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रिश्वत कांड में फंसा डीटीपी...
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डीटीपी विक्रम सिंह करीब चार साल से करनाल में तैनात था। इस दौरान उन्होंने कई अवैध कॉलोनियों पर पीला पंजा चलाया और लोगों के मकानों व दुकानों को ध्वस्त भी किया, लेकिन अब वही कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं। विजिलेंस का दावा है कि इससे यह साफ होता है कि डीटीपी विक्रम पहले दबाव बनाने के लिए अवैध कॉलोनियों में बने निर्माणों को गिराता था और फिर कॉलोनाइजर्स से सांठगांठ कर रिश्वत लेता था। लोगों का कहना है कि डीटीपी कॉलोनाइजर्स से रिश्वत लेकर कॉलोनी में दबे सीवरेज सिस्टम को भी जेसीबी से नहीं उखाड़ता था। सिर्फ उन कॉलोनियों में सीवरेज पाइप को उखाड़ा जाता था जो उसे रिश्वत नहीं देते थे।
यही कारण था कि अवैध कॉलोनियों में निर्माणों को गिराकर डीटीपी आला अधिकारियों की नजरों में ईमानदारी से निष्पक्ष कार्रवाई करने वाली इमेज बनाकर रखता था।
इतना ही नहीं एक बार अवैध कॉलोनी में चल रही कार्रवाई के दौरान डीटीपी ने लोगों के सामने यह भी कहा था कि वह रिश्वत नहीं लेता, यदि रिश्वत लेता तो अवैध कॉलोनी में कार्रवाई नहीं करता, लेकिन उसके भ्रष्टाचार का खेल की जानकारी कॉलोनाइजर्स, उसके कार्यालय के कर्मचारी बखूबी जानते थे। अब डीटीपी रिश्वत लेते रंगेहाथों पकड़ा गया है और विजिलेंस की गिरफ्त में है।
डीटीपी विक्रम सिंह पर काफी समय से रिश्वत लेने के आरोप लगते रहे हैं। करीब एक साल पहले शहर के वार्ड दो में डीटीपी द्वारा बुढ्ढाखेड़ा स्थित अवैध कॉलोनी में कई लोगों के घरों को गिरा दिया था। लोगों के घरों के बचाने के लिए पार्षद बलविंदर सिंह सामने आए तो विवाद बढ़ गया था। इसके बाद डीटीपी की शिकायत पर पुलिस ने रात को ही पार्षद को पकड़ लिया था। बलविंदर ने भी कहा था कि डीटीपी भ्रष्ट अधिकारी है, लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी। इसकी प्रकार पिछले साल ही तरावड़ी के कॉलोनाइजर प्रवीण कुमार ने भी डीटीपी विक्रम पर रिश्वत के 27 लाख रुपये लेने का आरोप लगाया था। बताया जाता है कि डीटीपी को घी के डिब्बे में रुपये रखकर दिए जाते थे। इस मामले की जांच भी नहीं हो पाई। अब रिश्वत कांड में पकड़ने जाने के बाद लोगों में चर्चा है कि भ्रष्टाचार का आरोप लगने के बाद आखिरकार कौन लोग डीटीपी का संरक्षण करते थे, क्यों डीटीपी पर लगे आरोपों की जांच नहीं करवाई जाती थी और आरोपों के बावजूद वे इतने लंबे समय तक करनाल में कैसे तैनात रहा। साथ ही हैरान करने वाली बात यह कि करनाल के साथ-साथ उसे गुरुग्राम जैसे महत्वपूर्ण जिले का भी अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया।
