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Karnal News: सीटों के नीचे सुला रखे थे बच्चे, सोते रेलयात्रियों को लांघकर गुजरना मजबूरी
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एक्सप्रेस ट्रेनों में सामान्य बोगियों की संख्या कम होने की वजह से यात्रियों का सफर बन रहा मुश्किलों भरा, सामान्य बोगियों की संख्या बढ़ाने की मांग
अनारक्षित टिकट वाले यात्री भीड़ के चलते बोगियों में नहीं घुस पाते और छूट जाती है ट्रेन
मोहित धुुपड़
करनाल। बरेली जंक्शन, दिन बुधवार, समय देररात 12 बजकर 34 मिनट। हिमगिरी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से एक घंटा लेट हो चुकी थी मगर अभी स्टेशन पर उद्घोषणा हो रही थी कि ट्रेन करीब आधा घंटा और देरी से पहुंच सकती है।
प्लेटफार्म नंबर दो पर खाने का स्टॉल लगाने वाले जहीर अहमद और वाहिद चर्चा कर रहे थे कि जल्द ही बरेली स्टेशन की भी कायाकल्प हो जाएगा, सुना है इसके लिए बजट पास हो गया है।
इस पर जहीर अहमद ने वाहिद से कहा, स्टेशन की कायाकल्प तो बहुत अच्छी बात है, वंदे भारत नाम से नई ट्रेनें भी चलीं हैं। यह भी सुन रहे हैं कि देश में बुलेट ट्रेन चलाने की भी तैयारी है, लेकिन स्टेशन पर रोजाना यह देखकर बहुत तकलीफ होती है जब ट्रेनों में सामान्य बोगियां कम होने की वजह से रोजाना बहुत से यात्रियों की गाड़ी छूट जाती है। इसलिए सरकार को चाहिए कि या तो कुछ विशेष सामान्य ट्रेनें शुरू की जाएं या फिर एक्सप्रेस गाड़ियों में सामान्य बोगियों की संख्या बढ़ाई जाए। तभी रात्रि 12 बजकर 46 मिनट पर प्लेटफार्म नंबर दो पर काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस आई। पूरी ट्रेन में आगे की तरफ सामान्य बोगी के केवल तीन डिब्बे मगर उसमें चढ़ने वाले यात्रियों की संख्या बहुत ज्यादा। अंततः कुछ लटककर चले गए और कुछ प्लेटफार्म पर जाती हुई ट्रेन को सिर्फ देखते रह गए।
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रात 12 बजकर 55 मिनट पर हिमगिरी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से एक घंटा 34 मिनट देरी के बाद प्लेटफार्म नंबर दो पर पहुंची। इसमें भी सामान्य बोगियां कम थीं और यात्रा करने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा। मुझे भी ट्रेन से अंबाला कैंट पहुंचना था। स्लीपर कोच एस-3 में घुसे तो भीतर खचाखच भरे यात्रियों के हालात देखकर दंग रह गया।
दरवाजे की शुरुआत से लेकर पूरी बोगी में खड़े बैठे और नीचे चादर बिछाकर लेटे केवल यात्री ही यात्री और उनका जहां- तहां पड़ा सामान। समझ नहीं आ रहा था कि आगे कैसे बढ़ा जाए। मन को कचोट कर सोते हुए लोगों के ऊपर से लांघकर आगे बढ़ना मजबूरी था पर कदम बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाए। ऐसी स्थिति अमूमन सामान्य बोगियों में तो रहती है मगर यहां स्लीपर बोगियों में भी हालत खराब थे। यह देखकर बहुत ज्यादा पीड़ा हुई कि कुछ यात्रियों ने तो अपने बच्चों को सीटों के नीचे घुसाकर सुला रखा था और खुद नीचे बैठे गर्दन झुकाकर छपकी लेने की कोशिश करते रहे। कुछ चादर बिछाकर जहां जगह मिली, वहीं लेट गए या बैठे रहे। पूछने पर भागलपुर से लुधियाना जा रही सुनीता ने बताया कि उसके पति तो टॉयलेट के पास जमीन पर बैठे हैं और उसने अपने दोनों बच्चों को सीट के नीचे घुसाकर सुला दिया है।
