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दो-चार भाषाएं सीखो भले तुम, पर प्यार करो तुम हिंदी से
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कैथल। अखिल भारतीय साहित्य परिषद जिला इकाई कैथल की ओर से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर सेवा संघ भवन जवाहर पार्क में काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस दौरान कवियों ने अपनी रचनाओं से भावविभोर कर दिया। सेवा संघ के महासचिव शिवशंकर पाहवा ने गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे साहित्य सभा के प्रधान एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. अमृत लाल मदान ने कहा कि हमें अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। हमें सभी भाषाओं-बोलियों और सभी संस्कृतियों का आदर करना चाहिए। गोष्ठी की शुरुआत डॉ. तेजिंद्र ने अंतरराष्ट्रीय मातृ-भाषा दिवस के इतिहास और इसके वर्तमान स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए की। गोष्ठी में रचनाकारों ने हिंदी, हरियाणवी, पंजाबी, मुलतानी और सरायकी भाषाओं और बोलियों में अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। मधु गोयल मधुल ने कहा- दो-चार भाषाएं सीखो भले तुम, पर प्यार करो तुम हिंदी से। श्याम सुंदर गौड़ ने कहा देश-प्रांत की नहीं है चिंता, चिंता कुर्सी हथियाने की। सोहनलाल सोनी ने पढ़ा- जिसनै समझा बोझ री मां। कर देगी तेरी मौज री मां। राजेश भारती ने आपणे कालजे तै ला ले री मां मन्नै कसकै। रोए जाऊंगी मैं इस तरियां तन्नै याद करकै सुनाकर वाहवाही लूटी। दिलबाग अकेला ने पढ़ा- न हो कोई आहत अपने कर्मों से यारो, ऐसे कर्मों को न कभी कीजिए। डॉ. संध्या आर्य ने सबकी अलग-अलग है भाषा, अलग-अलग हैं रंग, अपनी-अपनी बोली सबकी, अपना-अपना ढंग पढ़कर तालियां बटोरी। रिसाल जांगड़ा ने कहा कि हिम्मत करकै चाल बटेऊ बाट बाकी सै, मंजिल का कर ख्याल बटेऊ बाट बाकी सै। डॉ. हरीश झंडई ने कहा कि हिंदी है गौरव, भारत की शान...। कमलेश शर्मा ने कहा कि जम गई है मन के भावों की झील, उसमें अब कोई हंस किलोल नहीं करते, बस बर्फ की चादर ओढ़ सो जाते हैं। शिवशंकर पाहवा ने पढ़ा- इश्क ही है जो जीवन देवे। इश्क ही है जो पाट्टे सीवे। इश्क ही है जो दर्द दी गठड़ी। इश्क ही है जो सहण न देवे। गोष्ठी का संचालन डॉ. तेजिंद्र ने किया।
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गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे साहित्य सभा के प्रधान एवं वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. अमृत लाल मदान ने कहा कि हमें अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। हमें सभी भाषाओं-बोलियों और सभी संस्कृतियों का आदर करना चाहिए। गोष्ठी की शुरुआत डॉ. तेजिंद्र ने अंतरराष्ट्रीय मातृ-भाषा दिवस के इतिहास और इसके वर्तमान स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए की। गोष्ठी में रचनाकारों ने हिंदी, हरियाणवी, पंजाबी, मुलतानी और सरायकी भाषाओं और बोलियों में अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। मधु गोयल मधुल ने कहा- दो-चार भाषाएं सीखो भले तुम, पर प्यार करो तुम हिंदी से। श्याम सुंदर गौड़ ने कहा देश-प्रांत की नहीं है चिंता, चिंता कुर्सी हथियाने की। सोहनलाल सोनी ने पढ़ा- जिसनै समझा बोझ री मां। कर देगी तेरी मौज री मां। राजेश भारती ने आपणे कालजे तै ला ले री मां मन्नै कसकै। रोए जाऊंगी मैं इस तरियां तन्नै याद करकै सुनाकर वाहवाही लूटी। दिलबाग अकेला ने पढ़ा- न हो कोई आहत अपने कर्मों से यारो, ऐसे कर्मों को न कभी कीजिए। डॉ. संध्या आर्य ने सबकी अलग-अलग है भाषा, अलग-अलग हैं रंग, अपनी-अपनी बोली सबकी, अपना-अपना ढंग पढ़कर तालियां बटोरी। रिसाल जांगड़ा ने कहा कि हिम्मत करकै चाल बटेऊ बाट बाकी सै, मंजिल का कर ख्याल बटेऊ बाट बाकी सै। डॉ. हरीश झंडई ने कहा कि हिंदी है गौरव, भारत की शान...। कमलेश शर्मा ने कहा कि जम गई है मन के भावों की झील, उसमें अब कोई हंस किलोल नहीं करते, बस बर्फ की चादर ओढ़ सो जाते हैं। शिवशंकर पाहवा ने पढ़ा- इश्क ही है जो जीवन देवे। इश्क ही है जो पाट्टे सीवे। इश्क ही है जो दर्द दी गठड़ी। इश्क ही है जो सहण न देवे। गोष्ठी का संचालन डॉ. तेजिंद्र ने किया।
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