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बागवानी अधिकारी बिना डिग्री के बने सिविल इंजीनियर!
करनाल
Updated Sun, 18 May 2014 12:04 AM IST
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हुडा विभाग में बागवानी विभाग के अधिकारियों को नियम और कायदे की कतई
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परवाह नहीं। हुडा बागवानी के अधिकारी बिना डिग्री के सिविल इंजीनियर बने
हैं। राज्य भर के सभी जिलों में बागवानी विभाग के जेई से लेकर अधीक्षण
अभियंता समेत करीब 50 अधिकारी ऐसे शामिल हैं जो बागवानी की डिग्री रखते
हैं।
वह लोग बागवानी के बजाय निर्माण कार्य (सिविल वर्कर्स) कराने में लगे हैं। बागवानी का काम पिछले कई वर्षों से ठेके पर दिया है। हैरत की बात है कि हुडा बागवानी विभाग के अधिकारी बागवानी से जुड़े निर्माण कार्य करवाने के लिए किसी एक्सपर्ट को बुलाने की जहमत नहीं उठाते हैं।
सरकार के नियम ऐसे ढंग से कार्य कराने की इजाजत नहीं देते हैं। किसी को भी सरकारी तौर पर निर्माण कार्य करना है तो इसके लिए सिविल इंजीनियर की जरूरत पड़ती है, लेकिन इस विभाग में बागवानी की डिग्री वाले अधिकारी यह कार्य करने में लगे हैं। हुडा विभाग के बागवानी विंग में राज्य भर के सभी 22 जिलों में बागवानी के अधिकारी सिविल का काम कर रहे हैं। इन जिलों में बागवानी के पास करीब 100 किलोमीटर से अधिक की ग्रीन बेल्ट है।
पार्कों व पर्यावरण को सुरक्षित रखने और हरियाली प्रदान करने की जिम्मेदारी हुडा के बागवानी विभाग की है। दस साल से भी अधिक समय से अधिकतर काम हुडा के बागवानी विभाग ने ठेके पर दे दिया है। बागवानी विंग के जेई से लेकर अधीक्षण अभियंता तक राज्य भर में करीब तीस अधिकारी ऐसे हैं, जिनके पास डिग्री बागवानी की है और वह लोग सिविल के काम कराने में लगे हैं।
मामला नोटिस में आया तो शहर के एक व्यक्ति ने सरकारी विभाग के अधिकारियों की अंधेरगर्दी को उजागर करने के लिए आरटीआई मांगी। अधिकारियों ने आरटीआई देने के बजाय सीधा लिख दिया कि यह सूचना चीफ इंजीनियर देंगे। ऐसा कर मामले को घूमाने के प्रयास किए गए हैं। इस में कोई बड़ी जानकारी नहीं मांगी गई।
केवल इतना मांगा गया था कि यह बताया जाए कि बागवानी की डिग्री वाले लोग सरकारी विभाग मेें निर्माण कार्य कर सकते हैं या नहीं। बिंदुवार भी जानकारी दी जाए तो मात्र 10 से 15 मिनट से अधिक समय नहीं लगता, लेकिन अधिकारियों की नीयत में खोट साफ नजर आ रहा है। वह लोग मामले को उलझाने में लगे हैं।
पचास अधिकारी कर हैं निर्माण कार्य
हुडा के बागवानी विभाग में राज्य भर में करीब एक अधीक्षण अभियंता, पांच कार्यकारी अभियंता, करीब 15 उपमंडल अधिकारी और लगभग तीस जेई हैं। उन लोगों के पास बागवानी की महारत रखने की डिग्री और डिप्लोमा तो है, लेकिन सिविल का कोई प्रमाणपत्र नहीं है। नियम के अनुसार बागवानी की डिग्री और डिप्लोमा रखने वाले लोग सिविल का निर्माण कार्य नहीं करवा सकते हैं। वह लोेग किसी भी निर्माण कार्य में अधूरे ज्ञान के कारण सामग्री मिलाने के अनुपात में गड़गड़ की जा सकती है।
क्वालिटी भी सही नहीं होती