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सूत्रों के अनुसार कॉलोनाइजर अवैध कॉलोनी काटने से पहले डीटीपी से सांठगांठ करते थे। इसके बाद जब उस अवैध कॉलोनी में आधे से ज्यादा प्लॉट बिक जाते थे तो डीटीपी लोगों के मकानों पर पीला पंजा चला देता था। इससे उसकी इमेज ईमानदार अफसर की बन जाती थी। इसके साथ ही वह उस कॉलोनी की सूचना जारी करता था कि यह कॉलोनी अवैध है लेकिन तहसील कार्यालय में इस सूचना पट लगने के बाद भी धड़ाधड़ अवैध कॉलोनी में रजिस्टरियाें का खेल चलता था। जब लोगों के मकान तोड़े जाते थे, तो लोग अपनी रजिस्टरियां दिखाते हुए कहते थे कि यदि कॉलोनी अवैध है तो उनके प्लॉट की रजिस्टरी कैसे हुई। यह भी अपने आप में जांच का विषय है।
डीटीपी विक्रम सिंह के पकड़े जाने पर कई अधिकारियों व कर्मचारियों में खलबली मची हुई है। कहीं आरोपी विक्रम उनके नाम का खुलासा न कर दें, इसे लेकर डीटीपी के संपर्क में रहने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों में खलबली मची रही। उधर, जिन-जिन लोगों के मकान पर डीटीपी ने पीला पंजा चलाया था, सभी खुश नजर आए।
जिले में भ्रष्टाचार के कई मामलों की जांच आज भी दबी पड़ी है। पिछले वर्ष नगर निगम में प्रॉपर्टी के फर्जी आईडी नंबर जारी किए गए। इस मामले की जांच भी दबा दी गई। वहीं नगर निगम के अधीक्षण अभियंता दीपक किंगर के पीए की भी रिश्वत लेते एक वीडियो वायरल हुई थी। जिसमें एसई पर भी गंभीर आरोप लगे थे, लेकिन मामले की जांच उपायुक्त ने एडीसी सौंपी थी, लेकिन इसकी जांच रिपोर्ट भी लंबे समय से अटकी हुई है। ऐसे में लोगों ने सीएम से अपील करते हुए कहा कि नगर निगम एसई के मामले की जांच भी विजिलेंस से होनी चाहिए।
सीएम के मीडिया समन्वयक जगमोहन आनंद का कहना है डीटीपी विक्रम सिंह के खिलाफ कोई अहम सबूत नहीं मिल रहा था, इस कारण उस पर पहले कार्रवाई नहीं हो सकी थी। अब वह उन अधिकारियों व कर्मचारियों की लिस्ट तैयार कर सीएम को सौंपेंगे जो लंबे समय से सीएम सिटी में कार्यरत हैं, वहीं, जिन अधिकारियों व कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, उनकी सूचना भी सीएम तक पहुंचाएंगे।
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यही कारण था कि अवैध कॉलोनियों में निर्माणों को गिराकर डीटीपी आला अधिकारियों की नजरों में ईमानदारी से निष्पक्ष कार्रवाई करने वाली इमेज बनाकर रखता था।
इतना ही नहीं एक बार अवैध कॉलोनी में चल रही कार्रवाई के दौरान डीटीपी ने लोगों के सामने यह भी कहा था कि वह रिश्वत नहीं लेता, यदि रिश्वत लेता तो अवैध कॉलोनी में कार्रवाई नहीं करता, लेकिन उसके भ्रष्टाचार का खेल की जानकारी कॉलोनाइजर्स, उसके कार्यालय के कर्मचारी बखूबी जानते थे। अब डीटीपी रिश्वत लेते रंगेहाथों पकड़ा गया है और विजिलेंस की गिरफ्त में है।
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डीटीपी विक्रम सिंह पर काफी समय से रिश्वत लेने के आरोप लगते रहे हैं। करीब एक साल पहले शहर के वार्ड दो में डीटीपी द्वारा बुढ्ढाखेड़ा स्थित अवैध कॉलोनी में कई लोगों के घरों को गिरा दिया था। लोगों के घरों के बचाने के लिए पार्षद बलविंदर सिंह सामने आए तो विवाद बढ़ गया था। इसके बाद डीटीपी की शिकायत पर पुलिस ने रात को ही पार्षद को पकड़ लिया था। बलविंदर ने भी कहा था कि डीटीपी भ्रष्ट अधिकारी है, लेकिन उसकी किसी ने नहीं सुनी। इसकी प्रकार पिछले साल ही तरावड़ी के कॉलोनाइजर प्रवीण कुमार ने भी डीटीपी विक्रम पर रिश्वत के 27 लाख रुपये लेने का आरोप लगाया था। बताया जाता है कि डीटीपी को घी के डिब्बे में रुपये रखकर दिए जाते थे। इस मामले की जांच भी नहीं हो पाई। अब रिश्वत कांड में पकड़ने जाने के बाद लोगों में चर्चा है कि भ्रष्टाचार का आरोप लगने के बाद आखिरकार कौन लोग डीटीपी का संरक्षण करते थे, क्यों डीटीपी पर लगे आरोपों की जांच नहीं करवाई जाती थी और आरोपों के बावजूद वे इतने लंबे समय तक करनाल में कैसे तैनात रहा। साथ ही हैरान करने वाली बात यह कि करनाल के साथ-साथ उसे गुरुग्राम जैसे महत्वपूर्ण जिले का भी अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया।
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सूत्रों के अनुसार कॉलोनाइजर अवैध कॉलोनी काटने से पहले डीटीपी से सांठगांठ करते थे। इसके बाद जब उस अवैध कॉलोनी में आधे से ज्यादा प्लॉट बिक जाते थे तो डीटीपी लोगों के मकानों पर पीला पंजा चला देता था। इससे उसकी इमेज ईमानदार अफसर की बन जाती थी। इसके साथ ही वह उस कॉलोनी की सूचना जारी करता था कि यह कॉलोनी अवैध है लेकिन तहसील कार्यालय में इस सूचना पट लगने के बाद भी धड़ाधड़ अवैध कॉलोनी में रजिस्टरियाें का खेल चलता था। जब लोगों के मकान तोड़े जाते थे, तो लोग अपनी रजिस्टरियां दिखाते हुए कहते थे कि यदि कॉलोनी अवैध है तो उनके प्लॉट की रजिस्टरी कैसे हुई। यह भी अपने आप में जांच का विषय है।
डीटीपी विक्रम सिंह के पकड़े जाने पर कई अधिकारियों व कर्मचारियों में खलबली मची हुई है। कहीं आरोपी विक्रम उनके नाम का खुलासा न कर दें, इसे लेकर डीटीपी के संपर्क में रहने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों में खलबली मची रही। उधर, जिन-जिन लोगों के मकान पर डीटीपी ने पीला पंजा चलाया था, सभी खुश नजर आए।
जिले में भ्रष्टाचार के कई मामलों की जांच आज भी दबी पड़ी है। पिछले वर्ष नगर निगम में प्रॉपर्टी के फर्जी आईडी नंबर जारी किए गए। इस मामले की जांच भी दबा दी गई। वहीं नगर निगम के अधीक्षण अभियंता दीपक किंगर के पीए की भी रिश्वत लेते एक वीडियो वायरल हुई थी। जिसमें एसई पर भी गंभीर आरोप लगे थे, लेकिन मामले की जांच उपायुक्त ने एडीसी सौंपी थी, लेकिन इसकी जांच रिपोर्ट भी लंबे समय से अटकी हुई है। ऐसे में लोगों ने सीएम से अपील करते हुए कहा कि नगर निगम एसई के मामले की जांच भी विजिलेंस से होनी चाहिए।
सीएम के मीडिया समन्वयक जगमोहन आनंद का कहना है डीटीपी विक्रम सिंह के खिलाफ कोई अहम सबूत नहीं मिल रहा था, इस कारण उस पर पहले कार्रवाई नहीं हो सकी थी। अब वह उन अधिकारियों व कर्मचारियों की लिस्ट तैयार कर सीएम को सौंपेंगे जो लंबे समय से सीएम सिटी में कार्यरत हैं, वहीं, जिन अधिकारियों व कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं, उनकी सूचना भी सीएम तक पहुंचाएंगे।