल उद्योग अर्श से फर्श पर आने के जैसा हो गया। उस दौरान पानीपत को 10 हजार करोड़ तक का नुकसान उठाना पड़ा था।
- प्रीतम सचदेवा, प्रधान, इंडस्ट्रियल एसोसिएशन
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प्लाईवुड उद्योग : अभी तक हालत खराब
यमुनानगर। यहां प्लाईवुड और मेटल इंडस्ट्री को कोरोना का काल के दौरान एक साल में 10 हजार करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा। प्लाईवुड इंडस्ट्री एसोसिएशन के पदाधिकारी जेके बिहानी के मुताबिक कोरोना काल में न केवल बड़े उद्योग बल्कि गली-मोहल्लों में इससे संबंधित चलने वाले छोटे-छोटे काम धंधे भी बुरी तरह से प्रभावित हो गए। यहां तक की दैनिक उपयोग की वस्तुएं मिलना भी मुश्किल हो गया था। एक समय तो ऐसे लगने लगा था कि घर में कैद होकर ही जिंदगी बितानी पड़ेगी। अगर यमुनानगर की बात करें तो एक साल के दौरान करीब 10 हजार करोड़ का नुकसान उद्योगों को उठाना पड़ा। लॉकडाउन के एक साल बाद भी शहर में उद्योग धंधे पटरी पर नहीं लौटे हैं।
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मेटल इंडस्ट्री : ताक रही मजदूरों की राह
जगाधरी। जगाधरी मेटल मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के सुंदर लाल बतरा का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान बड़ी संख्या में श्रमिकों ने पलायन कर लिया था। अब वैक्सीन आने के बाद भी मजदूर लौटकर नहीं आ रहे। खासकर कुशल मजदूरों की कमी उद्योगों को काफी झेलनी पड़ रही है। हालांकि पहले के मुकाबले इंडस्ट्री ने 60 फीसदी तक काम धंधा शुरू कर दिया गया है। लेकिन फैक्टरी मालिकों को अभी भी नुकसान झेलना पड़ रहा है। कोरोना काल के दौरान बड़ी संख्या में मेटल से जुड़े छोटे-छोटे उद्योग बंद हो गए थे। जो अब धीरे-धीरे शुरू होने लगे हैं।
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कृषि उपकरण उद्योग : एक हजार करोड़ का झटका
करनाल। सलाना 1200 से 1500 करोड़ रुपये टर्नओवर वाली करनाल की एग्रो इंडस्ट्री (कृषि यंत्र उद्योग) को लॉकडाउन से लेकर अभी करीब एक हजार करोड़ रुपये का झटका लगा है। धीरे-धीरे यह इंडस्ट्री अब संभल रही है। इंडस्ट्री पर अभी महंगाई की मार तो पड़ रही है लेकिन कृषि यंत्र उत्पादन की क्षमता को लगभग पूरा कर लिया गया है।
करनाल एचएसआईआईडीसी इंडस्ट्री वेलफेयर एसोसिएशन के प्रधान मनोज अरोड़ा ने बताया कि इंडस्ट्री तो अब लगभग लॉकडाउन की मार से उबर चुकी है। लेकिन लॉकडाउन में पूरी तरह से बंद रहने, लेबर के चले जाने, खाली फैक्टरियों के बिजली के बिल आदि खर्च जेब से पूरे करने से इंडस्ट्री को भारी नुकसान हुआ है। लेकिन समय के साथ उद्यमियों ने कड़ी मेहनत करते इसे फिर से पटरी पर लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी।
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करनाल की कृषि यंत्र इंडस्ट्री को करीब एक हजार करोड़ की चपत कोरोना के कारण लगी है। लॉकडाउन में डबल नुकसान हुआ। एक तो फैक्टरियां बंद रहीं, ऊपर से बंद फैक्टरियों के भी खर्च उद्यमियों को लगातार भरने पड़े। इसके बाद भी काफी समय तक तैयार प्रोडक्ट न तो बार जा सके और ना ही भुगतान आ सका। रॉ मैटेरियल को लाने में भी भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। महंगा भी बहुत पड़ा। हालांकि अब 90 प्रतिशत तक इंडस्ट्री फिर से पटरी पर लौट आई है, लेकिन महंगाई की मार झेल रही है।
रविंद्र ढल, प्रधान, करनाल एग्रीकल्चर इंप्लीमेंट्स एंड मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन करनाल
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पर्यटन नगरी श्रद्धालुओं, यात्रियों को तरसी
