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धर्म की स्थापना के लिए प्रभु का अलग-अलग रूपों में होता है अवतार : बसंत
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श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान सुनाते आचार्य बसंत। संवाद
कलायत। कलायत के श्री कपिल मुनि मंदिर प्रांगण में चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के चौथे दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया गया। इस दौरान नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की भजन पर सभी श्रद्धालु झूम उठे। श्रीकृष्ण-जन्मोत्सव कार्यक्रम के लिए कथा पंडाल को गुब्बारे व फूल-माला से आकर्षक ढंग से सजाया गया। कथा व्यास बसंत जी महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन कर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की महत्ता पर व्याख्यान किया।
कथाव्यास ने कहा कि जब-जब अत्याचार, अनाचार व अन्याय बढ़ता है तब-तब प्रभु का अवतार होता है। अत्याचार को समाप्त कर धर्म की स्थापना के लिए ही प्रभु का अलग-अलग रूपों में अवतार होता है। जब धरा पर मथुरा के राजा कंस के अत्याचार अत्यधिक बढ़ गए तब धरती की करुण पुकार सुनकर श्री हरि विष्णु ने देवकी माता के अष्टम पुत्र के रूप में भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया। इसी प्रकार त्रेता युग में लंकापति रावण के अत्याचारों से जब धरा डोलने लगी तब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने जन्म लिया।
उन्होंने कहा कि प्रभु हमें समझाना चाहते हैं कि सृष्टि का सार तत्व परमात्मा है। इसलिए असार यानी संसार के नश्वर भोग पदार्थों की प्राप्ति में अपने समय, साधन और सामर्थ को अपव्यय करने की जगह हमें अपने अंदर स्थित परमात्मा को प्राप्त करने का लक्ष्य रखना चाहिए। इससे जीवन का कल्याण संभव है। कथा व्यास ने बताया कि वास्तविकता में श्रीकृष्ण केवल ग्वाल-बालों के सखा भर नहीं थे बल्कि उन्हें दीक्षित करने वाले जगद्गुरु भी थे। श्रीकृष्ण ने उनकी आत्मा का जागरण किया और फिर आत्मिक स्तर पर स्थित रहकर सुंदर जीवन जीने का अनूठा पाठ पढ़ाया। कथा की समाप्ति पर आयोजक मंडल की ओर से कथा में मौजूद श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया गया।
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कथाव्यास ने कहा कि जब-जब अत्याचार, अनाचार व अन्याय बढ़ता है तब-तब प्रभु का अवतार होता है। अत्याचार को समाप्त कर धर्म की स्थापना के लिए ही प्रभु का अलग-अलग रूपों में अवतार होता है। जब धरा पर मथुरा के राजा कंस के अत्याचार अत्यधिक बढ़ गए तब धरती की करुण पुकार सुनकर श्री हरि विष्णु ने देवकी माता के अष्टम पुत्र के रूप में भगवान श्री कृष्ण ने जन्म लिया। इसी प्रकार त्रेता युग में लंकापति रावण के अत्याचारों से जब धरा डोलने लगी तब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने जन्म लिया।
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उन्होंने कहा कि प्रभु हमें समझाना चाहते हैं कि सृष्टि का सार तत्व परमात्मा है। इसलिए असार यानी संसार के नश्वर भोग पदार्थों की प्राप्ति में अपने समय, साधन और सामर्थ को अपव्यय करने की जगह हमें अपने अंदर स्थित परमात्मा को प्राप्त करने का लक्ष्य रखना चाहिए। इससे जीवन का कल्याण संभव है। कथा व्यास ने बताया कि वास्तविकता में श्रीकृष्ण केवल ग्वाल-बालों के सखा भर नहीं थे बल्कि उन्हें दीक्षित करने वाले जगद्गुरु भी थे। श्रीकृष्ण ने उनकी आत्मा का जागरण किया और फिर आत्मिक स्तर पर स्थित रहकर सुंदर जीवन जीने का अनूठा पाठ पढ़ाया। कथा की समाप्ति पर आयोजक मंडल की ओर से कथा में मौजूद श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया गया।

श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान सुनाते आचार्य बसंत। संवाद

श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान सुनाते आचार्य बसंत। संवाद

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