वह यहीं सीट के पास जमीन पर बैठकर उनकी रखवाली कर रही है। अन्य बोगियां भी यात्रियों से पूरी तरह खचाखच भरी हुईं थीं। मध्य रात्रि 02 बजकर 46 मिनट पर बोगी नंबर एस-5 के गेट पर बनारस से चार दोस्तों के साथ फगवाड़ा लौट रहे बॉबी मुरादाबाद स्टेशन पर अपने परिवार संग उतरने वाले जितेंद्र से बहस कर रहे थे। पूछने पर बॉबी ने बताया कि हम सब दोस्तों के बैग गेट के पास ही पड़े थे और जगह न होने की वजह से वे लोग भी वहीं खड़े होकर यात्रा कर रहे थे। मुरादाबाद स्टेशन से करीब 10-12 किलोमीटर पहले जितेंद्र ने जैसे ही दरवाजा खोला तो सबसे ऊपर पड़ा बैग अचानक लुढ़ककर चलती ट्रेन से नीचे गिर गया।
दोनों में तीखी बहस और ट्रेन चलती रही। पटना से जगाधरी जा रहे संत कुमार ने बताया कि वह जगाधरी की प्लाइवुड इंडस्ट्री में काम करता है। वह और उनके साथी सामान्य कोच में चढ़ नहीं पाए, इसलिए स्लीपर में घुसे और अत्यधिक भीड़ के चलते दरवाजे के पास बैठ गए।
पश्चिम बंगाल स्थित मेदनीपुर की रहने वाली सकीना बानो अपनी मासी शाहिदा और 12 साल के बेटे बिलाल अहमद अंहगर के साथ हावड़ा से जम्मू जाने के लिए स्लीपर कोच की टिकट लेकर यात्रा कर रही थीं। सकीना बानो ने बताया कि उनकी टिकट तो कंफर्म नहीं हुई, इसलिए वह हावड़ा से इसी तरह जमीन पर बैठकर यात्रा कर रही है।
सेवानिवृत कर्मचारी बक्सर निवासी रामदरस गोस्वामी अपने परिवार के साथ फगवाड़ा जा रहे थे। उनका कहना था कि ट्रेनों में लगातार यात्रियों की संख्या बढ़ती जा रही है इसे देखते हुए केंद्र सरकार को एक्सप्रेस गाड़ियों में सामान्य बोगियों की संख्या बढ़ानी चाहिए ताकि लोगों का लंबा सफर मुश्किलों से भरा न हो। खैर, वीरवार सुबह 07 बजकर 17 मिनट पर ट्रेन मुझे अंबाला छावनी जंक्शन पर छोड़कर यात्रियों और उनकी परेशानियों को साथ लेकर आगे रवाना हो गई।
एक्सप्रेस ट्रेनों में सामान्य बोगियां होती हैं। पहले ये बोगियां आगे और पीछे दोनों तरफ रहती थीं लेकिन अभी बताया जा रहा है कि कुछ ट्रेनों में यह बोगियां केवल एक ही तरफ लगती हैं। इस संदर्भ में क्या पॉलिसी है, उसे एक बार चेक करने के बाद ही कुछ स्पष्ट कह पाऊंगा। -राजेश कुमार, प्रवक्ता, उत्तर रेलवे।
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अनारक्षित टिकट वाले यात्री भीड़ के चलते बोगियों में नहीं घुस पाते और छूट जाती है ट्रेन
मोहित धुुपड़
करनाल। बरेली जंक्शन, दिन बुधवार, समय देररात 12 बजकर 34 मिनट। हिमगिरी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से एक घंटा लेट हो चुकी थी मगर अभी स्टेशन पर उद्घोषणा हो रही थी कि ट्रेन करीब आधा घंटा और देरी से पहुंच सकती है।
प्लेटफार्म नंबर दो पर खाने का स्टॉल लगाने वाले जहीर अहमद और वाहिद चर्चा कर रहे थे कि जल्द ही बरेली स्टेशन की भी कायाकल्प हो जाएगा, सुना है इसके लिए बजट पास हो गया है।
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इस पर जहीर अहमद ने वाहिद से कहा, स्टेशन की कायाकल्प तो बहुत अच्छी बात है, वंदे भारत नाम से नई ट्रेनें भी चलीं हैं। यह भी सुन रहे हैं कि देश में बुलेट ट्रेन चलाने की भी तैयारी है, लेकिन स्टेशन पर रोजाना यह देखकर बहुत तकलीफ होती है जब ट्रेनों में सामान्य बोगियां कम होने की वजह से रोजाना बहुत से यात्रियों की गाड़ी छूट जाती है। इसलिए सरकार को चाहिए कि या तो कुछ विशेष सामान्य ट्रेनें शुरू की जाएं या फिर एक्सप्रेस गाड़ियों में सामान्य बोगियों की संख्या बढ़ाई जाए। तभी रात्रि 12 बजकर 46 मिनट पर प्लेटफार्म नंबर दो पर काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस आई। पूरी ट्रेन में आगे की तरफ सामान्य बोगी के केवल तीन डिब्बे मगर उसमें चढ़ने वाले यात्रियों की संख्या बहुत ज्यादा। अंततः कुछ लटककर चले गए और कुछ प्लेटफार्म पर जाती हुई ट्रेन को सिर्फ देखते रह गए।