कुरुक्षेत्र। धर्म और पर्यटन नगरी कहे जाने वाले कुरुक्षेत्र में भी कोरोना के कारण श्रद्धालुओं व यात्रियों का आना बंद हो गया। न तो कई देसी मेहमान आया और न ही विदेशी। पिपली पैराकीट के इंचार्ज इंद्र मलिक ने बताया कि कोरोना से पहले यहां काफी यात्री आते थे, लेकिन लॉकडाउन से हालात पर काफी असर पड़ा है। हालांकि अब व्यवस्था पटरी पर लौटने लगी है। कोरोना से पहले पैराकीट में सभी कमरे एडवांस में बुक रहते थे। अब उसके मुकाबले में आधे ही बुक होते है। वहीं, नीलकंठ यात्री निवासी में लॉकडाउन से पहले विदेशी यात्री, ग्रुप व श्रद्धालु आकर ठहरते थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद से अभी भी विदेशी यात्री और ग्रुप नहीं आ रहे हैं। वहीं कोरोना के समय में सरकार ने पैराकीट व नीलकंठ यात्री निवास को आइसोलेशन वार्ड बना दिया था।
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विशाल बतरा प्रधान कपड़ा मार्केट
कपड़ा इंडस्ट्री :12 हजार श्रमिकों की रोजी-रोटी पर था संकट
अंबाला। एशिया की सबसे बड़ी थोक कपड़ा मार्केट लॉकडाउन में पूरी तरह से बंद रही। यहां करीब 1100 दुकानें हैं। इनमें करीब 12000 कर्मचारी कार्यरत हैं और सालाना टर्न ओवर 2000 करोड़ से ज्यादा का है। लेकिन लॉकडाउन में हालात यह हो गए थे कि कारोबारियों को बैंकों की किस्तें भरनी मुश्किल हो गई। लिहाजा कपड़ा मार्केट में कार्यरत कमिज़्यों को कई माह तक सिर्फ 30 से लेकर 50 प्रतिशत तक वेतन दिया गया। इस तरह इन सभी की रोजी-रोटी के लाले पड़ गए थे। कपड़ा मार्केट होलसेल एसोसिएशन के प्रधान विशाल बतरा के अनुसार लॉकडाउन के बाद से अभी कारोबार धीरे-धीरे पटरी पर आ रहा है। लेकिन अब फिर हालात बिगड़ने लगे हैं। पहले कपड़ा में चलता-फिरता ग्राहक भारी संख्या में आ जाता था। मगर पिछले दिनों से ग्राहक कम होने लगे हैं। अब केवल जरूरत वाला ग्राहक ही आ रहा है। लॉकडाउन के बाद भी हिमाचल, पंजाब, उत्तरप्रदेश से आने वाले ग्राहक तो लगभग बंद ही हो गए थे। हरियाणा से भी ग्राहकों की संख्या आधी रह गई थी।
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उमेश गुप्ता, प्रधान सेम एसोसिएशन अंबाला।
साइंड इंडस्ट्री : कोविड काल में टूटी कमर
अंबाला। अंबाला की रीड माने जाने वाली साइंस इंडस्ट्री की भी कोरोना ने कमर तोड़ दी थी। मार्च माह में वित्त वर्ष खत्म होने से पूर्व कारोबारियों को तमाम ऑर्डर क्लीयर कर माल देश-विदेश में भेजना था। माल भी तैयार था। मगर अचानक 25 मार्च को लॉकडाउन लग गया। माल फैक्टरियों में ही पड़ा रह गया और आर्डर रद्द हो गए। इसी कारण उद्यमियों को काफी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। अंबाला में छोटी- बड़ी साइंस की करीब 1500 इकाइयां मौजूद हैं। इनमें करीब 30 हजार से ज्यादा कर्मी कार्यरत हैं। एक-एक फैक्टरी का टर्न ओवर 20 से 50 करोड़ तक है। लेकिन लॉकडाउन में कारोबारी सड़क पर आने की कगार पर पहुंच गए थे। अंबाला सेम एसोसिएशन के प्रधान उमेश गुप्ता ने बताया कि ज्यादा नुकसान मार्च में तैयार उपकरणों के ऑर्डर रद्द होने और समय पर सप्लाई नहीं होने के कारण झेलना पड़ा
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शुभम मित्तल, मिक्सी उद्यमी
मिक्सी इंडस्ट्री : 300 करोड़ की चपत