डिग्री न होने का मतलब है कि कोई भी व्यक्ति संबंधित क्षेत्र में काम करने की योग्यता नहीं रखता है। ऐसे में बागवानी के अधिकारी निर्माण कार्य नहीं करवा सकते हैं। अगर वह करेंगे तो क्वालिटी सही नहीं होगी। सामग्री के मिश्रण का अनुपात सही नहीं होगा। एस्टिमेट ठीक नहीं लगा सकते। बिलों पर हस्ताक्षर भी नहीं कर सकते।
वह लोग बागवानी के बजाय निर्माण कार्य (सिविल वर्कर्स) कराने में लगे हैं। बागवानी का काम पिछले कई वर्षों से ठेके पर दिया है। हैरत की बात है कि हुडा बागवानी विभाग के अधिकारी बागवानी से जुड़े निर्माण कार्य करवाने के लिए किसी एक्सपर्ट को बुलाने की जहमत नहीं उठाते हैं।
सरकार के नियम ऐसे ढंग से कार्य कराने की इजाजत नहीं देते हैं। किसी को भी सरकारी तौर पर निर्माण कार्य करना है तो इसके लिए सिविल इंजीनियर की जरूरत पड़ती है, लेकिन इस विभाग में बागवानी की डिग्री वाले अधिकारी यह कार्य करने में लगे हैं। हुडा विभाग के बागवानी विंग में राज्य भर के सभी 22 जिलों में बागवानी के अधिकारी सिविल का काम कर रहे हैं। इन जिलों में बागवानी के पास करीब 100 किलोमीटर से अधिक की ग्रीन बेल्ट है।
पार्कों व पर्यावरण को सुरक्षित रखने और हरियाली प्रदान करने की जिम्मेदारी हुडा के बागवानी विभाग की है। दस साल से भी अधिक समय से अधिकतर काम हुडा के बागवानी विभाग ने ठेके पर दे दिया है। बागवानी विंग के जेई से लेकर अधीक्षण अभियंता तक राज्य भर में करीब तीस अधिकारी ऐसे हैं, जिनके पास डिग्री बागवानी की है और वह लोग सिविल के काम कराने में लगे हैं।
मामला नोटिस में आया तो शहर के एक व्यक्ति ने सरकारी विभाग के अधिकारियों की अंधेरगर्दी को उजागर करने के लिए आरटीआई मांगी। अधिकारियों ने आरटीआई देने के बजाय सीधा लिख दिया कि यह सूचना चीफ इंजीनियर देंगे। ऐसा कर मामले को घूमाने के प्रयास किए गए हैं। इस में कोई बड़ी जानकारी नहीं मांगी गई।
केवल इतना मांगा गया था कि यह बताया जाए कि बागवानी की डिग्री वाले लोग सरकारी विभाग मेें निर्माण कार्य कर सकते हैं या नहीं। बिंदुवार भी जानकारी दी जाए तो मात्र 10 से 15 मिनट से अधिक समय नहीं लगता, लेकिन अधिकारियों की नीयत में खोट साफ नजर आ रहा है। वह लोग मामले को उलझाने में लगे हैं।
पचास अधिकारी कर हैं निर्माण कार्य
हुडा के बागवानी विभाग में राज्य भर में करीब एक अधीक्षण अभियंता, पांच कार्यकारी अभियंता, करीब 15 उपमंडल अधिकारी और लगभग तीस जेई हैं। उन लोगों के पास बागवानी की महारत रखने की डिग्री और डिप्लोमा तो है, लेकिन सिविल का कोई प्रमाणपत्र नहीं है। नियम के अनुसार बागवानी की डिग्री और डिप्लोमा रखने वाले लोग सिविल का निर्माण कार्य नहीं करवा सकते हैं। वह लोेग किसी भी निर्माण कार्य में अधूरे ज्ञान के कारण सामग्री मिलाने के अनुपात में गड़गड़ की जा सकती है।
क्वालिटी भी सही नहीं होती
डिग्री न होने का मतलब है कि कोई भी व्यक्ति संबंधित क्षेत्र में काम करने की योग्यता नहीं रखता है। ऐसे में बागवानी के अधिकारी निर्माण कार्य नहीं करवा सकते हैं। अगर वह करेंगे तो क्वालिटी सही नहीं होगी। सामग्री के मिश्रण का अनुपात सही नहीं होगा। एस्टिमेट ठीक नहीं लगा सकते। बिलों पर हस्ताक्षर भी नहीं कर सकते।