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रात 12 बजकर 55 मिनट पर हिमगिरी एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से एक घंटा 34 मिनट देरी के बाद प्लेटफार्म नंबर दो पर पहुंची। इसमें भी सामान्य बोगियां कम थीं और यात्रा करने वाले लोगों की संख्या बहुत ज्यादा। मुझे भी ट्रेन से अंबाला कैंट पहुंचना था। स्लीपर कोच एस-3 में घुसे तो भीतर खचाखच भरे यात्रियों के हालात देखकर दंग रह गया।
दरवाजे की शुरुआत से लेकर पूरी बोगी में खड़े बैठे और नीचे चादर बिछाकर लेटे केवल यात्री ही यात्री और उनका जहां- तहां पड़ा सामान। समझ नहीं आ रहा था कि आगे कैसे बढ़ा जाए। मन को कचोट कर सोते हुए लोगों के ऊपर से लांघकर आगे बढ़ना मजबूरी था पर कदम बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाए। ऐसी स्थिति अमूमन सामान्य बोगियों में तो रहती है मगर यहां स्लीपर बोगियों में भी हालत खराब थे। यह देखकर बहुत ज्यादा पीड़ा हुई कि कुछ यात्रियों ने तो अपने बच्चों को सीटों के नीचे घुसाकर सुला रखा था और खुद नीचे बैठे गर्दन झुकाकर छपकी लेने की कोशिश करते रहे। कुछ चादर बिछाकर जहां जगह मिली, वहीं लेट गए या बैठे रहे। पूछने पर भागलपुर से लुधियाना जा रही सुनीता ने बताया कि उसके पति तो टॉयलेट के पास जमीन पर बैठे हैं और उसने अपने दोनों बच्चों को सीट के नीचे घुसाकर सुला दिया है।
वह यहीं सीट के पास जमीन पर बैठकर उनकी रखवाली कर रही है। अन्य बोगियां भी यात्रियों से पूरी तरह खचाखच भरी हुईं थीं। मध्य रात्रि 02 बजकर 46 मिनट पर बोगी नंबर एस-5 के गेट पर बनारस से चार दोस्तों के साथ फगवाड़ा लौट रहे बॉबी मुरादाबाद स्टेशन पर अपने परिवार संग उतरने वाले जितेंद्र से बहस कर रहे थे। पूछने पर बॉबी ने बताया कि हम सब दोस्तों के बैग गेट के पास ही पड़े थे और जगह न होने की वजह से वे लोग भी वहीं खड़े होकर यात्रा कर रहे थे। मुरादाबाद स्टेशन से करीब 10-12 किलोमीटर पहले जितेंद्र ने जैसे ही दरवाजा खोला तो सबसे ऊपर पड़ा बैग अचानक लुढ़ककर चलती ट्रेन से नीचे गिर गया।
दोनों में तीखी बहस और ट्रेन चलती रही। पटना से जगाधरी जा रहे संत कुमार ने बताया कि वह जगाधरी की प्लाइवुड इंडस्ट्री में काम करता है। वह और उनके साथी सामान्य कोच में चढ़ नहीं पाए, इसलिए स्लीपर में घुसे और अत्यधिक भीड़ के चलते दरवाजे के पास बैठ गए।
पश्चिम बंगाल स्थित मेदनीपुर की रहने वाली सकीना बानो अपनी मासी शाहिदा और 12 साल के बेटे बिलाल अहमद अंहगर के साथ हावड़ा से जम्मू जाने के लिए स्लीपर कोच की टिकट लेकर यात्रा कर रही थीं। सकीना बानो ने बताया कि उनकी टिकट तो कंफर्म नहीं हुई, इसलिए वह हावड़ा से इसी तरह जमीन पर बैठकर यात्रा कर रही है।
सेवानिवृत कर्मचारी बक्सर निवासी रामदरस गोस्वामी अपने परिवार के साथ फगवाड़ा जा रहे थे। उनका कहना था कि ट्रेनों में लगातार यात्रियों की संख्या बढ़ती जा रही है इसे देखते हुए केंद्र सरकार को एक्सप्रेस गाड़ियों में सामान्य बोगियों की संख्या बढ़ानी चाहिए ताकि लोगों का लंबा सफर मुश्किलों से भरा न हो। खैर, वीरवार सुबह 07 बजकर 17 मिनट पर ट्रेन मुझे अंबाला छावनी जंक्शन पर छोड़कर यात्रियों और उनकी परेशानियों को साथ लेकर आगे रवाना हो गई।
एक्सप्रेस ट्रेनों में सामान्य बोगियां होती हैं। पहले ये बोगियां आगे और पीछे दोनों तरफ रहती थीं लेकिन अभी बताया जा रहा है कि कुछ ट्रेनों में यह बोगियां केवल एक ही तरफ लगती हैं। इस संदर्भ में क्या पॉलिसी है, उसे एक बार चेक करने के बाद ही कुछ स्पष्ट कह पाऊंगा। -राजेश कुमार, प्रवक्ता, उत्तर रेलवे।