अंबाला। लॉक डाउन के चलते कच्चे माल की सप्लाई बिल्कुल बंद हो गई थी। इसके बाद जब लॉकडाउन खत्म हुआ तो कच्चे माल की कमी के चलते रेट में मनमानी तेजी कर दी गई। इस दौरान दूसरे राज्यों की लेबर अपने घर चली गई थी। अलबत्ता सारा काम चौपट हो गया। यह लेबर करीब छह महीने बाद आई तब जाकर काम फिर से चल पाया। अंबाला के मिक्सी उद्यमी शुभम मित्तल ने बताया कि अंबाला में मिक्सी की छोटी बड़ी करीब 125 इकाइयां इससे प्रभावित हुई। 300 करोड़ इनका टर्न ओवर होता था, जोकि लॉकडाउन में चौपट हो गया। करीब 4500 कर्मचारी इसे कारोबार से अंबाला में जुड़े हैं जिनको लॉकडाउन ने बुरी तरह से प्रभावित किया। हाल अभी भी यह हैं कि कच्चे माल के रेट बढ़ने के कारण सेल 25 से 30 प्रतिशत तक गिर चुकी है।
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पानीपत की चार इंडस्ट्री को 10 हजार करोड़ का लगा फटका
- लॉकडाउन के दौरान पानीपत के 18 हजार उद्योग तीन माह तक रहे थे बंद
- उद्योगों में काम करने वाले साढ़े तीन लाख से अधिक श्रमिक हुए प्रभावित
पानीपत। कोरोना के बढ़ते प्रकोप से बचाव के लिए सरकार ने पिछले वर्ष 23 मार्र्च को लॉकडाउन की घोषणा कर दी थी। पानीपत के 18 हजार उद्योगों पर ताला लटक गया। यहां काम करने वाले साढ़े तीन लाख श्रमिकों को घर बैठना पड़ा था। कारपेट, टेक्सटाइल, धागा और डाइंग का कारोबार रुक गया। विदेशों में माल की सप्लाई रुक गई। एक दिन में घरेलू मार्केट को 70 करोड़ और एक्सपोर्ट को 30 करोड़ रुपये तक का नुकसान झेलना पड़ा।
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डाइंग इंडस्ट्री : झेला दो हजार करोड़ तक नुकसान
पानीपत में करीब 550 डाइंग उद्योग की इकाइयां हैं। यहां डाइंग कारोबार सात हजार करोड़ तक का पहुंच चुका है। लॉकडाउन में सभी डाइंग यूनिट बंद हो गईं थीं। लेबर को इसके बाद भी वेतन दिया गया। डाइंग कारोबार को 2 हजार करोड़ तक का नुकसान उठाना पड़ा। लॉकडाउन उद्योगों के लिए बुरा वक्त था, जिसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा।
- भीम राणा, प्रधान, डायर्स एसोसिएशन
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कारपेट उद्योग : स्टॉक पूरे, मगर थम गई थी सप्लाई
पानीपत में कारपेट का छह हजार करोड़ का कारोबार है। लॉकडाउन से पहले जो ऑर्डर मिले थे, उन्हें पूरा कर लिया था, लेकिन लॉकडाउन लगने के बाद खरीदारों तक माल पहुंचा ही नहीं। लेबर अपने गांव चली गई। कारपेट का काफी माल खराब भी हो गया था। कारपेट उद्योग को लगभग 300 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा था।
- अनिल मितल, सचिव, कारपेट मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन
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टेक्सटाइल उद्योग : सब कुछ ठहर गया
पानीपत के टेक्सटाइल उत्पादों की 12 हजार करोड़ रुपये की एक्सपोर्ट और 90 हजार करोड़ रुपये की घरेलू मार्केट है। पानीपत से पूरे विश्व में टेक्सटाइल उत्पादों की सप्लाई होती है। लॉकडाउन में सब कुछ ठहर गया था। बड़ी संख्या में श्रमिक अपने घर लौट गए। श्रमिकों को वेतन देना जारी रखा और जो ठहर गए, उनकी मदद भी की। तीन माह तक उद्योग बंद रहने से पूरा टेक्सटाइल उद्योग अर्श से फर्श पर आने के जैसा हो गया। उस दौरान पानीपत को 10 हजार करोड़ तक का नुकसान उठाना पड़ा था।
- प्रीतम सचदेवा, प्रधान, इंडस्ट्रियल एसोसिएशन
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प्लाईवुड उद्योग : अभी तक हालत खराब
यमुनानगर। यहां प्लाईवुड और मेटल इंडस्ट्री को कोरोना का काल के दौरान एक साल में 10 हजार करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा। प्लाईवुड इंडस्ट्री एसोसिएशन के पदाधिकारी जेके बिहानी के मुताबिक कोरोना काल में न केवल बड़े उद्योग बल्कि गली-मोहल्लों में इससे संबंधित चलने वाले छोटे-छोटे काम धंधे भी बुरी तरह से प्रभावित हो गए। यहां तक की दैनिक उपयोग की वस्तुएं मिलना भी मुश्किल हो गया था। एक समय तो ऐसे लगने लगा था कि घर में कैद होकर ही जिंदगी बितानी पड़ेगी। अगर यमुनानगर की बात करें तो एक साल के दौरान करीब 10 हजार करोड़ का नुकसान उद्योगों को उठाना पड़ा। लॉकडाउन के एक साल बाद भी शहर में उद्योग धंधे पटरी पर नहीं लौटे हैं।
