{"_id":"61f0620a8708b9043715b086","slug":"babu-moolchand-jain-fought-the-war-of-social-harmony-even-after-independence-karnal-news-knl971018112","type":"story","status":"publish","title_hn":"बाबू मूलचंद जैन ने आजादी के बाद भी लड़ी थी सामाजिक समरसता की जंग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बाबू मूलचंद जैन ने आजादी के बाद भी लड़ी थी सामाजिक समरसता की जंग
विज्ञापन
माई सिटी रिपोर्टर
करनाल। करनाल के बाबू मूलचंद जैन भले ही गांधीवादी विचारधारा के पोषक रहे, लेकिन उनके तेवर हमेशा क्रांतिकारी रहे। आजादी की लड़ाई के दौरान वे कई बार जेल गए। उन्होंने स्वतंत्र भारत में राजनीति को एक नई दिशा देने के साथ सामाजिक समरसता के लिए भी काम किया। आजादी मिलने के बाद उन्होंने छुआछूत के खिलाफ उस समय लड़ाई लड़ी, जब उन्हें ज्ञात हुआ कि गांव के दलितों को उच्च वर्ग के कुछ लोग कुएं से पानी नहीं भरने दे रहे हैं। उच्च वर्ग के विरोध के बावजूद उन्होंने दोनों वर्गों में समरसता बनाई।
20 अगस्त 1915 को सोनीपत के सिकंदरपुर माजरा गांव में जन्मे बाबू मूलचंद जैन की कर्मस्थली करनाल रही। 1931 में जब उन्होंने मैट्रिक पास किया। उसी साल मार्च में भगत सिंह, सुखदेव सिंह व राजगुरु को फांसी दे दी गई, तो पूरे देश में ही कोहराम की स्थिति बन गई। तब बाबू मूलचंद ने गोहाना में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ कई जलसे किए। 1935 में उन्होंने लाहौर से बीए किया। अपना खर्च चलाने के लिए ट्यूशन पढ़ाया। 1937 में उन्होंने वकालत शुरू की। इसके बाद गांधी जी के आह्वान पर स्वतंत्रता आंदोेलन में कूद पड़े। उन्होंने 6 मार्च 1940 को सिकंदरपुर माजरा से ही सत्याग्रह शुरू किया तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एक साल की सजा के दौरान उन्हें गुजरात (पाकिस्तान) में रखा गया। रिहा होकर लौटे तो 11 अगस्त 1942 को करनाल कचहरी से उन्हें अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में सहभागिता के कारण फिर से गिरफ्तार कर पुरानी केंद्रीय जेल मुलतान (पाकिस्तान) भेज दिया गया। इस बार भी उन्हें एक साल तक जेल में रहना पड़ा। इस बीच उन्होंने देश की आजादी के लिए क्रांतिकारियों व महात्मा गांधी के आह्वान पर की गई कई गतिविधियों में बढ़ चढ़कर सहभागिता की। 12 सितंबर 1997 को उनका निधन हो गया।
बाबू मूलचंद का राजनीतिक जीवन
बाबू मूलचंद 1952 में समालखा से विधायक चुने गए। 1956 में कैबिनेट मंत्री बने और 1957 में वह कैथल से लोक सभा सदस्य चुने गए। 1962 में वह कांग्रेस के टिकट पर घरौंडा से चुनाव तो लड़े पर हार गए। इसके बाद 1965-67 में हरियाणा को अलग प्रांत बनाने के लिए चलाए गए आंदोलन में सक्रिय हुए। ऑल हरियाणा एक्शन कमेटी के महासचिव भी रहे। 1967 में वह घरौंडा के विधायक चुने गए और राज्य के वित्तमंत्री भी बने। 1973 से 1975 लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाए गए आंदोलन में सहभागिता की। 1975 में आपातकाल के दौरान 19 महीने तक जेल में रहे। 1977 में वह जनता पार्टी के टिकट पर समालखा के विधायक और 1978 में फिर वित्तमंत्री बने। 1980 से 82 तक विपक्ष के नेता भी रहे। 1985 से 87 तक राजीव लोगोंवाल समझौता की धारा 7 व 9 का विरोध किया। चौधरी देवी लाल द्वारा चलाए गए न्याय युद्ध आंदोलन में भी सक्रिय रहे। वह कई अन्य अहम पदों पर भी रहे।
विज्ञापन
अपने पैतृक निवास को बना दिया पुस्तकालय
बाबू मूलचंद जैन के पुत्र अशोक जैन एडवोकेट ने बताया कि बाबू जी ने अपने 77वें जन्म दिवस पर सिकंदरपुर माजरा गांव स्थित अपने पैतृक आवास को ही आदर्श पुस्तकालय में बदल दिया, क्योंकि वे चाहते थे हर व्यक्ति पढ़ा लिखा हो। तभी से ग्रामीण उनके जन्मदिन को पुस्तकालय दिवस के रूप में मनाने लगे। करनाल आईटीआई में उनकी प्रतिमा स्थापित है, आईटीआई से कुंजपुरा तक के रोड का नाम बाबू मूलचंद मार्ग भी रखा गया है। 13 अक्तूबर 2021 को रोहतक डाक मंडल ने उनके नाम व चित्र वाला स्पेशल पोस्टल कवर जारी किया। अशोक जैन चाहते हैं कि बाबू जी के नाम पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में रिसर्च चेयर बनाई जाए।
