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बड़े घरानों व बिरादरियों में सिमटी चौधर की सियासत
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देव शर्मा
करनाल। पिछले कई महीनों से गांव की चौधर पाने के लिए सैकड़ों दावेदारों ने जोरआजमाइश की। प्रत्याशियों ने वोट हासिल करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। सभी ने अपने-अपने अंदाज में वोट मांगे। गांवों को नशा मुक्त बनाने से लेकर खेल स्टेडियम, सड़कें, स्ट्रीट लाइटें लगवाने आदि बड़े-बड़े चुनावी वादे भी किए, लेकिन ग्राम पंचायत के सरपंच-पंच के मतदान की पूर्व रात्रि को जाति-बिरादरी और बड़े घरानों की कुछ ऐसी चुनावी बयार बही, जिसमें महीनों से किया गया प्रत्याशियों का संघर्ष उड़ता नजर आया। शनिवार को जब मतदान शुरू हुआ तो परिवार और बिरादरियां भारी दिखी। मतदाता इनके आसपास ही केंद्रित होते दिखे। इस ध्रुवीकरण ने कई प्रत्याशियों के उम्मीदों को पलटकर रख दिया।
इसमें कोई दो राय नहीं कि ग्राम पंचायतों में बड़े घरानों और बिरादरियों का अहम स्थान रहता है, लेकिन आरक्षण व्यवस्था ने कई बड़े घरानों और बिरादरियों के चौधर के सपनों को धराशायी कर दिया था। यही कारण था कि अधिकांश ऐसे गांवों में जहां सीटें बीसीए, अनुजाति जाति, अनुसूचित जाति महिला आदि के लिए आरक्षित हुई हैं, वहीं लंबे समय से गांव की राजनीति की धुरी बने बड़े घराने और बिरादरियों ने किनारा कर लिया था। यही कारण रहा कि आरक्षित सीटों पर खुलकर कई दावेदारों ने नामांकन कराया था। ये सभी प्रत्याशी अपनी क्षमतानुसार चुनाव प्रचार करते रहे। शुरुआती दौर में बड़े घरानों और बिरादरियों के सक्रिय न होने के कारण चुनाव का रुख अलग दिखा, लेकिन चौधर में अपना वर्चस्व तो बड़े घरानों और बिरादरियों को कायम रखना ही है, इसलिए मतदान से दो दिन पहले ही इनकी सक्रियता दिखी। जोड़ तोड़ कर अपने प्रत्याशी को जीत दिलाने के लिए हर हथकंडे अपनाए गए। इसके तहत जहां बिरादरियों के प्रत्याशी खड़े थे, वहां अन्य कम संख्या वाली बिरादरियों और बड़े परिवारों को आपस में जोड़ा। एक से अधिक लड़ रहे प्रत्याशियों में भी आपसी सुलह कराकर एक ही प्रत्याशी को समर्थन कराया। जहां, उनके प्रभाव वाले रहकर कार्य करने वाले प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे, उन्हें अपनाया और उनके समर्थन में बड़े परिवारों ( अधिक मतदाता वाले परिवार) और बड़ी बिरादरियों का समर्थन दिलाया। यही कारण रहा कि शुक्रवार की रात चुनावी पंडितों के आंकड़े उलट पुलट हो गए। चुनावी राजनीति बड़े घरानों और बड़ी बिरादरियों पर आकर सिमट गई। मतदान के दिन शनिवार को भी कुछ ऐसा ही नजर आया। परिणाम ये रहा कि कई ग्राम पंचायतों में अप्रत्याशित नतीजे सामने आए, जिन 16 ग्राम पंचायतों में निर्विरोध सरपंच व 12 पूर्ण ग्राम पंचायतों का गठन हुआ है। यहां भी यही फैक्टर देखने को मिला है। चौपालों पर इन बिरादरियों ने गांव की सभी बिरादरियों को अपने साथ मिलाया तो एक नाम पर सहमति बनी।