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मेटल इंडस्ट्री : ताक रही मजदूरों की राह
जगाधरी। जगाधरी मेटल मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के सुंदर लाल बतरा का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान बड़ी संख्या में श्रमिकों ने पलायन कर लिया था। अब वैक्सीन आने के बाद भी मजदूर लौटकर नहीं आ रहे। खासकर कुशल मजदूरों की कमी उद्योगों को काफी झेलनी पड़ रही है। हालांकि पहले के मुकाबले इंडस्ट्री ने 60 फीसदी तक काम धंधा शुरू कर दिया गया है। लेकिन फैक्टरी मालिकों को अभी भी नुकसान झेलना पड़ रहा है। कोरोना काल के दौरान बड़ी संख्या में मेटल से जुड़े छोटे-छोटे उद्योग बंद हो गए थे। जो अब धीरे-धीरे शुरू होने लगे हैं।
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कृषि उपकरण उद्योग : एक हजार करोड़ का झटका
करनाल। सलाना 1200 से 1500 करोड़ रुपये टर्नओवर वाली करनाल की एग्रो इंडस्ट्री (कृषि यंत्र उद्योग) को लॉकडाउन से लेकर अभी करीब एक हजार करोड़ रुपये का झटका लगा है। धीरे-धीरे यह इंडस्ट्री अब संभल रही है। इंडस्ट्री पर अभी महंगाई की मार तो पड़ रही है लेकिन कृषि यंत्र उत्पादन की क्षमता को लगभग पूरा कर लिया गया है।
करनाल एचएसआईआईडीसी इंडस्ट्री वेलफेयर एसोसिएशन के प्रधान मनोज अरोड़ा ने बताया कि इंडस्ट्री तो अब लगभग लॉकडाउन की मार से उबर चुकी है। लेकिन लॉकडाउन में पूरी तरह से बंद रहने, लेबर के चले जाने, खाली फैक्टरियों के बिजली के बिल आदि खर्च जेब से पूरे करने से इंडस्ट्री को भारी नुकसान हुआ है। लेकिन समय के साथ उद्यमियों ने कड़ी मेहनत करते इसे फिर से पटरी पर लाने में कामयाबी हासिल कर ली थी।
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करनाल की कृषि यंत्र इंडस्ट्री को करीब एक हजार करोड़ की चपत कोरोना के कारण लगी है। लॉकडाउन में डबल नुकसान हुआ। एक तो फैक्टरियां बंद रहीं, ऊपर से बंद फैक्टरियों के भी खर्च उद्यमियों को लगातार भरने पड़े। इसके बाद भी काफी समय तक तैयार प्रोडक्ट न तो बार जा सके और ना ही भुगतान आ सका। रॉ मैटेरियल को लाने में भी भारी असुविधा का सामना करना पड़ा। महंगा भी बहुत पड़ा। हालांकि अब 90 प्रतिशत तक इंडस्ट्री फिर से पटरी पर लौट आई है, लेकिन महंगाई की मार झेल रही है।
रविंद्र ढल, प्रधान, करनाल एग्रीकल्चर इंप्लीमेंट्स एंड मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन करनाल
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पर्यटन नगरी श्रद्धालुओं, यात्रियों को तरसी
कुरुक्षेत्र। धर्म और पर्यटन नगरी कहे जाने वाले कुरुक्षेत्र में भी कोरोना के कारण श्रद्धालुओं व यात्रियों का आना बंद हो गया। न तो कई देसी मेहमान आया और न ही विदेशी। पिपली पैराकीट के इंचार्ज इंद्र मलिक ने बताया कि कोरोना से पहले यहां काफी यात्री आते थे, लेकिन लॉकडाउन से हालात पर काफी असर पड़ा है। हालांकि अब व्यवस्था पटरी पर लौटने लगी है। कोरोना से पहले पैराकीट में सभी कमरे एडवांस में बुक रहते थे। अब उसके मुकाबले में आधे ही बुक होते है। वहीं, नीलकंठ यात्री निवासी में लॉकडाउन से पहले विदेशी यात्री, ग्रुप व श्रद्धालु आकर ठहरते थे, लेकिन लॉकडाउन के बाद से अभी भी विदेशी यात्री और ग्रुप नहीं आ रहे हैं। वहीं कोरोना के समय में सरकार ने पैराकीट व नीलकंठ यात्री निवास को आइसोलेशन वार्ड बना दिया था।