विज्ञापन
करनाल। करनाल के बाबू मूलचंद जैन भले ही गांधीवादी विचारधारा के पोषक रहे, लेकिन उनके तेवर हमेशा क्रांतिकारी रहे। आजादी की लड़ाई के दौरान वे कई बार जेल गए। उन्होंने स्वतंत्र भारत में राजनीति को एक नई दिशा देने के साथ सामाजिक समरसता के लिए भी काम किया। आजादी मिलने के बाद उन्होंने छुआछूत के खिलाफ उस समय लड़ाई लड़ी, जब उन्हें ज्ञात हुआ कि गांव के दलितों को उच्च वर्ग के कुछ लोग कुएं से पानी नहीं भरने दे रहे हैं। उच्च वर्ग के विरोध के बावजूद उन्होंने दोनों वर्गों में समरसता बनाई।
20 अगस्त 1915 को सोनीपत के सिकंदरपुर माजरा गांव में जन्मे बाबू मूलचंद जैन की कर्मस्थली करनाल रही। 1931 में जब उन्होंने मैट्रिक पास किया। उसी साल मार्च में भगत सिंह, सुखदेव सिंह व राजगुरु को फांसी दे दी गई, तो पूरे देश में ही कोहराम की स्थिति बन गई। तब बाबू मूलचंद ने गोहाना में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ कई जलसे किए। 1935 में उन्होंने लाहौर से बीए किया। अपना खर्च चलाने के लिए ट्यूशन पढ़ाया। 1937 में उन्होंने वकालत शुरू की। इसके बाद गांधी जी के आह्वान पर स्वतंत्रता आंदोेलन में कूद पड़े। उन्होंने 6 मार्च 1940 को सिकंदरपुर माजरा से ही सत्याग्रह शुरू किया तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। एक साल की सजा के दौरान उन्हें गुजरात (पाकिस्तान) में रखा गया। रिहा होकर लौटे तो 11 अगस्त 1942 को करनाल कचहरी से उन्हें अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में सहभागिता के कारण फिर से गिरफ्तार कर पुरानी केंद्रीय जेल मुलतान (पाकिस्तान) भेज दिया गया। इस बार भी उन्हें एक साल तक जेल में रहना पड़ा। इस बीच उन्होंने देश की आजादी के लिए क्रांतिकारियों व महात्मा गांधी के आह्वान पर की गई कई गतिविधियों में बढ़ चढ़कर सहभागिता की। 12 सितंबर 1997 को उनका निधन हो गया।
विज्ञापन
बाबू मूलचंद का राजनीतिक जीवन
बाबू मूलचंद 1952 में समालखा से विधायक चुने गए। 1956 में कैबिनेट मंत्री बने और 1957 में वह कैथल से लोक सभा सदस्य चुने गए। 1962 में वह कांग्रेस के टिकट पर घरौंडा से चुनाव तो लड़े पर हार गए। इसके बाद 1965-67 में हरियाणा को अलग प्रांत बनाने के लिए चलाए गए आंदोलन में सक्रिय हुए। ऑल हरियाणा एक्शन कमेटी के महासचिव भी रहे। 1967 में वह घरौंडा के विधायक चुने गए और राज्य के वित्तमंत्री भी बने। 1973 से 1975 लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा चलाए गए आंदोलन में सहभागिता की। 1975 में आपातकाल के दौरान 19 महीने तक जेल में रहे। 1977 में वह जनता पार्टी के टिकट पर समालखा के विधायक और 1978 में फिर वित्तमंत्री बने। 1980 से 82 तक विपक्ष के नेता भी रहे। 1985 से 87 तक राजीव लोगोंवाल समझौता की धारा 7 व 9 का विरोध किया। चौधरी देवी लाल द्वारा चलाए गए न्याय युद्ध आंदोलन में भी सक्रिय रहे। वह कई अन्य अहम पदों पर भी रहे।
विज्ञापन
अपने पैतृक निवास को बना दिया पुस्तकालय
बाबू मूलचंद जैन के पुत्र अशोक जैन एडवोकेट ने बताया कि बाबू जी ने अपने 77वें जन्म दिवस पर सिकंदरपुर माजरा गांव स्थित अपने पैतृक आवास को ही आदर्श पुस्तकालय में बदल दिया, क्योंकि वे चाहते थे हर व्यक्ति पढ़ा लिखा हो। तभी से ग्रामीण उनके जन्मदिन को पुस्तकालय दिवस के रूप में मनाने लगे। करनाल आईटीआई में उनकी प्रतिमा स्थापित है, आईटीआई से कुंजपुरा तक के रोड का नाम बाबू मूलचंद मार्ग भी रखा गया है। 13 अक्तूबर 2021 को रोहतक डाक मंडल ने उनके नाम व चित्र वाला स्पेशल पोस्टल कवर जारी किया। अशोक जैन चाहते हैं कि बाबू जी के नाम पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में रिसर्च चेयर बनाई जाए।