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करनाल। पिछले कई महीनों से गांव की चौधर पाने के लिए सैकड़ों दावेदारों ने जोरआजमाइश की। प्रत्याशियों ने वोट हासिल करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। सभी ने अपने-अपने अंदाज में वोट मांगे। गांवों को नशा मुक्त बनाने से लेकर खेल स्टेडियम, सड़कें, स्ट्रीट लाइटें लगवाने आदि बड़े-बड़े चुनावी वादे भी किए, लेकिन ग्राम पंचायत के सरपंच-पंच के मतदान की पूर्व रात्रि को जाति-बिरादरी और बड़े घरानों की कुछ ऐसी चुनावी बयार बही, जिसमें महीनों से किया गया प्रत्याशियों का संघर्ष उड़ता नजर आया। शनिवार को जब मतदान शुरू हुआ तो परिवार और बिरादरियां भारी दिखी। मतदाता इनके आसपास ही केंद्रित होते दिखे। इस ध्रुवीकरण ने कई प्रत्याशियों के उम्मीदों को पलटकर रख दिया।
इसमें कोई दो राय नहीं कि ग्राम पंचायतों में बड़े घरानों और बिरादरियों का अहम स्थान रहता है, लेकिन आरक्षण व्यवस्था ने कई बड़े घरानों और बिरादरियों के चौधर के सपनों को धराशायी कर दिया था। यही कारण था कि अधिकांश ऐसे गांवों में जहां सीटें बीसीए, अनुजाति जाति, अनुसूचित जाति महिला आदि के लिए आरक्षित हुई हैं, वहीं लंबे समय से गांव की राजनीति की धुरी बने बड़े घराने और बिरादरियों ने किनारा कर लिया था। यही कारण रहा कि आरक्षित सीटों पर खुलकर कई दावेदारों ने नामांकन कराया था। ये सभी प्रत्याशी अपनी क्षमतानुसार चुनाव प्रचार करते रहे। शुरुआती दौर में बड़े घरानों और बिरादरियों के सक्रिय न होने के कारण चुनाव का रुख अलग दिखा, लेकिन चौधर में अपना वर्चस्व तो बड़े घरानों और बिरादरियों को कायम रखना ही है, इसलिए मतदान से दो दिन पहले ही इनकी सक्रियता दिखी। जोड़ तोड़ कर अपने प्रत्याशी को जीत दिलाने के लिए हर हथकंडे अपनाए गए। इसके तहत जहां बिरादरियों के प्रत्याशी खड़े थे, वहां अन्य कम संख्या वाली बिरादरियों और बड़े परिवारों को आपस में जोड़ा। एक से अधिक लड़ रहे प्रत्याशियों में भी आपसी सुलह कराकर एक ही प्रत्याशी को समर्थन कराया। जहां, उनके प्रभाव वाले रहकर कार्य करने वाले प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे, उन्हें अपनाया और उनके समर्थन में बड़े परिवारों ( अधिक मतदाता वाले परिवार) और बड़ी बिरादरियों का समर्थन दिलाया। यही कारण रहा कि शुक्रवार की रात चुनावी पंडितों के आंकड़े उलट पुलट हो गए। चुनावी राजनीति बड़े घरानों और बड़ी बिरादरियों पर आकर सिमट गई। मतदान के दिन शनिवार को भी कुछ ऐसा ही नजर आया। परिणाम ये रहा कि कई ग्राम पंचायतों में अप्रत्याशित नतीजे सामने आए, जिन 16 ग्राम पंचायतों में निर्विरोध सरपंच व 12 पूर्ण ग्राम पंचायतों का गठन हुआ है। यहां भी यही फैक्टर देखने को मिला है। चौपालों पर इन बिरादरियों ने गांव की सभी बिरादरियों को अपने साथ मिलाया तो एक नाम पर सहमति बनी।
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