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Karnal News: लाइक और सब्सक्राइब की उम्मीद से तनाव में बचपन
Mon, 09 Feb 2026 02:29 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
संवाद न्यूज एजेंसी, करनाल
Updated Mon, 09 Feb 2026 02:29 AM IST
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करनाल।
बच्चों में सोशल मीडिया पर रील बनाने और देखने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। रील अपलोड होने के बाद लाइक और व्यूज पर नजर बनाए रखना आदत बनता जा रहा है। लाइक, सब्सक्राइब और व्यूज की उम्मीद बचपन को उलझा रही है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि यह प्रवृत्ति बच्चों में बेचैनी, एकाग्रता की कमी और पढ़ाई से दूरी का कारण बन रही है। बार-बार फोन चेक करना, कम लाइक मिलने पर बेचैनी और निराशा उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है।
जिला नागरिक अस्पताल से मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सौभाग्य कौशिक का कहना है कि सोशल मीडिया ने बच्चों के रोजमर्रा के जीवन पर सीधा असर डालना शुरू कर दिया है। आने वाले समय में यह और बड़ी चुनौती होगी। रील बनाने के बाद बच्चों में सोशल मीडिया से तुरंत प्रतिक्रिया पाने की उम्मीद होती है। आदत बन जाती है बार-बार फोन चेक कर व्यूज और कमेंट देखना। सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होने की चाह बच्चों में चिंता, नींद की कमी और ध्यान भटकने की समस्या पैदा कर रही है। हर महीने 20 से 25 बच्चे इसी तरह की समस्याओं के साथ ओपीडी में पहुंच रहे हैं।
सीखने की प्रक्रिया होती है बाधित
डीएवी कॉलेज से मनोवैज्ञानिक सहायक प्रोफेसर कोमल के अनुसार, रील और सोशल मीडिया की लत बच्चों के मानसिक विकास और रचनात्मक क्षमता पर असर डाल रही है। उनका ध्यान बार-बार स्क्रीन और लाइक पर रहता है, जिससे सीखने की प्रक्रिया बाधित होती है। यह स्थिति धीरे-धीरे बच्चों की सामाजिक और मानसिक क्षमता को प्रभावित कर रही है।
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सोशल मीडिया क्षमता का पैमाना नहीं
निसिंग के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से प्रधानाचार्य सुरेश सैनी ने बताया कि अभिभावक और शिक्षकों को बच्चों को यह समझाना भी जरूरी है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का साधन है, उनकी प्रतिभा और क्षमता का पैमाना नहीं। समय पर सही मार्गदर्शन से यह लत रोकी जा सकती है और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षित रखा जा सकता है।
बच्चों का व्यवहार बदल रहा
रामनगर स्थित एसडी बाल मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से प्रधानाचार्य दिनेशचंद्र डिमरी ने बताया कि रील और गेम की लत बच्चों के व्यवहार को बदल रही है। वे जल्दी गुस्सा करने लगे हैं। खुद की तुलना दूसरों से करने लगे हैं। इससे आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है। वे खुद की तुलना रील्स में दिखने वाले लोगों से करने लगते हैं।
ये करें उपाय :
मोबाइल और सोशल मीडिया उपयोग की समयसीमा तय करें
रील बनाने की आदत को बढ़ावा न दें, अन्य शौक विकसित करें
खेल, कला और रचनात्मक गतिविधियों से बच्चों को जोड़ें
अभिभावक खुद भी सोशल मीडिया का संतुलित उपयोग करें
बेचैनी, नींद की कमी या व्यवहार में बदलाव पर काउंसलिंग कराएं
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बच्चों में सोशल मीडिया पर रील बनाने और देखने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। रील अपलोड होने के बाद लाइक और व्यूज पर नजर बनाए रखना आदत बनता जा रहा है। लाइक, सब्सक्राइब और व्यूज की उम्मीद बचपन को उलझा रही है। मनोचिकित्सकों का मानना है कि यह प्रवृत्ति बच्चों में बेचैनी, एकाग्रता की कमी और पढ़ाई से दूरी का कारण बन रही है। बार-बार फोन चेक करना, कम लाइक मिलने पर बेचैनी और निराशा उनके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है।
जिला नागरिक अस्पताल से मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सौभाग्य कौशिक का कहना है कि सोशल मीडिया ने बच्चों के रोजमर्रा के जीवन पर सीधा असर डालना शुरू कर दिया है। आने वाले समय में यह और बड़ी चुनौती होगी। रील बनाने के बाद बच्चों में सोशल मीडिया से तुरंत प्रतिक्रिया पाने की उम्मीद होती है। आदत बन जाती है बार-बार फोन चेक कर व्यूज और कमेंट देखना। सोशल मीडिया पर लोकप्रिय होने की चाह बच्चों में चिंता, नींद की कमी और ध्यान भटकने की समस्या पैदा कर रही है। हर महीने 20 से 25 बच्चे इसी तरह की समस्याओं के साथ ओपीडी में पहुंच रहे हैं।
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सीखने की प्रक्रिया होती है बाधित
डीएवी कॉलेज से मनोवैज्ञानिक सहायक प्रोफेसर कोमल के अनुसार, रील और सोशल मीडिया की लत बच्चों के मानसिक विकास और रचनात्मक क्षमता पर असर डाल रही है। उनका ध्यान बार-बार स्क्रीन और लाइक पर रहता है, जिससे सीखने की प्रक्रिया बाधित होती है। यह स्थिति धीरे-धीरे बच्चों की सामाजिक और मानसिक क्षमता को प्रभावित कर रही है।
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सोशल मीडिया क्षमता का पैमाना नहीं
निसिंग के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से प्रधानाचार्य सुरेश सैनी ने बताया कि अभिभावक और शिक्षकों को बच्चों को यह समझाना भी जरूरी है कि सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का साधन है, उनकी प्रतिभा और क्षमता का पैमाना नहीं। समय पर सही मार्गदर्शन से यह लत रोकी जा सकती है और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षित रखा जा सकता है।
बच्चों का व्यवहार बदल रहा
रामनगर स्थित एसडी बाल मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय से प्रधानाचार्य दिनेशचंद्र डिमरी ने बताया कि रील और गेम की लत बच्चों के व्यवहार को बदल रही है। वे जल्दी गुस्सा करने लगे हैं। खुद की तुलना दूसरों से करने लगे हैं। इससे आत्मविश्वास कमजोर पड़ता है। वे खुद की तुलना रील्स में दिखने वाले लोगों से करने लगते हैं।
ये करें उपाय :
मोबाइल और सोशल मीडिया उपयोग की समयसीमा तय करें
रील बनाने की आदत को बढ़ावा न दें, अन्य शौक विकसित करें
खेल, कला और रचनात्मक गतिविधियों से बच्चों को जोड़ें
अभिभावक खुद भी सोशल मीडिया का संतुलित उपयोग करें
बेचैनी, नींद की कमी या व्यवहार में बदलाव पर काउंसलिंग कराएं