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Kaithal News: विभाजन के समय संघर्ष, फिर जनसंघ से जुड़े

Thu, 14 Aug 2025 01:28 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल
संवाद न्यूज एजेंसी, कैथल Updated Thu, 14 Aug 2025 01:28 AM IST
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Struggle during partition, then joined Jansangh
40 कैथल। विभाजन वि​भिषक स्मृति दिवस पर आयोजित हुए कार्यक्रम में अमरनाथ भगत का अ​भिवादन स्वीकार
संवाद न्यूज एजेंसी
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कैथल। जनसंघ और भाजपा के वरिष्ठ नेता अमरनाथ भगत का जीवन संघर्ष, त्याग और सादगी का उदाहरण है। देश के विभाजन के बाद वे पाकिस्तान में फंस गए थे। कठिन परिस्थितियों में पुलिसकर्मियों को कुछ दिनारे देकर उन्होंने बॉर्डर पार किया और भारत पहुंचे। 96 वर्षीय अमरनाथ भगत हैफेड के पूर्व चेयरमैन कैलाश भगत के पिता हैं।

भारत आने के बाद भी उनके संघर्ष खत्म नहीं हुए। फिरोजपुर पहुंचते ही पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जब उन्होंने गिरफ्तारी का कारण पूछा, तो जवाब मिला—जनसंघ वालों ने महात्मा गांधी की हत्या की है। उन्हें फिरोजपुर जेल में डाल दिया गया, जहां कई माह तक बंद रहे। इसके बाद वे जनसंघ से जुड़ गए और जीवन भर राष्ट्र व समाजहित के कार्यों में अग्रणी रहे।
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मोदी और मनोहर लाल के साथ काम का अनुभव ः भगत ने बताया कि जब नरेंद्र मोदी हरियाणा के प्रभारी थे और मनोहर लाल संगठन मंत्री, तब उन्हें कैथल के मुख्य प्रचार की जिम्मेदारी दी गई थी। दोनों नेताओं के साथ उन्होंने निकटता से काम किया। प्रचार के दौरान मोदी के चेहरे पर उन्होंने कभी थकान नहीं देखी।
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वर्ष 1952 में उन्हें संघ से राजनीति संगठन की जिम्मेदारी मिली। 1977 में वे मार्केट कमेटी के चेयरमैन बने और नरवानिया बिल्डिंग का निर्माण करवाया। उनका दावा है कि जीवन में एक पैसे की रिश्वत नहीं ली। यहां तक कि इमरजेंसी के दौरान जेल जाने वालों के लिए बनी पेंशन स्कीम का लाभ भी उन्होंने ठुकरा दिया और कहा कि यह राशि किसी जरूरतमंद परिवार को दी जाए।

अटल बिहारी वाजपेयी के रहे करीबी

अमरनाथ भगत ने बताया कि वे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के बेहद नजदीकी रहे। वाजपेयी के लिए देशहित सर्वोपरि था—सबसे पहले देश, फिर पार्टी और उसके बाद स्वयं। भगत कहते हैं कि आज स्थितियां उलट हो गई हैं। उन्होंने तीन बार जेल की सजा काटी—विभाजन के बाद 1948 में, 1957 में हिंदी आंदोलन के दौरान और 1977 में इमरजेंसी के समय।


वर्ष 1957 में हिंदी आंदोलन के दौरान हिंदू स्कूल के पास से पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर एसडीएम के सामने पेश किया। माता-पिता ने माफी मांगने को कहा, पर उनका जवाब था—जब गलती ही नहीं की, तो माफी किस बात की। इसके बाद उन्हें संगरुर जेल भेजा गया, जहां करीब छह माह तक सजा काटी। 1977 की इमरजेंसी में वे तीन माह कैथल जेल में रहे।
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